पुस्तक समीक्षा : सरगम काव्य – धारा

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बादल वही बरसता है यारों, जो जल से होगा भरा।
बिजली वही गिराएगा यारों ,जो जल से होगा भरा ।।
वो बादल कैसे बरसे, जिसमें जल का नहीं निशां।
ए बुलबुल तू सुना दे, ऐ कोयल तू ही सुना दे।
मेरे मीत का बयां, मेरे मीत का बयां।

हरीश चंद्र शर्मा सरगम द्वारा लिखित ‘सरगम काव्यधारा’ कुछ इसी प्रकार की काव्य धारा को प्रकट करती हुई आगे बढ़ती है। कवि की ‘ऐ फूल तू बता दे’- नामक कविता की पंक्तियां बताती हैं कि वह प्रकृति से बात करने में अपने आपको आनंदित अनुभव करते हैं। कवि ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया है कि मुझे भी पहला प्रेम प्रकृति से हुआ। वक्त के थपेड़ों ने अज्ञात से लगाव लगा दिया और एकांत की मजबूरियों ने चिंतन को मनन में बदल दिया। जो कुछ भी लिखा वह कोई भीतर मन में बैठकर लिखा गया, मैं इस काबिल कहां?
इस काव्य धारा को विभिन्न विषयों के विभिन्न रसों से परिपूर्ण किया गया है । जिसमें कवि ने अपनी बौद्धिक ऊंचाई और सांस्कृतिक चेतना को मनोरंजन के सुमेल के साथ हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। अपनी कविता ‘कोई निहारता है’ में कभी की ये पंक्तियां किसी प्रेमी के लिए बड़ी सार्थक होती हैं :-

है कौन जो मेरे संग संग सदा घूमता है ।
आता नहीं नजर पर मुझको संभालता है।।
जी रही हूं कब से किसका मिला सहारा।
तूफान चल रहा है इम्तिहान है हमारा।।

यह कभी संभव नहीं कि कोई कवि वर्तमान व्यवस्था पर ना बोले। हरीश चंद्र शर्मा जी ने भी वर्तमान व्यवस्था पर खुलकर बोला है। उन्होंने आज के भारत के सोए हुए युवाओं को जगाने का आवाहन बड़ी ही सशक्त भाषा में किया है। ‘बीन बजाना छोड़ दो’ – नामक अपनी कविता में वर्तमान युवा पीढ़ी का आवाहन करते हुए वह लिखते हैं।

ओ भारत के सोए शेरों दुश्मन का मुंह मोड़ दो।
आतंकी नागों हमसे आगे बीन बजाना छोड़ दो ।।
आज हिमालय के शिखरों से शंखनाद ये करना है,
दहशतगर्दों की छाती पर तांडव नर्तन करना है।।

राष्ट्रवाद का जागरण कवि की विशिष्टता होती है। कवि राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में हर काल में कार्य करता है। यही कारण है कि श्री शर्मा ने क्रांतिकारी आंदोलन के महानायकों के बारे में भी बड़े ओजपूर्ण ढंग से लिखा है:-

वो हंसते थे ना रोते थे , फूलों की नोक पर चलते थे।
वह लाल बहादुर ऐसे थे, जो देश धर्म पर मरते थे ।।
उनकी जादुई वाणी से ,अभिमान से जनता झूम उठी।
अंग्रेजों ! भारत छोड़ो , सारी जनता हुंकार उठी।।

हरिश चंद शर्मा सरगम जी की इतिहास पर भी गहरी पकड़ है। उन्होंने भारत के गौरवपूर्ण अतीत पर भी गहन अध्ययन किया है। अपनी कविता ‘जय भारत भूमि भवानी की’ में उनका इतिहास चिंतन और भारत माता के प्रति गौरव से भरा कवि ह्रदय स्वाभाविक रूप से इन पंक्तियों को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है :-

कर्ण, दधीचि, शिवि, हरीशचंद्र सिरमौर हैं भारत माता के।
चंद्रगुप्त, अशोक, शिवाजी अभिमान हैं, भारत माता के।।
राणा प्रताप और सुभाष चंद्र जय बोलो अमर सेनानी की,
एक बार सब प्रेम से बोलो ………

यह पुस्तक कुल 158 पृष्ठों में लिखी गई है। पुस्तक का मूल्य ₹250 हैं। पुस्तक के प्रकाशक साहित्त्यागार धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता जयपुर , दूरभाष 0141- 2310785, 4022382 है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

1 thought on “पुस्तक समीक्षा : सरगम काव्य – धारा

  1. श्री हरीश चंद्र शर्मा सरगम द्वारा लिखित पुस्तक ‘सरगम काव्यधारा’ की डाॅ. राकेश कुमार शर्मा द्वारा लिखी समीक्षा पढ़कर बहुत अच्छा लगा। समीक्षक ने श्री सरगम की कविता की पर्याप्त जानकारी उपलब्ध करा दी है। कृतिकार और समीक्षक दोनों को हार्दिक बधाई।

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