भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३७० का सच

370

भारत के संघीय संविधान के अनुच्छेद 370 को लेकर बहस कभी समाप्त नहीं होती । बहस के मोटे तौर पर दो मुद्दे रहते हैं ।

१. जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिंह द्वारा २७ अक्तूबर १९४७ को अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करने के कारण जम्मू कश्मीर रियासत भारत में शामिल हुई ।

२. भारत के संघीय संविधान के अनुच्छेद ३७० के समाप्त हो जाने से जम्मू कश्मीर राज्य भारत का हिस्सा नहीं रहेगा ।

हम अपनी बात पहले मुद्दे से ही प्रारम्भ करेंगे । जम्मू कश्मीर २७ अक्तूबर १९४७ को ही वहाँ के महाराजा हरि सिंह द्वारा द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर देने के कारण ही भारत में शामिल हुआ । यह प्रश्न केवल जम्मू कश्मीर रियासत से सम्बंधित नहीं है । अन्य रियासतों के बारे में भी प्राय यही कहा जाता है कि वे वहाँ के शासकों द्वारा १५ अगस्त १९४७ से कुछ समय पहले अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर देने के कारण से ही भारत में शामिल हुईं । यदि केवल तर्क के लिये ही मान लिया जाये कि ये सभी रियासतें वहाँ के शासकों द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर देने के कारण से ही भारत में शामिल हुईं तो प्रश्न पैदा होता है कि इस तिथि से पहले इन रियासतों की स्थिति क्या थी ? इससे पहले क्या वे अलग देश थे ? क्या १५ अगस्त १९४७ से पहले ग्वालियर , कपूरथला, इंदौर इत्यादि रियासतें भारत का अंग नहीं थीं ? यही प्रश्न जम्मू कश्मीर रियासत के बारे में लागू होता है । इसका उत्तर खोजने से ही अनुच्छेद ३७० को समझा जा सकता है । इतिहास का सामान्य विद्यार्थी भी यह मानने को तैयार नहीं होगा कि ग्वालियर , पटियाला , जम्मू या श्रीनगर कभी भारत का हिस्सा नहीं थे । वे १९४७ से पहले भी भारत का हिस्सा थे और उसके बाद भी हैं । वहाँ के शासकों द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करने से इन इलाक़ों का भारत का हिस्सा होने या न होने से कोई ताल्लुक़ नहीं है । इस पहेली के रहस्य को समझने के लिये भारत की अवधारणा को समझ लेना जरुरी है । भारत की सीमा को रेखांकित करने वाला विष्णु पुराण , उत्तरम् यत् समुद्रस्य की बात करता है । लेकिन हम अपनी बात भारत पर हुये विदेशी आक्रमणों से प्रारम्भ करेंगे । वह भी मुग़लों के आक्रमणों से ही । मुग़लों ने आक्रमण करके भारत के बहुत बड़े भूभाग पर क़ब्ज़ा कर लिया लेकिन पूरे भारत पर वे भी क़ब्ज़ा नहीं कर सके । उनके शासन काल में भी कुछ क्षेत्र ऐसे थे जिन पर अलग अलग भारतीय शासकों का ही राज्य था । मुग़ल अधिकृत भारत की सीमाएँ भी बनती बिगड़ती रहतीं थीं क्योंकि अनेक स्थानों पर भारतीय शासक उनके क़ब्ज़ाये गये क्षेत्रों को आज़ाद करवा लेते थे । मुग़ल शासन काल के अंतिम दिनों में भारत पर क़ब्ज़ा कर लेने के लिये यूरोपीय जातियों में होड़ लग गई । इस को लेकर उनकी आपस में भी लड़ाइयाँ हुईं । इन लड़ाइयों के बाद भारत के अधिकांश हिस्से पर तो इन यूरोपीय जातियों का क़ब्ज़ा हो गया लेकिन फिर भी बहुत सा हिस्सा भारतीय शासकों के पास ही रहा । इसे सूत्र रुप में निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है ।

 

भारत= ब्रिटिश इंडिया+फ़्रेंच इंडिया+पुर्तगाली इंडिया+इंडियन स्टेटस

फ़्रेंच इंडिया पर फ्रांस का क़ब्ज़ा था और उस में मोटे तौर पर पुदुच्चेरी शामिल था । इसी प्रकार पुर्तगाली भारत जिसमें मोटे तौर पर गोवा दमन और दिव शामिल थे , पुर्तगाल के अधीन था । ब्रिटिश इंडिया पर १८५७ से पहले इंग्लैंड की एक व्यापारिक कम्पनी ईस्ट इंडिया कम्पनी का क़ब्ज़ा था और १८५७ के बाद इंग्लैंड सरकार का क़ब्ज़ा हो गया । लेकिन ईस्ट इंडिया कम्पनी अपने शासन काल में , उन भारतीय क्षेत्रों पर , जो उसके क़ब्ज़े में नहीं आये थे और अभी भी भारतीयों के शासन में थे , क़ब्ज़ा करने की निरंतर कोशिश करती रहती थी । १८५७ में हुये प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद जब इंग्लैंड सरकार ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को हटा कर , उसके क्षेत्र का शासन स्वयं संभाल लिया तो उसने उन क्षेत्रों पर जो अभी भी भारतीय शासकों के पास थे , क़ब्ज़ा करने की नीति का त्याग कर दिया । लेकिन उनके साथ अनेक प्रकार की संधियाँ कर लीं , जिनके कारण इंग्लैंड का प्रत्यक्ष नियंत्रण इन क्षेत्रों पर भी हो गया था । अंग्रेज़ी भाषा वाले इसे पैरामाऊंटेसी कहते हैं । भारतीय शासकों द्वारा शासित इन क्षेत्रों को भारतीय रियासतें या अंग्रेज़ी में इंडियन स्टेटस कहा जाता था ।

१९३५ में ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश इंडिया और भारतीय रियासतों को मिला कर एक नई सांविधानिक व्यवस्था क़ायम करने की कोशिश की । ब्रिटिश सरकार , ब्रिटिश इंडिया के क्षेत्र और भारतीय रियासतों को मिला कर इंडियन डोमीनियन की स्थापना करना चाहती थी जिसमें राज्याध्यक्ष इंग्लैंड के राजा/रानी द्वारा स्वीकृत गवर्नर जनरल होता । लेकिन इंग्लैंड सरकार की यह योजना सिरे नहीं चढ़ी । १९४७ में अंग्रेज़ों ने ब्रिटिश इंडिया से अपना प्रत्यक्ष शासन समेट कर जाने का निर्णय किया और ब्रिटिश इंडिया को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया । इंडियन डोमीनियन और पाकिस्तान डोमीनियन । पाकिस्तान डोमीनियन की हैसियत एक अलग देश की हो गई ।

पन्द्रह अगस्त १९४७ को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित हो जाने के बाद इस नई स्थिति को निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है ।

भारत=(भारत डोमीनियन+पाकिस्तान डोमीनियन)+फ़्रेंच इंडिया+पुर्तगाली इंडिया+ इंडियन स्टेटस

इस प्रकार १५ अगस्त १९४७ को पाकिस्तान डोमीनियन भारत से अलग हो गया । इस प्रकार बचा हुआ भारत निम्न प्रकार से रेखांकित किया जा सकता है ।

भारत= भारत डोमीनियन+फ़्रेंच इंडिया+पुर्तगाली इंडिया+ इंडियन स्टेटस

भारत स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ में भारतीय रियासतों से इंग्लैंड सरकार की हुई समस्त संधियाँ रद्द कर दी गईं । यानि उन पर से इंग्लैंड सरकार की पैरामाऊंटेसी समाप्त हो गई । लगभग स्थिति १९३५ वाली ही हो गई । उस समय भी रियासतों को भारत डोमीनियन में शामिल होने का विकल्प दिया गया था । इस बार केवल इतना ही अन्तर था कि अब एक नहीं दो डोमीनियन बन गये थे । इसलिये यह कहा जाने लगा कि रियासतें दोनों में से किसी भी एक डोमीनियन में शामिल हो सकती हैं । लेकिन यह व्यावहारिक नहीं था । जो रियासतें जिस डोमीनियन के अन्तर्गत पड़तीं थीं , उनके पास उस ही डोमीनियन में शामिल होने के सिवा कोईँ विकल्प खुला नहीं था । यही कारण था कि पाकिस्तान डोमीनियन में पडती सभी रियासतें अन्ततः पाकिस्तान का हिस्सा बनीं । भारत डोमीनियन में भी दो रियासतों ने दूसरे विकल्प तलाशने की कोशिश की । जूनागढ रियासत ने पाकिस्तान डोमीनियन में शामिल होने की घोषणा कर दी लेकिन वहाँ की जनता ने विद्रोह कर दिया और भारत डोमीनियन में शामिल होने का निर्णय लिया । इसी प्रकार हैदराबाद रियासत ने पैरामाऊंटेसी समाप्त हो जाने का अर्थ यह ले लिया कि रियासत प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य बन गई है और वहाँ के शासक ने ऐसा व्यवहार करना भी शुरु कर दिया । लेकिन भारत डोमीनियन की सरकार ने उसे ऐसा करने से रोका । उसकी जनता उसके इस निर्णय के ख़िलाफ़ पहले ही विद्रोह कर चुकी थी ।

भारत डोमीनियन में राष्ट्रीय सरकार बनी । लेकिन इस डोमीनियन का गवर्नर जनरल इंग्लैंड सरकार ने नियुक्त किया था जिसे क्राऊन का प्रतिनिधि माना जाता था । गवर्नर जनरल किसको बनाया जाये , इसका निर्णय तो भारत डोमीनियन की संविधान सभा ने ही किया था लेकिन उसे तभी वैधानिक रुप से मान्यता मिलती थी , जब इंग्लैंड की महारानी उसे अपनी स्वीकृति प्रदान कर देती थी । भारत डोमिनियन की संविधान सभा जो लोक सभा का कार्य भी करती थी , जो भी अधिनियम पारित करती थी वह तब तक क़ानून नहीं बनता था जब तक गवर्नर जनरल उसकी मंज़ूरी नहीं दे देता था । इंडियन स्टेटस में , जिनकी संख्या लगभग ५६० थी , राजशाही शासन व्यवस्था थी और अलग अलग राजा राज करते थे और उनकी सांविधानिक प्रशासन व्यवस्था भी अलग अलग थी लेकिन वे सभी वहाँ के शासकों द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करने से पहले भी भारत का ही हिस्सा थीं । अब जो प्रयास हो रहे थे वे यह थे कि समस्त भारत में अलग अलग सांविधानिक प्रशासकीय व्यवस्थाओं को समाप्त करके एक समान सांविधानिक व्यवस्था लागू की जाये । लेकिन एक समान सांविधानिक व्यवस्था लागू करने के इस अभियान में फ़्रेंच इंडिया और पुर्तगाली इंडिया के हिस्से शामिल नहीं थे क्योंकि भारत के ये हिस्से अभी भी विदेशी शासन के अधीन ही थे । इसलिये इस अभियान में इंडिया डोमीनियन और भारतीय रियासतें ही शामिल हो सकतीं थीं । विभिन्न भारतीय रियासतों के शासकों ने जब अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किये तो इसका अर्थ केवल इतना ही था कि वे ( समस्त भारत-फ़्रेंच इंडिया+पुर्तगाली इंडिया) के लिये चलाये जा रहे समान सांविधानिक व्यवस्था अभियान में शामिल होने के लिये तैयार हैं । इस उद्देश्य के लिये गठित संविधान सभा में इंडिया डोमीनियन में से चुनें गये जन प्रतिनिधि तो पहले ही शामिल थे , अब जनसंख्या के अनुपात से भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि भी शामिल कर लिये गये । लेकिन भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि संविधान सभा में अलग अलग तारीखों को शामिल हुये क्योंकि इन रियासतों ने अलग अलग तारीखों को ही इस अभियान का हिस्सा बनने का निर्णय किया था । जम्मू कश्मीर रियासत के चार प्रतिनिधि संविधान सभा में सबसे अंत में शामिल हुये क्योंकि यह रियासत इस अभियान में १५ अगस्त से दो महीने बाद ही शामिल हुई थी ।

इससे स्पष्ट हो जाता है कि रियासतों के शासकों द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करने का रियासत के भारत में शामिल होने से कोई सम्बंध नहीं था । रियासतें उस हस्ताक्षर से पहले भी भारत का ही अंग थीं और उसके बाद भी । लेकिन यहाँ एक काल्पनिक प्रश्न का उत्तर यथार्थ को समझने के लिये देना जरुरी है । केवल तर्क के लिये मान लिया जाये कि यदि ये रियासतें समान सांविधानिक शासन व्यवस्था में शामिल होने के लिये इस अभियान में शामिल न होतीं तो क्या वे भारत का हिस्सा न होतीं ? यक़ीनन यदि इन रियासतों में से कोंई अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर न करती और वहाँ राजा का ही शासन रहता तब भी वे भौगोलिक भारत का ही हिस्सा रहतीं । फ़्रेंच इंडिया और पुर्तगाली इंडिया के क्षेत्र तो उस समय इस अभियान में शामिल नहीं थे तो क्या वे उस समय भारत का हिस्सा नहीं थे ? उनके प्रतिनिधि संघीय संविधान सभा का हिस्सा नहीं थे , तब भी इन क्षेत्रों को भारत का हिस्सा ही स्वीकार किया गया । २६ जनवरी १९५० को संघीय संविधान के लागू हो जाने पर भारत का सूत्र बदल गया । अब उसे इस नये सूत्र द्वारा दर्शाया जा सकता था-

भारत= २६ जनवरी १९५० को संघीय संविधान द्वारा शासित क्षेत्र+फ़्रेंच इंडिया + पुर्तगाली इंडिया

भारत द्वारा गणतंत्रीय सांविधानिक व्यवस्था स्वीकार कर लेने के बाद भी देश के लोगों ने फ़्रेंच इंडिया और पुर्तगाली इंडिया के क्षेत्रों को आज़ाद करवाने के लिये संघर्ष जारी रखा और अन्ततः यहाँ से विदेशी शासन व्यवस्था को समाप्त कर , उसे समस्त भारत के लिये समान सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा बना कर ही दम लिया । फ़्रेंच इंडिया के क्षेत्रों को १९५४ में आज़ाद करवा कर देश की संघीय सांविधानिक व्यवस्था में शामिल किया गया और पुर्तगाली भारत को १९६१ में स्वतंत्र करवाया गया ( यद्यपि पुर्तगाल सरकार ने इसे १९७५ में जाकरआधिकारिक तौर पर स्वीकार किया) कुछ लोगों को भ्रम है , और यह भ्रम अंग्रेज़ों द्वारा ही जानबूझकर कर पैदा किया गया था कि शायद भौगोलिक भारत का निर्माण इंग्लैंड की संसद द्वारा पारित अधिनियमों भारत सरकार अधिनियम १९३५ और भारत स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ से ही हुआ । ये अधिनियम भारत के एक हिस्से की शासन व्यवस्था की पद्धति से ताल्लुक़ रखते थे । जहाँ तक भारत के भूगोल का सम्बंध है , इन अधिनियमों का उससे कोई सम्बंध नहीं है ।

लेकिन तब प्रश्न पैदा होता है कि यह भ्रम कैसे फैला की ये रियासतें शासकों द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर देने के कारण ही और बाद में ही भारत में शामिल हुईं ? इसके लिये ब्रिटिश काल में इंग्लैंड द्वारा योजनाबद्ध ढंग से प्रचलित की गई शब्दावली का अध्ययन करना निहायत जरुरी है । अंग्रेज़ों ने इस देश के लिये भारत शब्द का प्रयोग न करके बहुत ही होशियारी से इंडिया सब कांटिनैंट शब्द का प्रयोग करना शुरु कर दिया । यह शब्द अपने में भ्रामक है । सब कांटिनैंट में तो कई देश हो सकते हैं । इंग्लैंड जानबूझकर कर भारत की तुलना यूरोप से कर रहा था ,जिसमें समान यूरोपीय भाव रहते हुये भी भिन्न भिन्न भाषाओं वाले अनेक देश हैं जो आपस में लड़ते भी रहते हैं । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उसने भारत को भारत न लिख कर भारत सब कांटिनैंट या उपमहाद्वीप लिखना शुरु कर दिया । एक बार यदि यह स्वीकार कर लिया जाये कि भारत एक देश न होकर एक उपमहाद्वीप है , फिर यह मानने में कितनी देर लगती कि इस उपमहाद्वीप में अनेक देश हैं । इस सूत्र से ५६० रियासतें अपने आप ही देश बन जायेंगी । अंग्रेज़ी ताने बाने में पढ़ें लिखें कुछ भारतीय विद्वानों ने भी भारत की इस नई व्याख्या को स्वीकार करते हुये भारत को भारत न लिख कर भारत उपमहाद्वीप प्रचारित प्रसारित करना शुरु कर दिया । भारत स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ पारित करते समय इंग्लैंड की संसद ने रही सही कसर पूरी कर दी । यह प्रचारित किया जाने लगा कि भारतीय रियासतों के साथ इंग्लैंड की संधियाँ समाप्त हो जाने के बाद सैद्धान्तिक रुप से रियासतें प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य बन जायेंगे । अलबत्ता इतना जरुर है कि यदि वे चाहें तो भारत डोमीनियन या पाकिस्तान डोमीनियन में शामिल हो सकते हैं । लेकिन चाहें तो दोनों में से किसी के साथ भी शामिल न हों । अर्थात वे स्वतंत्र देश के तौर पर भी व्यवहार कर सकते हैं । यह शरारत कर लेने के बाद लार्ड माऊंटबेटन ने जरुर सार्वजनिक रुप से रियासतों को सलाह देनी शुरु कर दी कि उन्हें १५ अगस्त से पहले पहले जरुर किसी डोमीनियन मैं शामिल हो जाना चाहिये । लेकिन सिद्धान्त रुप में इंग्लैंड ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी कि उनकी दृष्टि में और उनकी संसद द्वारा पारित अधिनियमों के अनुसार तो रियासतें स्वतंत्र हैसियत का दर्जा रखती हैं ।

नेहरु ये तो चाहते थे कि भारत डोमीनियन क्षेत्र में पड़ने वाली रियासतें भारत डोमीनियन में ही रहें लेकिन सैद्धान्तिक रुप से वे अंग्रेज़ों की रचित भारत की अवधारणा से ही सहमत थे । इसी अवधारणा को लेकर भारत के कुछ बुद्धिजीवी भी शामिल हैं । उदाहरण के लिये भारतीय विधि के ज्ञाता आदर्श सेन आनन्द भी भारत को भारत न मान कर भारत उप महाद्वीप ही स्वीकारतें हैं और इसी पृष्ठभूमि में महाराजा हरि सिंह द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करने की व्याख्या करते हैं । जबकि असल में अंग्रेज़ों द्वारा दी गई यह अवधारणा ही ग़लत है । भारतीय रियासतें अंग्रेज़ों के इस देश में आने से पहले भी और उनके चले जाने के बाद भी भारत का अंग थीं । अधिमलन पत्र पर हस्ताक्षर से उनकी केवल सांविधानिक व्यवस्था बदल रही थी । लेकिन अंग्रेजी भाषा के जानकारों ने संघीय सांविधानिक व्यवस्था में शामिल होने की प्रक्रिया और विधि को ही भारत में शामिल होना कहना शुरु कर दिया और इस प्रक्रिया से पूर्व की स्थिति में रियासतों को प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य की संज्ञा देना शुरु कर दिया । जबकि ये दोनों निष्कर्ष व्यवहार में भी और विधि में भी आधारहीन थे । अनुच्छेद ३७० को भी इसी पृष्ठ भूमि में समझा जा सकता है ।

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