वेदों ने विद्या प्राप्त मनुष्यों के लिये द्विज शब्द का प्रयोग किया है”

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ओ३म्
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संसार में दो प्रकार के लोग हैं जिन्हें हम शिक्षित एवं अशिक्षित तथा चरित्रवान एवं चारीत्रिक दृष्टि से दुर्बल कह सकते हैं। सृष्टि के आरम्भ में वेदोत्पत्ति से पूर्व न तो भाषा थी, न ज्ञान और न ही किसी प्रकार का शब्द भण्डार। यह सब वेदों की देन है। वेदों की रचना वा प्रादुर्भाव किससे हुआ, इसका तर्क एवं युक्तियुक्त उत्तर है कि वेदों का आविर्भाव परमात्मा से हुआ है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप एवं सर्वज्ञ सत्ता है। उसने सृष्टि को बनाया है जिसका प्रयोजन अनादि सत्ता जीवात्माओं को उनके पूर्व कल्प के भोग करने से बच गये कर्मों का फल देना रहा है। सृष्टि की रचना ज्ञानपूर्वक हुई है और सृष्टि के सभी पदार्थों सहित प्राणी एवं वनस्पति जगत की रचना भी परमात्मा ने मनुष्यों की उत्पत्ति से पूर्व ज्ञानपूर्वक ही की थी। वह परमात्मा ही सभी जीवधारी प्राणियों को स्वाभाविक ज्ञान देता है जिससे सब प्राणी अपना जीवन व्यतीत करते हैं। ज्ञान की आवश्यकता मनुष्य सहित सभी पशु एवं पक्षियों को होती है। मनुष्येतर योनियों के प्राणियों को परमात्मा ने स्वाभाविक ज्ञान दिया है जिसका उपयोग कर वह अपनी सभी क्रियाओं को करते हैं। उसी परमात्मा ने ही सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को अमैथुनी अर्थात् बिना माता-पिता के संयोग के भूमि माता के गर्भ से उत्पन्न किया था। इसी कारण हम भूमि वा पृथिवी को माता कहकर सम्बोधित करते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि भूमि से ही अन्न प्राप्त होता है और हमारे जीवनयापन की सभी आवश्यक वस्तुयें हमें भूमि माता के द्वारा ही मिनती हैं। अतः इस कारण भी भूमि को माता कहते हैं।

सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा से चार ऋषियों को वेदों का ज्ञान मिला जिसे उन्होंने ब्रह्मा जी नाम के ऋषि को बोलकर वा सुनाकर प्रदान किया। ब्रह्मा जी ने और उन चार ऋषियों ने वेदों का ज्ञान अपने समय के अन्य सभी स्त्री व पुरुषों को प्रदान किया जिससे वेदों के अध्ययन व अध्यापन की परम्परा आरम्भ हुई और आज भी वर्तमान है। वेदों का एक प्रसिद्ध मन्त्र है ‘स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजां पशंु कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्तवा व्रजत ब्रह्मलोकं।।’ इस मन्त्र में परमात्मा ने बताया है कि हम अपने पूर्वज ऋषियों व उनके बाद के पूर्वजों को वरदान देने वाली व वेदों के ज्ञान से सब मनुष्यों को पवित्र करने वाली वेदमाता वा ईश्वर की स्तुति व प्रशंसा करें। वह वेदमाता हमारे हृदय में ज्ञान की प्रेरणा कर हमें पवित्र, विद्वान अर्थात् द्विज बनाती है। वह हमें आयु, प्राण, पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस आदि धनों को प्रदान कर हमें ब्रह्मलोक अर्थात् ब्रह्म-साक्षात्कार कराकर मोक्ष प्रदान करती है। इस मन्त्र में वेदज्ञान को प्राप्त व उसका सदुपयोग करने वालों के लिये द्विज शब्द का प्रयोग किया गया है। इससे हम यह समझते हैं कि वेदों का अध्ययन करने व उसका आचरण करने वाला मनुष्य द्विज होता है। द्विज ही आर्य, मनु, विद्वान आदि नामों से भी कहा व जाना जाता है। द्विज शब्द पर विचार करते हैं तो इसका अर्थ दूसरा जन्म होता है। जिस मनुष्य का दूसरा जन्म अर्थात् विद्या प्राप्त कर जो स्नातक बनता है अथवा जिसका विद्या पूरी कर समावर्तन संस्कार हुआ होता है, वह द्विज कहलाता है। द्विज को दूसरा जन्म लेने वाला इसलिये भी कहा जाता है क्योंकि पहला जन्म तो सभी ज्ञानी व अज्ञानियों का माता के गर्भ से होता ही है। माता के गर्भ से जन्म लेना पहला जन्म होता है। जन्म के समय सभी बच्चे अज्ञानी होते हैं। बिना ज्ञान प्राप्ती के इनका जीवन कृतकार्य नहीं होता। इसलिये इन्हें विद्या की प्राप्ति के अर्थ आचार्यों की शरण में जाकर विद्या प्राप्त कर दूसरा जन्म लेना होता है। जो विद्या व वेद ज्ञान प्राप्त कर लेता है वह द्विज कहलाता है। गुरुकुलों में गुरुकुल का आचार्य ही सभी ब्रह्मचारियों का माता व पिता होता है और वही अपने ब्रह्मचारी व छात्र को दूसरा जन्म प्रदान करता है। अतः द्विज विद्या प्राप्त कर वेद-वेदांग का ज्ञान प्राप्त करने वाले ब्रह्मचारी को कहा जाता था।

हम वर्तमान समाज में भी दो प्रकार के लोगों को देखते हैं। एक शिक्षित होते हैं और दूसरे अशिक्षित। शिक्षित व्यक्ति न केवल ज्ञान के क्षेत्र में अपितु धनोपार्जन के क्षेत्र में भी अशिक्षित बन्धुओं से अधिक उन्नति करते हैं। जो जितना अधिक शिक्षित होता है उसको उतना ही सम्मान मिलता है और जो अल्प शिक्षित व अशिक्षित होता है उसे उसी के अनुसार कम सम्मान मिलता है। इससे हमें शिक्षित और अशिक्षित का भेद पता चलता है। वेदों का सन्देश देते हुए ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज का आठवां नियम बनाया है जिसमें कहा है ‘अविद्या का नाश एवं विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।’ इसका एक अर्थ यह भी प्रतीत होता है कि सबका शूद्रत्व दूर कर उन्हें द्विज बनाना चाहिये। वेदों में यहां तक कहा गया है कि ‘विद्याऽमृतमश्नुते’ विद्या से अमृत वा मोक्ष की प्राप्ति होती है। अविद्या को ज्ञानानुरूप कर्म भी कहा जाता है। विद्वानों के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में ही हमारे अल्पशिक्षित बन्धु विद्वानों द्व़ारा बताये गये कार्यों को करके ज्ञान से युक्त बड़े बड़े कार्यों को करते हैं। ज्ञानी मनुष्य निर्बल भी हो सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि ज्ञानी मनुष्य को जिस विषय का ज्ञान है, उसे सम्बन्धित समस्त कार्यों को वह स्वयं अकेला कार्य में परिणत कर सकता है। भवन निर्माण का कार्य इंजीनियर व श्रमिक दोनों मिलकर करते हैं। इंजीनियर ज्ञान से सम्बन्धित कामों को करता है। यदि उसे श्रमिकों का सहयोग न मिले तो वह अपनी योजना को कार्यरूप नहीं दे सकता। अतः अशिक्षित व अल्पशिक्षित होने पर भी श्रमिक वर्ग के लोग एक इंजीनियर के विचारों व ज्ञान को कार्यरूप में परिणम करते हैं। अतः ज्ञानी एवं अज्ञानी दोनों मनुष्यों का अपना अपना महत्व है। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे होते हैं। जिस प्रकार से तराजू में दो पलड़े होते हैं उसी प्रकार से किसी कार्य की पूर्ति में ज्ञान व कर्म के समन्वित प्रयत्नों से सफलता व सिद्धि प्राप्त होती है। इंजीनियर ज्ञान से युक्त होने के कारण आज की भाषा में शिक्षित व सीमित अर्थों में द्विज कहा जा सकता है। शास्त्रों की मान्यता के अनुसार द्विज वह होता है जिसे वेदों का ज्ञान हो और जो उसके अनुसार आचरण करता हो, परन्तु समय के परिवर्तन के कारण वर्तमान समय में वेदों का ज्ञान नाम मात्र के लोगों को ही है। वर्तमान समय में ज्ञान व विज्ञान पढ़े शिक्षित लोगों को शूद्र व अज्ञानी भी नहीं कहा जा सकता। इस दृष्टि से इंजीनियर व अन्य शिक्षित लोगों को सीमित अर्थों में द्विज माना जा सकता है।

वेदाध्ययन करते हुए द्विज सम्बन्धी ‘जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते’ वाक्य भी हमारे सम्मुख आता है। इस वाक्य में बताया गया है कि जन्म से सभी मनुष्य वा शिशु शूद्र अर्थात् ज्ञानहीन होते हैं। इसके बाद ब्रह्मचर्य आश्रम में आचार्य को प्राप्त होकर व उनसे संस्कार पाकर वह द्विज बनते हैं। हम जानते हैं कि बच्चों को माता-पिता से बहुत से संस्कार मिलते हैं परन्तु आचार्यों से विद्यार्थी की बौद्धिक क्षमता के अनुसार जो ज्ञान प्राप्त होता है वह माता-पिता व अन्य किसी साधन से नहीं होता। वर्तमान में भी हम विद्यालयों में अनेक विषयों के आचार्यों सहित पुस्तकों से बहुत प्रकार का ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस ज्ञान में संस्कार अर्थात् यम व नियमों सहित चरित को श्रेष्ठ व महान बनाने वाले चारित्रिक गुण भी प्राप्त होते हैं। इन सभी गुणों को धारण करके ही मनुष्य द्विज बनता है। विद्यालयों में आजकल देखा जता है कि वहां अनेक धनाड्य व निर्धन परिवारों से बच्चे शिक्षा प्राप्त करने के लिये आते हैं। ऐसा भी होता है कि कुछ परिस्थितियों में निर्धन परिवार के छात्र अपने मध्यम व उच्चवर्गीय परिवारों के छात्रों की अपेक्षा परीक्षा में वरीयता प्राप्त करते हैं। विद्यार्थी जीवन में हम भी एक अतीव निर्धन परिवार के विद्यार्थी थे। हाईस्कूल व इण्टर की परीक्षा में हमें लगभग लगभग 150-200 कुल विद्यार्थियों में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। इस आधार पर हमें लगता है कि कुछ परिस्थितियों में निर्धन व शूद्र परिवारों के बच्चें भी शिक्षा में अपने सहपाठी मध्यम व उच्च श्रेषी के परिवारों के बच्चों की तुलना में वरीयता प्राप्त करते हैं। अतः समाज के सभी बच्चों को शिक्षा की प्राप्ति में समान सुविधायें मिलनी चाहिये। यह उनका अधिक है। ऋषि दयानन्द जी ने भी अपने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में सबके लिये समान, निःशुल्क एवं आनिवार्य शिक्षा का समर्थन व विधान किया है। धनवान व निर्धन परिवारों के बच्चों को समान आसन, भोजन, वस्त्र आदि का समर्थन भी वह करते हैं। यह सुविख्यात है श्री लाल बहादुर शास्त्री एवं श्री नरेन्द्र मोदी जी निर्धन परिवारों से सम्बन्ध रखते हैं। इन्होंने धनवान एवं विदेशों में शिक्षित लोगों को अपने गुणों एवं कार्यों में पीछे छोड़ दिया है। चरित्र की दृष्टि से भी यह औरों से आगे हैं। अतः जन्म से कोई बच्चा द्विज पैदा नहीं होता। सभी बच्चों में भविष्य का एक महापुरुष छिपा हुआ होता है। अतः शिक्षा प्राप्त कर ही मनुष्य अपनी योग्यता, गुणों व सुच्चरितों के आधार पर ही द्विज बनता है।

भारत में सृष्टि के आरम्भ से वेदों का ज्ञान था। ऋषियों का प्राय: सभी विषयों पर भी प्रचुर साहित्य उपलब्ध था। महाभारत काल तक भारत ज्ञान व विज्ञान में सम्पन्न था। इसके बाद पतन आरम्भ हुआ। तीन-चार सौ वर्ष पूर्व यूरोप आदि देशों में न तो वेदों का ज्ञान था और न ही वहां भारत जैसी समाज व्यवस्था थी। ऐसा होने पर भी भौतिक ज्ञान व विज्ञान के क्षेत्र में जितनी उन्नति यूरोप के लोगों ने की है, वह प्रशंसनीय है। वर्तमान का भारत भी यूरोप के पद्चिन्हों पर चल रहा है। यूरोप के लोग भारत के लोगों से अधिक अनुशासनप्रिय भी देखे जाते हैं। हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। ऐसा लगता है कि द्विज बनने का कुछ व अधिकांश भाग यूरोप के लोगों ने अपने विचार, चिन्तन, ज्ञान व विवेक से स्वयं प्राप्त कर लिया है। हमारे देश के लोगों ने अन्धविश्वासों व मिथ्या सामाजिक परम्पराओं सहित मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, जन्मना जातिवाद आदि में फंसकर वेदों के ज्ञान की उपेक्षा की। यूरोप के वैज्ञानिकों ने मिथ्या मतों का त्याग कर भौतिक विषयों का अध्ययन किया और विज्ञान के क्षेत्र में अनेक कीर्तिमान स्थापित किये। महर्षि दयानन्द (1825-1883) ने अपने जीवन में सभी धार्मिक एवं सामाजिक अन्धविश्वासों एवं मिथ्या परम्पराओं का खण्डन किया था और देश को सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करने की प्रेरणा की थी। उन दिनों यूरोप के लोग ज्ञान-विज्ञान को आगे बढ़ा रहे थे। ऋषि दयानन्द की मृत्यु के बाद ही वायुयान जैसी विज्ञान की अनेक खोजें विश्व में हुई। अतः हमारे देश को धार्मिक अज्ञान, अन्धविश्वासों एवं मिथ्या सामाजिक परम्पराओं का त्याग कर वेद और वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिये। ऐसा करके हम अध्यात्म एवं भौतिक विज्ञान में आगे बढ़ सकते हैं। यदि ऋषि दयानन्द को हमारा देश अपना आदर्श मान ले तो वह ज्ञानोन्नति में यूरोप से प्रतिस्पर्धा कर सकता है। हम भौतिक विषयों के ज्ञान सहित आध्यात्मिक उन्नति में आगे बढ़कर विश्व का मार्गदर्शन कर सकते हैं। वर्तमान समय में भारत के बहुत से लोग योग आदि के माध्यम से कुछ आध्यात्मिक मूल्यों का विश्व में प्रचार कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वह कुछ न कुछ अन्धविश्वासों एवं प्रलोभनों से ग्रस्त है। विश्व ने योग के अन्धविश्वासरहित रूप को ही अपनाया है। हमें ऋषि दयानन्द से प्रेरणा लेकर सन्ध्या एवं अग्निहोत्र-देवयज्ञ का भी विश्व व्यापी प्रचार करना चाहिये। द्विज बनने का अर्थ आध्यात्मिक एवं भौतिक ज्ञान विज्ञान में उन्नति करना होता है। हमने द्विजत्व एवं इससे सम्बन्धित कुछ विषयों की चर्चा की है। इस चर्चा को हम विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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