एक आदिवासी महिला के राष्ट्रपति बनने से ईसाइयत के विस्तार पर लगेगा अंकुश

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प्रमोद भार्गव
भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय  जनतांत्रिक गठबंधन ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के बहाने फिर एक बड़ा दांव खोला है। दलित समुदाय से आने वाले रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने के बाद महिला आदिवासी नेता द्रौपदी मुर्मू को एनडीए ने राष्ट्रपति पद के लिए अपना प्रत्याषी घोषित कर जनजाति समुदाय को लुभाने का दांव चल दिया हैं। देश में करीब 13 करोड़ आदिवासी हैं। आजादी के 75वें वर्ष में पहली बार इस जाति के व्यक्ति को देश का प्रथम नागरिक बनाने की सार्थक पहल हुई है। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान मुस्लिम समुदाय से एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनने का मौका मिला था। महिला राष्ट्रपति के रूप में कांग्रेस प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बना चुकी है। सोषल मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब दलित, मुस्लिम और महिला को राष्ट्रपति बना देने से इन समाजों को समग्र भला नहीं हुआ, तो फिर मुर्मू के राष्ट्रपति बन जाने से आदिवासी समुदाय का कौनसा भला हो जाएगा। बौद्धिक समुदाय के यह प्रश्न नितांत बौने एवं अप्रासंगिक हैं। दरअसल किसी भी वंचित या पिछड़े समुदाय का व्यक्ति राष्ट्र के गौरव का प्रतीक बनता है तो उस समुदाय की अस्मिता का आत्मबल बढ़ता है और वह बड़े सामाजिक समुदाओं के बराबर आ खड़ी होता है। मंडल आयोग के लागू होने के बाद पिछड़ी जातियां आज देश के नेतृत्व का प्रमुख आधार बनी हुई हैं। यही नहीं मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से आदिवासियों का सुनियोजित ढंग से जो ईसाईकरण हो रहा है, उस पर अंकुश लगेगा, हिंदुओं से तोड़ने के लिए इनकी अलग गिनती कराने का जो षड्यंत्र रचा जा रहा है, उसके विरुद्ध इस समुदाय की आवाज बुलंद होगी और हिंदुत्व खंडित होने से बचेगा। इस चाल के बहाने भाजपा की निगाह लोकसभा की 543 सीटों में से उन 47 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी है, जो आदिवासी बहुल हैं। गोया, देश की संप्रभुता से इस समुदाय को जोड़े रखने की भी यह एक बड़ी राजनीतिक पहल है।  
परतंत्र भारतीय व्यवस्था में अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने भारतीय आदिवासियों के प्रति दोहरी और दोगली दृष्टि अपनाई थी। अतएव उनकी जीवन और संस्कृति को बदलने के उपाय उनकी जीवन-षैली क अध्ययन के बहाने से षुरू किए गए थे। यह अध्ययन उन्हें मानव मानकर चलने से कहीं ज्यादा, उन्हें वस्तु और वस्तु से भी इतर पुरातत्वीय वस्तु मानकर किए गए। नतीजतन आदिवासी अध्ययन और संरक्षण की सरकारी स्तर पर नई शाखाएं खुल गईं। आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों को काम के लिए उत्साहित किया गया। मिशनरियों ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम तो किए, लेकिन सुनियोजित ढंग से धर्म परिवर्तन के अभियान भी चलाए। इन अभियानों में बौद्धिक भारतीयों के तर्क बाधा न बनें, इसलिए कई आदिवासी बहुल क्षेत्रों को ‘वर्जित क्षेत्र‘ घोषित करने की कोशिशें हुईं। बहाना बनाया गया कि इनकी पारंपरिक संस्कृति और ज्ञान परंपरा को सुरक्षित बनाए रखने के ये उपक्रम हैं। मिशनरियों को स्थापित करने के परिप्रेक्ष्य में तर्क दिया कि इन्हें सभ्य और शिक्षित बनाना है। किंतु ये दलीलें तब झूठी सिद्ध हो गई, जब संस्कृति और धर्म बदलने के ये कथित उपाय अंग्रेजी सत्ता को चुनौती बनने लगीं। स्वतंत्रता आंदोलन की पहली चिंगारियां इसी दमन के विरुद्ध आदिवासी क्षेत्रों में फूटीं। भील और संथाल आदिवासियों के विद्रोह इसी दमन की उपज थे। जिस 1857 को देश का सुनियोजित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, उसमें आहुति अनेक आदिवासी समुदायों ने दी। बिरसा मुंडा, तिलका मांझी,  ठक्कर बापा और गुंडाधुर जैसे आदिवासी क्रांति के नायकों की एक पूरी श्रृंखला हैं। द्रौपदी मुर्मू ओडिषा के मयूरभंज जिले के ऐसे ही क्रांतिकारी संथाल आदिवासी समुदाय से आती हैं। ओडिषा, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य-प्रदेश और झारखंड ऐसे राज्य हैं, जहां आदिवासी समुदाओं का सबसे ज्यादा धर्मांतरण ईसाई मिषनरियों ने किया है।

संघ एवं भाजपा का लक्ष्य उन कानूनी लोचों को ख्त्म करना भी है, जिनके बूते आदिवासियों का धर्मांतरण आसान बना हुआ है।  लोकसभा के पिछले सत्र में भाजपा के दो सांसद झारखंड के निषिकांत दुबे और मध्यप्रदेश के ढालसिंह बिसेन ने धर्मांतरण के इस  मुद्दे को उठाते हुए मांग की थी कि ‘दूसरा धर्म अपनाने वाले लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। क्योंकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन का चलन लगातार बढ़ रहा है।‘ दरअसल संविधान के अनुच्छेद-342 में धर्म परिवर्तन के संबंध में अनुच्छेद-341 जैसे प्रावधानों में लोच है। 341 में स्पश्ट है कि अनुसूचित जाति (एसटी) के लोग धर्म परिवर्तन करेंगे तो उनका आरक्षण समाप्त हो जाएगा। इस कारण यह वर्ग धर्मांतरण से बचा हुआ है। जबकि 342 के अंतर्गत संविधान निर्माताओं ने जनजातियों के आदि मत और पुरखों की पारंपरिक सांस्कृतिक आस्था को बनाए रखने के लिए व्यवस्था की थी कि अनुसूचित जनजातियों को राज्यवार अधिसूचित किया जाएगा। यह आदेश राष्ट्रपति द्वारा राज्य की अनुशंसा पर दिया जाता है। इस आदेश के लागू होने पर उल्लेखित अनुसूचित जनजातियों के लिए संविधान सम्मत आरक्षण के अधिकार प्राप्त होते हैं। इस आदेश के लागू होने के उपरांत भी इसमें संशोधन का अधिकार संसद को प्राप्त है। इसी परिप्रेक्ष्य में 1956 में एक संशोधन विधेयक द्वारा अनुसूचित जनजातियों में धर्मांतरण पर प्रतिबंध के लिए प्रावधान किया गया था कि यदि इस जाति का कोई व्यक्ति ईसाई या मुस्लिम धर्म स्वीकार्यता है तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। किंतु यह विधेयक अब तक पारित नहीं हो पाया है। अनुच्छेद 341 के अनुसार अनुसूचित जातियों के वही लोग आरक्षण के दायरे में हैं, जो भारतीय धर्म हिंदू, बौद्ध और सिख अपनाने वाले हैं। गोया, अनुच्छेद-342 में 341 जैसे प्रावधान हो जाते हैं, तो अनुसूचित जनजातियों में धर्मांतरण की समस्या पर स्वाभाविक रूप से अंकुश लग जाएगा। द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐसे झोलों को खत्म करने की संभावना बढ़ जाएगी।      
झारखंड के आदिवासी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक आभासी परिचर्चा में कहा था कि भारत के आदिवासी हिंदु नहीं हैं। वे पहले न कभी हिंदू थे और न कभी हिंदू होंगे। झारखंड में 32 आदिवासी प्रजातियां हैं, जो अपनी भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों को अस्तित्व में बनाए रखने के लिए संघर्षरत हैं। उन्होंने यह बात अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक वेबीनार में कही थी। इस बयान को लेकर विश्व हिंदू परिषद के महासचिव मिलिंद परांडे ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सोरेन के बयान को ईसाई मिशनरियों की कुटिल चाल बताया था। दरअसल सोरेन जबसे झारखंड के मुख्यमंत्री बने हैं, तभी से 2021 के जनगणना पत्रक में नए काॅलम और कोड को लेकर विवादित बयान दे रहे हैं। भारत में ऐसे अनेक वामपंथी बौद्धिक हैं, जो भारतीय जाति व्यवस्था को लेकर दुराग्रहों से भरे हैं। जबकि स्वयं उसी जातिवाद के अनुयायी हैं। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा इस कोशिश में रहा है कि आदिवासी जनगणना प्रारूप में अपना धर्म हिंदू लिखें। प्रकृति के उपासक देश के सभी 645 आदिवासी समुदाय हिंदू हैं, क्योंकि वे भगवान शिव की पूजा के साथ उन सभी देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, जिनकी बृहद हिंदू समाज पूजा करता है। यही नहीं इन्हीं देवों से वे अपनी उत्पत्ति बताते हैं। देशभर की आदिवासी लोक-कथाएं इन तथ्यों की पुष्टि करती हैं। वाल्मीकि रामायण और महाभारत में आदिवासियों को वनवासी कहा गया है। इन वनवासी पात्रों की मान्यता समूची सनातन संस्कृति में राम और कृष्ण के समतुल्य है।    

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