स्वामी श्रद्धानन्दजी की कलम से- रक्षाबन्धन का संदेश [‘रक्षाबन्धन’ पर्व पर विशेष रूप से प्रकाशित ]

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स्वामी श्रद्धानन्दजी की कलम से- रक्षाबन्धन का संदेश
[‘रक्षाबन्धन’ पर्व पर विशेष रूप से प्रकाशित ]
माता का पुत्र पर जो उपकार है उसकी संसार में सीमा नहीं। यही कारण है कि हर समय और हर देश में मातृशक्ति का स्थान अन्य शक्तियों से ऊंचा समझा जाता है। जहां ऐसा नहीं है वहां सभ्यता और मनुष्यता का अभाव समझा जाता है।
जब वह मातृशक्ति ऊंचे स्थान पर रहती है तो वह श्रद्धा और भक्ति की अधिकारिणी होती है। और जब वह बराबरी पर आती है तो बहन के रूप में भाई पर प्रेम और रक्षा के अन्य साधारण अधिकार रखती है। एक सुशिक्षित सभ्य देश में देश की माताएं पूजी जाती हैं, बहनें प्रेम और रक्षा की अधिकारिणी समझी जाती हैं और पुत्रियां भावी माताएं और भावी बहनें होने के कारण उस चिन्ता और सावधानता से शिक्षण पाती हैं, जो बालकों को भी नसीब नहीं होती। यह एक उन्नत और सभ्य जाति के चिन्ह हैं।
भारत के स्वतन्त्र सुन्दर प्राचीन काल में माताओं, बहनों और पुत्रियों का यथायोग्य पूजन रक्षण और शिक्षण होता था। यही कारण था कि भारत की महिलाएं प्रत्युत्तर में पुरुषों को आशीर्वाद देती थीं, उन्हें नाम की अधिकारिणी बनाती थीं, उन्हें अपनी जन्म घुट्टी के साथ वीरता और स्वाधीनता का अमृत पिलाती थीं। उन्हीं पूजा पाई हुई माताओं का आशीर्वाद था जिस कारण भारतवासियों में आत्मसम्मान था। पाण्डव वीर थे, पर यह न भूलना चाहिए कि उन्हें अपना ‘पांडव’ यह उपनाम उतना प्यारा न था, जितना प्यारा ‘कौन्तेय’ था। राम का सबसे प्यारा नाम ‘कौशल्या नन्दन’ है। वे वीर माता के नाम से नाम कमाने को अपमान न समझते थे- उसे अधिक अच्छा समझते थे, और यही कारण था उन पर माताओं का आशीर्वाद फलता था। राजपूतों में स्त्री जाति की रक्षा करना आवश्यक धर्म समझा जाता था। रक्षाबन्धन उसका एक अधूरा शेष है। यह दिन बहिन और भाई देश की अबलाओं और वीर पुरुषों के परस्पर रक्षा-रक्षक सम्बन्ध को दृढ़ करने का दिन है। जब भारत में स्वाधीनता आत्म सम्मान और यश का कुछ भी मूल्य समझा जाता था, तब देश के नवयुवक अपनी देश बहिनों की मानमर्यादा की रक्षा के लिए प्राणों की बलि देने में अपना अहोभाग्य समझते थे।
परन्तु आज क्या दशा है? पाठक यह समझकर विस्मित नहीं हों कि हम सब स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह का रोना लेकर बैठेंगे। यह रोना रोते-रोते आधी सदी बीत गई और अब उसका असर देश के सभी विचारशीलों पर है। हम तो आज अपने पाठकों को केवल यह अनुभव करना चाहते हैं कि स्त्री जाति के प्रति भारतवासियों के जो वर्तमान भाव हैं वह कितने हीन और तुच्छ हैं। यह याद रखना चाहिए कि जो जाति माताओं को इतना हीन और तुच्छ समझती हैं, वह दासता की ही अधिकारिणी है। हमारे हरेक व्यवहार में हमारे शहरों और गांव के हरेक कोने में हमारे असभ्य और सभ्य नागरिकों के मुंह में दिन-रात माताओं और बहनों का नाम लेकर गालियां निकलती हैं। लड़ाई आदमी से, गाली और बेइज्जती मां और बहनों के लिए। यदि किसी दूसरे को बदनाम करना है तो उसका सबसे सरल उपाय उसकी बहिन या लड़की को बदनाम करना समझा जाता है। सामाजिक स्थिति में स्त्रियों को अछूतों से बढ़कर गिना जाता है। हमारी सभा सोसाइटियों के योग्य उन्हें नहीं समझा जाता।
स्त्री जाति पर शत्रु का आक्रमण एक ऐसी घटना हुआ करती थी कि उस पर हमारे वीर पुरुषों के ही नहीं, साधारण लोगों के भी खून उबल पड़ते थे। राम ने रावण को मारा, अपनी स्त्री की रक्षा के लिए। पाण्डवों ने कुरुकुल का संहार किया, द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए। राजपूतों में कितने युद्ध केवल महिलाओं के मान रक्षा के लिए हुए और फिर महिलाएं भी अपनी निज बहिन व बेटी नहीं अपितु जाति की। आज हम लोग अपनी माताओं और बहिनों के लिए गन्दी से गन्दी गालियां सुनते हैं और चुप रहते हैं। विदेशी लेखक और समाचार पत्रों और ग्रन्थों में हमारी स्त्री जाति के लिए निरादर सूचक शब्द लिखते हैं और हम उन्हें पढ़कर चुप रहते हैं। इतना ही नहीं, पिछले साल की मार्शलता की घटनाओं को याद कीजिए। एक विदेशी अफसर आता है और भारत पुत्रियों और माताओं को गांव से बाहर बुलाता है, उनका पर्दा अपनी छड़ी से उठाता है, उनपर थूकता है, उन्हें गन्दी गालियां देता है और भारतवासी हैं, जो इस पर प्रस्ताव पास करते हैं। क्या किसी जीवित जाति में स्त्रियों पर ऐसा अत्याचार सहा जा सकता था? क्या किसी जानदार देश में ऐसा अपमान करने वाला व्यक्ति एक मिनट भी रह सकता है? हम पूछते हैं कि क्या राम के समय के क्षत्रिय, क्या भीम और अर्जुन, क्या हम्मीर और सांगा के समय के राजपूत और क्या शिवाजी के मराठे ऐसे जातीय अपमान को क्षणभर भी सहते? क्या भारत की भूमि ऐसे तिरस्कार के पीछे भी शान्त रहती? कभी नहीं, उसमें वह भूडोल आता जिसमें शासकों का दर्प और पापी का पाप चकनाचूर हो जाता। पर हाय! यह आत्मसम्मान का भाव इस अभागे देश में बाकी नहीं रहा। माताओं और बहनों के लिए वह अतुल भक्ति और प्रेम का भाव अब भारतवासियों में नहीं रहा।
रक्षाबन्धन उन्हीं भावों का चिन्ह था। आज भी वह कुछ सन्देश रखता है। आज भी वह अबला की पुकार देशवासियों के कानों में डाल सकता है- पर यदि कोई सुनने वाला हो। जिनके कान हैं वह रक्षाबन्धन के सन्देश को और अबलाओं की पुकार को सुन सकते हैं। यदि वह भी नहीं सुन सकते, तो फिर हे देशवासियों! अपने भविष्य से निराश हो जाओ। तुम्हारे जीने से न कोई भला है और न उसकी आशा है। जिस जाति के पुरुष अपनी माताओं, बहिनों और पुत्रियों के मान की रक्षा नहीं कर सकते, वह जाति इस भूतल से धुल जाने के ही योग्य है।
-श्रद्धा पत्रिका, ३ सितम्बर १९२० से उद्धृत
प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ
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