200 साल पहले साधु सुंदरदास ने ईसाइयत को कैसे रोका

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देवेन्द्र सिंह आर्य( चेयरमैन ‘उगता भारत’ समाचार पत्र)

प्रायः यह कहा जाता है कि यदि हिंदुओं को तलवार या धन के कारण मुस्लिम या ईसाई बनया जाता तो आज एक भी हिन्दू नहीं बचता। हिंदुओं कि रक्षा के लिए धर्म सत्ता ( संत कबीर, रविदास, सुंदरदास, समर्थ गुरु रामदास और महर्षि दयानन्द आदि ) और राजसत्ता ( शिवाजी, राणा प्रताप और दुर्गादास आदि) लड़ती रही। आज भी सनातन का विजयरथ रुका नहीं है।
प्रस्तुत चित्र मे बाएँ जनेऊ धारण किये 300 युवा ब्राह्मण नही बल्कि सनातनि आदिवासी है जो छत्तीसगढ़ के कैलाश गुफा में शिवरात्रि दिन आचार्य द्वारा जनेऊ धारण कर सनातन धर्म का प्रचार प्रसार गृहस्थ जीवन में रह कर करने का संकल्प लिया।
दाएँ मे रांची के निकट गढ़वा जिले मे भंडारिया प्रखण्ड के सरडीह गाँव मे 181 परिवारों की घर वापसी कारवाई गई। ईसाई बने ये परिवार वापिस अपने मूल धर्म मे आ गए हैं।

200 साल पहले साधु सुंदरदास ने ईसाइयत को कैसे रोका —
सुंदर दास ओडिशा के जाने माने साधु थे।उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में कटक शहर के निकट कुजीवर में उनका आश्रम था।इस आश्रम में किसी प्रकार का जातिभेद नहीं था।स्त्री-पुरुष को समान अधिकार प्राप्त थे और प्रतिमा पूजन भी नहीं था।ऐसे समय जब संपूर्ण ओडिशा जातिवाद , अंधविश्वास और छूआछूत में जकड़ा हुआ था सुंदर दास ही एकमात्र आशा की किरण थे।जब पादरी यहां आये तो उन्होंने प्रचलित हिंदू धर्म की कुरीतियों और मूर्ति पूजा और अनेक देवी देवताओं की पूजा को निशाना बनाते हुये मौके का फायदा उठाना चाहा।चूंकि सुंदर दास की बहुत प्रसिध्दि थी और हिंदू धर्म अनेक धार्मिक कुरीतियों को अपने में समेटे मात्र मूर्ति पूजा में सिमट गया था , पादरियों को लगा कि यदि किसी भी प्रकार से सुंदर दास को प्रथम ओडिया ईसाई बना दिया जाये तो गांव के गांव अपने आप ईसाई बनने लगेंगे।
शुरूआती असफलता के बाद ये पादरी 1926 में उनसे मिले और ईसाइयत की ऊपर से अच्छी दिखने वाली शिक्षाओं की चर्चा की।सुंदर दास को लगा कि उनके आश्रम की शिक्षायें भी तो यही हैं लिहाजा उन्होंने अपने शिष्यों को भी इन शिक्षाओं के प्रचार में लगा दिया।उन्हें स्वप्न में भी यह अनुमान नहीं था कि उनके साथ पादरी विश्वासघात करेंगे और एक एक कर उनके सभी प्रमुख शिष्यों को बरगलाकर डुबकी लगवा देंगे।अपने हर शिष्य को लगवाई गई डुबकी पर उन्होंने अपना तीखा विरोध जताया।पानी उनके सर से तब गुजरा जब पादरियों ने हिंदू महिलाओं को भी पिता , पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर पानी में डुबकी लगवाना शुरु किया।अब उन्होंने डुबकी लगवाने वालों से उन्ही की शैली में जनता के बीच निपटना शुरु कर दिया।पादरियों पर औरतों को बरगलाने का मुकदमा भी दर्ज किया।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने पादरियों पर उस समय के कानून के तहत बिना पतियों की अनुमति के उनकी पत्नियों को डुबकी लगवाने के जुर्म में जुर्माना लगाया। कंपनी को व्यापार से ही मतलब था और वो फालतू पचड़ों मे नहीं पड़ना चाहती थी।यह पुरी के जगन्नाथ मंदिर को इसीलिए आर्थिक सहायता भी दिया करती थी।पादरियों पर जुर्माना लगते ही ग्रामीणों में यह डर की अंग्रेज पादरियों के समर्थन में हैं खत्म हो गया।वो अब बिना डरे पादरियों को परेशान करने लगे। ग्रामीण जनता को अब आभास हुआ कि सुंदर दास भी धर्म परिवर्तन के खिलाफ हैं और वो डुबकी लगवाने वालों से दूर होने लगी।मुकदमे के साथ ही सुंदर दास ने जनता के बीच डुबकी लगवाने वालों से धर्म चर्चा में साफ कर दिया कि ऐसी एक भी खास या नई बात ईसाइयत में नहीं है जो हिंदू धर्म में नहीं है और इसलिये ईसाइयत किसी भी हिंदू के लिये व्यर्थ है।
इतिहास में सुंदर दास पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने पादरियों द्वारा ‘लव क्रुसेड (जिहाद) द्वारा हिंदू महिलाओं को येशु के लव में बरगलाकर फांसने का जनता के मध्य और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से सफलता पूर्वक विरोध किया।
पादरियों की टोली भी निराश हो चली थी।बीमारी के चलते एक-एक कर पादरियों की मौतें भी होने लगीं।ग्रामीणों ने और घरवालों ने हिंदू से ईसाई बने लोगों का संपूर्ण बहिष्कार कर दिया।नतीजन जो ईसाई बने वो न घर के रहे न घाट के।। ईसवी 1938 में सुंदर दास का देह़ांत हो गया और आज भी उनका आश्रम कटक में मौजूद है।निराश होकर डुबकी लगवाने वाले भी वापस चले गये।जाते-जाते इतनी ईमानदारी दिखला ही दी यह कहकर कि जिनको डुबकी लगवाई उनका कुछ भी भला नहीं हुआ।
इतिहास के पन्नों में दफन इन तथ्यों पर गहन शोध कर समकालीन ओडिया कवियों में एक चर्चित नाम जगन्नाथ प्रसाद दास , भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत्त, ने नाट्य शैली में इसको पुस्तक का रुप दिया है।उन्नीसवी शताब्दी के ओडिशा की पृष्ठभूमि में सुंदर दास एवं डुबकी लगवाने वालों का द्वंद ही सुंदर दास नाटक की विषय वस्तु है।नाटक में वर्णित मुख्य घटना का आधार ऐतिहासिक है तथा इससे संबंधित विवरण उस समय के पादरियों द्वारा लिखित दैनन्दिनी , पुस्तक और कोलकता से प्रकाशित क्रिश्चियन पत्र-पत्रिकाओं से सग्रहित किया गया है।जगन्नाथ दास वर्ष 1991 में केंद्र साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भी हैं। ये पुरस्कार न लौटाने के कारण सहिष्णु भी हैं।ओडिया में लिखे इस वृहद् नाटक का स्मितरेखा राय ने हिंदी में दक्षता से अनुवाद किया है जिसके लिये उन्हें वर्ष 1996 के सोमदत्त सम्मान से सम्मानित किया गया है।
आइये तथ्यों की रोशनी में संक्षेप में जाने डुबकी लगवाने वालों और ग्रामीण जनता के बीच क्या और कैसे बातचीत हुआ करती थी।
साटन : भाइयो और बहनो , लीजिये , लीजिये , बिना मोल के लीजिये ल्यूकलिखित , मैथ्यू लिखित , मार्कलिखित , जानलिखित मंगल समाचार। ईश्वर के समस्त वाक्य बाइबिल। दस आज्ञा प्रश्नोत्तरी।
ग्रामीण : जब हम ताड़ के पत्ते पर लिखवाने जाते हैं तो पंडित हमसे पैसा मांगता है।ये पादरी मुफ्त में इतनी किताबें बांट रहे हैं तो जरुर कंपनी इन्हें पैसा देती होगी।पूछता हूं।ए पादरी क्या कंपनी आपको कितना पैसा देती है ?
साटन : ये कंपनी की नहीं बैपटिस्ट मिशन की किताबें हैं।आपकी सेवा के लिये इन्हें मुफ्त में बांटा जा रहा है।
ग्रामीण : तुम्हारे देश के लोग हमारे लिये क्यूं पैसे खर्च कर रहे हैं ?
साटन : वो ईसा मसीह को मानते हैं और चाहते हैं विश्व में सभी उन्हें माने।
ग्रामीण : इसके लिये आपको कितनी पगार मिलती है ?
साटन : आपको इससे क्या मतलब ?
ग्रामीण : मतलब नहीं फिर भी जानकारी के लिये।
साटन : बस खाना पीना और रहने का खर्च ।
ग्रामीण : केवल इसके लिये इतनी दूर से क्यों आये हो ? ये कंगाल पादरी , इन्हें अपने देश में खाना पीना नहीं मिलता होगा तो यहाँ चले आये हैं।किताबों की जगह गांजा या चरस बांटते तो अच्छा रहता।
साटन : क्या कहा ?
ग्रामीण : मेरा सर ।तुम किताबों के साथ पैसा भी दोगे तो हम न लेंगे।कागज पर छपी पुस्तक देकर हमारी जात लेना चाहते हो।तुम्हारी पुस्तक में टोटका किया हुआ है।हम टोटके वाली किताब नहीं छुयेंगे।हमारे पास तो ताड़ के पत्तों पर लिखी पोथियां हैं , तुम्हारे शास्त्र की जरूरत नहीं।
बांपटन : ईसा मसीह ईश्वर के इकलौते पुत्र हैं।वो आपका उध्दार करेंगे अगर आप उनकी महिमा सुने तो।
ग्रामीण : पहले हमको ये बता दो ईसा गोरा है या काला ?
बांपटन : ( थोड़ा झुंझलाते हुये ) उससे आपको क्या ?
ग्रामीण : अरे नाराज क्यों होते हो । जैसे हमारे कृष्ण काले हैं वैसे ही ईसा का भी तो कोई रंग होगा।साले को इतना भी नहीं पता कि गोरा है या काला।ये फिर हमें क्या बतायेगा।
लेसी : हम आपको ईसा मसीह की दस आज्ञाओं के बारे में बतायेंगे।उन्होंने कहा है कि जो मेरे मांस का भोजन करता है और मेरा रक्तपान करता है वह मुझमें वास करता है और मैं उसमें।
ग्रामीण : क्या कहा , ईसा का खून पियोगे,उनका मांस खाओगे ? बाप रे बाप ! यह तो नरभक्षी है।
लेसी : आप ईसा पर विश्वास रखिये वो आपको क्षमा कर देंगे ।
ग्रामीण : तुम पाप करके ईसा का नाम लेते रहो , हम पाप करके अपने ईश्वर का नाम लेते रहेंगे।तुम अपने कृष्ण की पूजा करें और हम अपने कृष्ण की।हमारे कृष्ण हमारी रक्षा करेगे।
गंगाधर (ईसाई बना ब्राह्मण): आपके कृष्ण तो तीर से अपनी रक्षा नहीं कर पाये आपकी क्या करेंगे ?
लेसी : आपके कृष्ण तो पापी हैं।वृंदावन में गोपियों के साथ पाप किया था।
ग्रामीण : साला , हमारे कृष्ण को गालियां देता है।मारो साले को।
गंगाधर : धैर्यपूर्वक सुनिये हमारी बातों को।
ग्रामीण : साला ब्राह्मण , पादरी का जूठन खाकर चांडाल बन गया ।मारो साले
काले पादरी को।मारो , मारो।मारो सालों को…
वर्षों ग्रामीणों के व्यंग बाण झेलते-झेलते पादरी निराश हो चुके थे।पूरे ओडिशा को ईसाई बनाने का सपना भी टूट चुका था।इस व्यथा को पादरियों ने कुछ इसतरह आपस में साझा किया –
साटन : मैं यहां आने से पहले सोचता था एक दिन पूरा ओडिशा ईसाई बन जायेगा।इतने वर्षों बाद भी सिर्फ कुछ लोग ईसाई बने।एक टूटे फूटे मंदिर के ऊपर चैपल बनाया।लेकिन कहां है हमारे सपनो का ओडिसा ? मंदिरों को तोड़कर मिट्टी में मिला देने का सपना कहां पूरा हुआ ? पुरी का जगन्नाथ मंदिर पहले की तरह सिर उठाये खड़ा है।हम लोग गांव-गांव , हाट-बाजार सभी जगह जाकर प्रचार कर रहे हैं पर क्या फायदा मिला ?
लेसी – निराश न हों।आपने ओडिया व्याकरण की किताब लिखी है जिससे ओडिया भाषा की उन्नति होगी।
साटन – ओडिया भाषा क्या मेरे व्याकरण पर निर्भर है , ब्रदर लेसी ? मैने तो व्याकरण लिखा बस धर्म प्रचार के लिये , ओडिया भाषा की प्रगति के लिये नहीं। सोचा जाये तो हम लोगों ने जो कुछ भी किया सिर्फ़ अपने धर्म प्रचार के लिये किया।यहां के लोगों के लिये किया ही क्या ?
पादरी : सुंदर दास भी पाखंडी निकला।उसने हमारा विरोध शुरु कर दिया।जुर्माना भी लगवा दिया।हमारा बहुत अपमान हुआ अब हमसे ग्रामीण भय भी नहीं खाते।जब हमने उसके शिष्य को ईसाई बनाया तो उसने उसे बहुत मारा भी।उसकी रिपोर्ट कर जेल भिजवाना है।
और यही हुआ भी।सुंदर दास को जेल भी हुयी।उन्होंने हिंदुओं को डुबकी लगवाने के कुचक्र को स्वयं की पादरियों से लड़ाई मानी थी।चूंकि पादरी ईसा के चमत्कारों से ग्रामीणों को प्रभावित करते थे और ईसा को कृष्ण से बेहतर बताते थे सुंदर दास ने उन्हीं का हथियार उन्हीं पर चला उन्हें जनता के बीच लगातार निरूत्तर किया।कैसे ? कुछ झलकियां प्रस्तुत हैं।
सुंदर दास : ईसा मसीह के विषय में जो कुछ लिखा है आप उसपर यकीन रखते हैं ? उन्होंने जो चमत्कार दिखलाया उसपर यकीन रखते हैं ? अंधे को दृष्टि मिल जाना , जल को मदिरा में बदल देना , आंधी को रोक देना , मृतक को जीवन दान – ये सब सत्य हैं , समझते हैं आप ?
साटन : अवश्य सत्य है सब ।
सुंदर दास : ( हंसते हुये) चमत्कार… चमत्कार । यह देखिये मेरा चमत्कार। शून्य से फूल मेरे हाथों में आ गया।लेकिन ठहरिये ये देखिये कैसे मैंने अपने दुशाले में छिपा फूल निकाला हाथ की सफाई से और आपको लगा यह शून्य से आया है।
लेसी : आप यहां क्यों आये हैं , अब आपसे हमारा कोई संबंध नहीं है।
सुंदर दास : धीरज रखो बच्चों और मेरी बात सुनो।यीशु ने शिशुओं के बारे में कहा था उन्हें मेरे पास आने दो , मना मत करो।क्योंकि परमेश्वर का राज्य उन जैसों का ही है।मैं तुमसे सच कहता हूं कि जो कोई परमेश्वर के राज्य को बालक की नाईं न ग्रहण करे , वह उसमें कभी प्रवेश नहीं कर पायेगा।ऐसा ही शिशु था शिशु कृष्ण।शिशु कृष्ण जैसे थे वैसा ही था शिशु यीशु।इसमें नया क्या है ?
बांपटन : ( उत्तेजित होकर ) यह मिथ्या है । यह घोर पाप की बात है।
सुंदर दास : मैं समझाता हूं किस प्रकार।जो यीशु है वही कृष्ण है।कृष्ण का जन्म यदुवंश में हुआ था , यीशु का जन्म यूदावंश में।दोनों का जन्म हुआ पशु पालक गृह में।कंस के भय से कृष्ण को गोकुल भेजा गया।हेरद के भय से यीशु को मिस्र में छिपाया गया।दोनों की बाहें आजानुलंबित थीं।काम्यक वन में कृष्ण ने साक कनिका से बारह हजार विप्रों को तृप्त किया था ; यीशु ने पांच रोटियों और दो मछलियों से पांच हजार लोगों को भोजन कराया।यीशु समुद्र के ऊपर चले थे , कृष्ण सागर के गर्भ में गये थे।कृष्ण ने पत्थर से मक्खन बनाया , यीशु ने जल से मदिरा।कृष्ण के बारह बाल सखा थे , यीशु के बारह शिष्य।इसमें नया क्या है ?
साटन : यह सब कुप्रचार है।मिथ्या है।आप बड़े पाप की बात कर रहे हैं।
सुंदर दास : पादरी बांपटन , आप अस्वस्थ हैं।मैं चमत्कार से आपको स्वस्थ कर दूंगा।जैसे ईसा मसीह ने अंधे को दृष्टि , मूक को वाणी , बधिर को श्रवण शक्ति और मृतक को जीवन दिया था।
बांपटन : आपके देवी देवता तो हत्या करते हैं।
सुंदर दास : साधु ! साधु ! मैं भी जीवन दान करूंगा।कलियुग का ईसा मसीह मै हूं।समाचार ही हमारी वाणी है।मेरे भी बारह शिष्य हैं जिनको तुमलोगों ने डुबकी लगवा दी।देवतारी नायक , गंगा महंती , कृपासिंधु साहू , सुदर्शन राउत , परमेश्वर मल्ल , पुरुषोत्तम महापात्र , वायदेव साहू , परशुराम राउत , हरी पाढ़ी , रामचंद्र याचक , गंगादर सारंगी।ये हो गये ग्यारह शिष्य।बारहवां है राधूदास।राधूदास तुम हो हमारे जूडस।जूडस इसकारियट।
बांपटन : घोर पाप ! घोर पाप !
सुंदर दास : क्यों बच्चों समझे ? मैं ही यीशु हूं, मैं ही कृष्ण हूं।
लेसी : आप यहां से चले जाइये वरना आपको निकलवाना पड़ेगा।
सुंदर दास : मैं तो चला जाऊंगा लेकिन अपने शिष्यों को साथ लेकर जाऊंगा।
साटन : आप हमारे शत्रु हैं और हमें सरे आम अपमानित कर जा रहे हैं। इस बात का अवश्य प्रतिशोध लेना होगा।
इस प्रकार एक अकेले साधु ने ओडिशा को ईसाई बनने से
बचाया।

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