ओबामा: चिकनी फिसलपट्टी तो नहीं?

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा इस बार के गणतंत्र-दिवस के मेहमान होंगे, यह खबर खूब उछली है। यह उछलने लायक है, इसीलिए उछली है। अभी तक किसी प्रधानमंत्री ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि अमेरिका के राष्ट्रपति से इस तरह का अनुरोध किया जाए। पिछले पचपन-साठ साल तक अमेरिका से भारत के संबंध खट्टे-मीठे रहे। इसके अलावा अमेरिका का पाकिस्तान के साथ लंबे समय तक फौजी गठबंधन रहा।

अब अमेरिका न सिर्फ पाकिस्तान से अपनी दूरियां बढ़ा रहा है बल्कि उसे चीन के मुकाबले भी एशिया में एक मजबूत साथी की जरुरत है। इसीलिए भारत को अमेरिकी की जितनी जरुरत है, उससे कहीं ज्यादा अमेरिका को भारत की जरुरत है। ओबामा को मोदी का निमंत्रण पत्र किसी प्रेम-पत्र से कम नहीं लगा होगा।  ओबामा दुबारा भारत आने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। लेकिन इस बार आते समय उनका बांकपन पहले-जैसा नहीं रहेगा, क्योंकि वे काफी हिल गए हैं। कांग्रेस के चुनाव में रिपब्लिकनों ने उन्हें मात दे दी है और जनमत-सर्वेक्षणों में वे नीचे लुढ़कते जा रहे हैं। लेकिन इससे हमें क्या? हम तो यह जानते हैं कि उन्होंने अभी-अभी लगभग 50 लाख आप्रवासियों को जो सहूलियत दी है, उससे कम से कम चार लाख भारतीयों को सीधा फायदा मिलेगा। वे अमेरिका से अब भगाए नहीं जाएंगे। ओबामा का स्वागत करने के लिए यही कारण काफी है।

अगर ओबामा अफगानिस्तान में भारत की प्रमुख भूमिका को स्वीकार कर सकें और पाकिस्तान को भी उसके लिए मना लें तो दक्षेस की लाटरी खुल जाएगी। 30 साल से लंगड़ाता रहा दक्षेस अब दौड़ने लगेगा। ओबामा चाहेंगे कि अधर में लटका हुआ परमाणु सौदा जमीन पर उतरे। हम अमेरिका से परमाणु सुविधाएं जल्दी से जल्दी खरीदें। इस मामले में मोदी की तरफ से कोई अडंगा नहीं लगने वाला है, क्योंकि मोदी बड़ी-बड़ी चीजों और बातों से सहज सम्मोहित दिखाई पड़ते हैं। यहां मैं इतना ही कहूंगा कि ‘हिरना, समझ-बूझ वन चरना।’ मनमोहनसिंह की तरह लट्टू होना ठीक नहीं है। अमेरिकी शर्तों पर परमाणु-सौदे को लागू करने के पहले हमारी सरकार को सौ बार सोचना चाहिए।

ओबामा को मेहमान बनाना कहीं वर्तमान सरकार के लिए चिकनी फिसलपट्टी सिद्ध न हो, यह डर भी है। विदेश यात्राओं की चकाचैंध और ढोल-मजीरे में हम कहीं देश की सुध लेना न भूल जाएं। सरकार बने छह माह हो रहे हैं लेकिन उपलब्धियां अभी भी निर्गुण-निराकर ब्रह्म की तरह हैं। यदि जनता के धैर्य का प्याला भर गया तो ओबामा, एबे, शिन चिन पिंग वगैरह कोई काम नहीं आएंगे।

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