लॉर्ड्स, धोनी और आजादी

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पुण्‍य प्रसून वाजपेयी

लॉर्ड्स। जब पहली बार लॉर्ड्स के मैदान पर मैच खेला गया, उस वक्त दुनिया में इंग्लैंड की सत्ता में सूरज डूबता नहीं था। और भारत ही नहीं दुनिया के चालीस से ज्यादा देशो में लॉर्ड्स का मतलब इंग्लैंडके वह लॉर्ड्स ही थे जो ब्रिटिश सत्ता चलाते थे। और इंग्लैंडकी फितरत देखिये, वो अपने हर गुलाम देश को लॉर्ड्स के मैदान में क्रिकेट खेलकर हराने का सुकुन लेता। 1884 में पहली बार लॉर्ड्स पर पहले टेस्ट में इंग्लैंड ने अपने ही गुलाम

देश आस्ट्रेलिया को 5 रन से हराया था। 1907 में अपने गुलाम साउथ अफ्रीका को हराकर सत्ता की ताकत के साथ जीत का जश्न मनाया। और 1932 में गुलाम भारत को भी पहली बार लॉर्ड्स में खेलने के लिये ही इंग्लैंडने आमंत्रित किया और 158 रन से हराकर खुद पर रश्क किया था। लॉर्ड्स क्रिकेट का मक्का बना। तो इंग्लैंडको लॉर्ड्स में हराने का सुकून भी इंग्लैंड की गुलामी से आजाद हुये देशों की रगों में दौड़ने लगा।

आजादी के बाद भारत बार बार लॉर्ड्स में इंग्लैंड से टकराया। लेकिन जीत का स्वाद मिलने से हर बार भारत दूर ही रहा। 1974 में लॉर्ड्स ने ही भारत को सबसे शर्मनाक पहचान दी। इंग्लैंड ने ना सिर्फ 628 रन की विशाल पारी खेली बल्कि बारत ने सारे रिकॉर्ड तोड़कर इंग्लैंड के खिलाफ दूसरी पारी में सिर्फ 42 रन बनाये। और भारत की टीम में उस वक्त गावस्कर, विश्वनाथ, वाडेकर, आबिद अली, इंजीनियर सरीखे बल्लेबाज थे। लेकिन 5 रन से ज्यादा कोई ना बना सका। सबसे ज्यादा 18 रन सोल्कर ने बनाये। तो लॉर्ड्स में जीत के लिये तड़पती भारतीय क्रिकेट टीम को पहली बार जीत भी मिली तो इतिहास बना गयी। क्योंकि यह जीत विश्वकप जीतने वाली थी। लेकिन 1983 के इस जश्न में सामने इंग्लैंड नहीं वेस्ट इंडीज था। भारत जीता और जश्न लॉर्ड्स से लेकर दिल्ली तक मना। लेकिन तब भी इंतजार लॉर्ड्स में इंग्लैंड को पीटने का था।

क्रिकेट का मक्का लॉर्ड्स तो क्लासिक क्रिकेट के लिये जाना जाता था और दुनिया में माना यही जाता रहा कि जबतक टेस्ट मैच में में जीत नहीं मिलेगी तबतक क्रिकेट की बादसाहत को कोई मतलब नहीं है । और फिर 1986 में कमोवेश वही टीम लॉर्ड्स में इग्लैड के खिलाफ उतरी जिसने तीन बरस पहले लॉर्ड्स में वर्ल्ड कप जीता था। भारत को आखिरी विनिंग में टारगेट 134 रन का मिला और गावस्कर,श्रीकांत, महेन्दर अमरनाथ, वेंगसरकर अजरुद्दीन का विकेट 110 रन पर खोकर कपिल देव और शास्त्री ने जीत दिला दी। और पहलीबार लॉर्ड्स में भारत क्रिकेट खेलते हुये आजाद हुआ। क्योंकि बारत ने लॉर्ड्स में इंग्लैंड को हराया था।

लेकिन इसके बाद एक लंबी खामोशी में ही भारतीय क्रेकट टीम को गयी । और आज यानी 18 बरस बाद लॉर्ड्स में जैसे ही इंग्लैंड को भारत ने हराया वैसे ही लॉर्ड्स को लेकर अतीत के सारे पन्ने खुद ब खुद खुलने लगे।

क्योंकि लॉर्ड्स सिर्फ एक मैदान नहीं बल्कि इंग्लैंड की जागीरदारी और दुनिया पर काबिज उसके लॉर्ड्स की अनकही कहानी का खत्म होना भी है। शायद इसीलिये लॉर्ड्स की जीत हर बार अलग ही होगी। लॉर्ड्स आधुनिक क्रिकेट की सत्ता का प्रतीक है और फिलहाल भारत ने वहां इंग्लैंड को मात दी है।

लेकिन जीत के साथ एक तमगा क्रिकेट टीम के कप्तान धोनी की छाती पर ठोंकना ही होगा। क्योंकि दुनिया के नक्शे पर रांची की पहचान क्रिकेट को पहचान देने वाले लॉर्ड्स पर भारी पड़ जायेगी यह किसने सोचा होगा। जी, रांची का मतलब क्रिकेट के नये लार्ड महेन्द्र सिंह धोनी हैं। क्रिकेट के सुनहरे इत्हास के पन्ने में लॉर्ड्स की यह जीत किसी मोती से कम नहीं। महज 50 रुपये के लिये रांची से कभी टाटा तो कभी कोलकत्ता जाकर खेलने वाला महेन्द्र सिंह गोनी का पहला प्यार फुटबाल ही रहा। लेकिन एक बार भारतीय क्रिकेट टीम में जगह मिली तो फिर इस शक्स ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। रांची से सटे जमशेदपुर के मैदान में पहली आतिशी पारी के बाद यह तो तय हो गया कि धोनी क्रिकेट को ताकत के साथ खेलते हैं। लेकिन जिस रफ्तार से धोनी ने क्रिकेट की हर नब्ज को पकडा और उसके बाद छोटे छोटे शहरों से आने वाले खिलाडियों के संघर्ष से बारतीय क्रिकेट टीम को एक सिरे से पिरोना शुरु किया उसने भारतीय क्रिकेट टीम को सरताज बना दिया। कोई भी क्रिकेट हो । कैसा भी मैच हो। धोनी ने पुरी शिद्दत से हर तरह के क्रिकेट को अपने अंदाज में जीना शुरु किया। 2007 में पाकिस्तान को 20-20 के पहले आईसीसी टूर्नामेंट से लेकर 2012 में विश्व विजेता बनने का सुकून धोनी ने भारत को दिया। हर रिकॉर्ड धोनी के पीछे छूटता गया। विकेट के पीछे खड़े होकर बतौर विकेट कीपर तीन सौ से ज्यादा विकट लेना हो या पिर विकेट के आगे खड़े होकर किसी भी विकेट कीपर से ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड । सबकुछ धोनी ने अपने नाम किया।

लेकिन धोनी ने बतौर कप्तान जिस अंदाज में खामोशी से हर संकट को टाला ही नहीं जीत में बदलने का हुनुर दिखाया उसने पहली बार धोनी को एक ऐसे संयमित कप्तान के तौर पर दुनिया के सामने रख दिया कि सपनों की क्रिकेट टीम के कप्तान भी धोनी ही बने यह दुनिया के क्रिकेटरों ने माना। धोनी मंत्र ने हर बार भारतीय टीम के खिलाडियों को चुनने वाले बोर्ड को आईना भी दिखाया। और किसी जौहरी की तरह हर बार जिस भी चमक खोते खिलाडी पर दांव लगाया उस खिलाडी की चमक लौट आयी। और किसी जौहरी के अंदाज में लॉर्ड्स के मैदान पर उसी ईशांत पर अपना दांव धोनी ने लगाया जिसको लेकर यह बहस चल पडी थी कि फॉर्म को चुके ईशांत शर्मा को टीम में जगह देने का मतलब क्या है। और कमाल देखिये। ईशांत ने सात विकेट लेकेर लॉर्ड्स में ना सिर्फ जीत दर्ज कर दी बल्कि लॉर्ड्स में एक इनिंग में सबसे ज्यादा विक्ट लेने वाले रिकॉर्ड से महज एक विकेट पीछे रह गये। लेकिन यह कमाल भी उस जौहरी का है जो दुनिया के मानचित्र पर ना पहचान आना वाले रांची शहर से आता है जो आज की तारीख में क्रिकेट को पहचान देने वाले लॉर्ड्स पर भारी है। तो जिस लॉर्ड्स पर इंग्लैंड ने गुलामों को हराकर हमेशा सुकून पाया उस लॉर्ड्स पर इंग्लैंड को हराना क्रिकेट की आजादी से कम तो नहीं।

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