सरकारों की गलत नीतियों  के कारण कर रहे हैं किसान आत्महत्या

देश में खराब मौसम के कारण रवि फसल में कृषि उत्पादन की स्थिति दयनीय होती देख किसानों की आत्महत्या करने का सिलसिला सा देश में चल गया है। इस विषय में देश की सरकार और प्रदेशों की सरकारों की ओर से भी बयान आये हैं कि किसानों को उनकी बर्बाद फसल का उचित मुआवजा दिया जाएगा, और किसानों को आत्महत्या नही करने दी जाएगी। पर ये सब बयान निरर्थक सिद्घ हो रहे हैं।

अब प्रश्न पर सीधे आते हैं कि किसान आत्महत्या कर क्यों रहे हैं? इसका कारण है आजादी के बाद से ही सरकार द्वारा अपनायी गयीं गलत नीतियां। कृषि और किसान के विषय में हमारी प्राचीन और परंपरागत कृषि नीतियां बड़ी तार्किक, प्राकृतिक तथा वैज्ञानिक थीं। कृषि का प्रकृति के साथ सीधा संबंध रहा है। खेती को तालाबों में को भरे हुए जल से, कुओं के जल से, झील तालाब, नदी या नहर आदि प्राकृतिक साधनों के माध्यम से किया जाता था। जिससे जल दोहन कम होता था। पर आजादी के बाद हमारी सरकारों के द्वारा खेती की सिंचाई हेतु नलकूप लाया गया।  1965-66 तक नलकूपों की संख्या जहां हजारों में थी, वहीं सन 2000 के आते-आते यह संख्या लाखों में पहुंच गयी। जिससे भूगर्भीय जल का दोहन बड़ी तेजी से हुआ और भूगर्भीय जलस्तर गिरने से तालाब, झील, और नदियां तक सूखने लगीं।

नदी सदा उस स्तर पर बहती है जिस पर नीचे से पानी का स्रोत स्वयं ही फूटता रहता है और वह नदी को सूखने नही देता है। पर जब नदी के आसपास के ट्यूबबैलों ने पानी का  स्तर 100-200 फीट गिरा दिया तो 100-50 फीट गहराई पर बहने वाली नदी के पानी को उल्टा धरती ही पीने लगी। अधिक भूगर्भीय जल का दोहन करके हमने धरती को प्यासी मारना आरंभ किया तो धरती ने हमारे हिस्से का पानी छीनना आरंभ कर दिया।

हम कुंओं से रहट चलाते थे, तो आवश्यकतानुसार पानी  प्राप्त करते थे। गायादि पशुओं के गोबर से खाद तैयार कर लेते थे, खेती में नीम की पत्तियों का खाद डालने की परंपरा भी रही थी। जुताई बैलों से होती थी। इस प्रकार किसान के लिए खाद, पानी, जुताई आदि मुफ्त थे। जिनसे उसे कोई आर्थिक बोझ अनुभव नही होता था। पर आजादी के पश्चात सरकारी नीतियों ने ये सब चीजें मोल बेचनी आरंभ कर दीं। पानी महंगा, जुताई महंगी, खाद महंगा, बीज महंगा, और फिर कीटनाशक महंगे। इन सबके मूल्य के अनुपात में कृषि उत्पादन सस्ता हो गया। पशुओं को काटकर समाप्त करते जा रहे समाज में भूसा या चारे की खपत कम होती जा रही है, जिससे किसान के पास जैविक खाद भी अब नही के बराबर ही रहता है, साथ ही घर में पशु न होने के कारण पशुओं के भूसे को खेत में ही जलाने की प्रवृति बन गयी है।

इस प्रकार की प्रवृत्ति के कारण करोड़ों का कृषि उत्पादन भूसा आदि के रूप में हर वर्ष यूं ही जलाकर नष्ट कर दिया जाता है। जिससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है, दूसरे जो धन किसान को मिलता उसमें वह स्वयं ही आग लगा रहा है। उसे दूधादि से जो आय होती थी उसे कुछ कंपनियों ने छीन लिया है और ये कंपनियां सरकार के संरक्षण में रहते हुए किसान को पशुविहीन कर उसके दूध के उपभोक्ता को तथा उसको स्वयं को अपने दूध पर निर्भर कर देना चाहती हैं। इससे कृषि क्षेत्र में लगे लोगों की आर्थिक अवस्था बड़ी ही दयनीय होती जा  रही है। कृषि उत्पाद केवल अन्न, दाल तक सीमित कर दिया गया है। पशुपालन और दुग्धोत्पादन के उसके परंपरागत व्यवसाय को उससे छीना जा रहा है। कई स्थानों पर तो पूर्णत: छीन ही लिया गया है।

आप आलू की खेती का उदाहरण लें। एक आलू (वजन लगभग 100-150 ग्राम) को किसान से एक रूपये में लिया जाता है, और उसे चिप्स आदि बनाने वाली कंपनियां 15-20 रूपये में बेचती हैं। किसान को लागत मूल्य भी नही मिला और कंपनियों को ‘भागत मूल्य’ (भाग्य से प्राप्त) भी मिल गया। लगता है किसान को मरने के लिए ही छोड़ दिया गया है एक किलो आलू आपको किसान से 5-10 रूपये किलो मिल सकता है, पर वही आलू ढाबे पर जाकर सब्जी बनते ही 150 से 200 रूपये किलो तथा पांच सितारा होटलों में 1000-1500 रूपया किलो हो जाता हैै। जहां चोर बैठे हैं, वहां किसी का ध्यान नही है, और जहां मालिक मर रहा है, वहां सब आंसू बहा रहे हैं। देश के लिए यह शर्मनाक स्थिति है। यही स्थिति अन्य कृषि उत्पादों की है।

देश में एक वर्ग को चूसने की और एक को रातों रात (कमीशन ले लेकर) मालामाल करने की नीतियों को लागू किया गया है। हमारे लोकतांत्रिक समाजवाद के इस रक्त चूसने वाले स्वरूप को देखकर नही लगता कि हम किसी लोकतांत्रिक समाजवादी देश के नागरिक हैं। किसानों को उजाडऩे की नीतियों में सारे दल एक ही सांझा कार्यक्रम पर कार्य कर रहे हैं। किसी के पास कोई ठोस नीति नही है। चाहे कोई समाजवादी हो चाहे कोई भाजपावादी, कांग्रेसवादी या ‘ममतावादी, ‘मायावादी’ हो या ‘ललितावादी’ हो, सबका लक्ष्य एक ही है कमीशनखोरों को संरक्षण दो और मौज लो। ऐसी परिस्थितियों में किसान का दर्द बढ़ता जा रहा है, आर्थिक विषमताएं और आर्थिक विपन्नताएं उसका गला घोंटती जा रही हैं, और वह छटपटा कर मरने की तैयारी कर रहा है। समय रहते देश की केन्द्र सरकार व प्रदेश सरकारों को किसानों के मरने के असल कारणों को तलाशना होगा। पी.एम. किसान के ‘मन की बात’ को समझें और उसके दर्द का उपचार करें। अन्नदाताओं को देश का ‘राजा’ बनायें इसलिए सरकारी नीतियों की पूर्ण समीक्षा की जानी आवश्यक है।

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