वाल्मीकि समाज हिन्दू समाज का अभिन्न अंग क्यों है?

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-अरुण लवानिया
अंग्रेजों के समय से ही हिंदुत्व की इमारत से एक-एक कर ईंटों को हटाने का षड़यंत्र चला आ रहा है। इसके पीछे ईसाइयों और मुसलमानों का हाथ तो है ही , स्वतंत्रता पश्चात उपजी नयी प्रजातियां जैसे नवबौध्द , बामसेफ और वामपंथी भी इस कार्य में जुटी हैं।जातिविहीन समाज की बात करने वाले ऐसे तत्व जातियों की ही दुहाई देकर हिंदू समाज को तोड़ने में लगे हैं। अंबेडकर तो बिना आरक्षण के विपरीत परिस्थितियों में अपने पुरुषार्थ के बल पर उन्नति किये।लेकिन आज के नवबौध्दों और बामसेफियों को तो सरकार से आरक्षण और अनेक प्रकार की आर्थिक सुविधायें उपलब्ध हैं।फिर भी अंबेडकर के नाम पर दुकानें चलाना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।ये अंबेडकर का जयकारा केवल आरक्षण के लिये ही लगाते हैं परंतु अंबेडकर के अन्य राष्ट्रवादी विचारों से इन्हें कोई सरोकार नहीं है। बुध्द से तो ये कोसों दूर हैं।आरक्षण समाप्त , अंबेडकर गायब ! इसीलिये, बिना अपवाद के, सभी तथाकथित अंबेडकरवादी अपनी-अपनी जातियों को मजबूती से पकड़कर जातिवाद के विरोध में हो-हल्ला करते हैं।
दोहराने की आवश्यकता नहीं कि आर्य समाज अपने उद्भव से ही छूआछूत , जातिवाद और विधर्मियों के विरुध्द सार्थक परिणामों के साथ संपूर्ण देश में संघर्षरत है।अंबेडकर भी इसीलिये प्रारम्भ से ही इन मुद्दों पर आर्य समाज के साथ मधुर संबंधों सहित आजीवन खड़े दिखाई देते हैं। बस यही बामसेफियों और नवबौध्दों की छटपटाहट का कारण है।इसी छटपटाहट में वो दलित आंदोलन की शुरुआत 1920 के दशक से ही मानकर वाल्मीकियों को को दिग्भ्रमित करते हुये कहते हैं कि 1925 से पहले इतिहास में हमें वाल्मीकि शब्द नहीं मिलता। इनको हिंदू धर्म में बनाये रखने , वाल्मीकि से जोड़ने और वाल्मीकि नाम देने की योजना बीस के दशक में आर्य समाज ने बनाई थी और इस काम को अंजाम दिया था एक आर्य समाजी अमीचंद शर्मा ने। अमीचंद शर्मा से इतना क्रोध मात्र इसलिये कि वो वाल्मीकियों की बस्तियों में उनके उत्थान और शिक्षा के लिये लंबे समय से ईमानदारी से कार्यरत थे। उन्होंने इसी दौरान ‘श्री बाल्मीकि प्रकाश’ नामक पुस्तक लिखकर वाल्मीकियों को उनके गौरवशाली अतीत और महर्षि वाल्मीकि से उनके अटूट संबंधों को साबित कर फैलाये जा रहे समस्त भ्रम दूर कर दिये। फलस्वरूप अपने उद्देश्य में असफल होने पर इनकी झल्लाहट कुछ यूं निकलती रही है :
” अमीचंद शर्मा का षड़यंत्र सफल हुआ ,सबके सामने है। आदि कवि वाल्मीकि के नाम से सफाई कर्मी समाज वाल्मीकि समुदाय के रूप में पूरी तरह स्थापित हो चुका है। ‘वाल्मीकि समाज’ के संगठन पंजाब से निकल कर पूरे उत्तर भारत में खड़े हो गए हैं।आज भी जब हम वाल्मीकि समाज के लोगों के बीच जाते है तो सफाईकर्मी वाल्मीकि के खिलाफ सुनना तक पसंद नहीं करते। ”
कहावत है चोर चोरी से जाये सीनाजोरी से न जाये।हालांकि वाल्मीकि समाज इनके षड़यंत्र को समझ जागरूक हो गया , चोर सेंधमारी में फिर भी लगे रहे। अमीचंद के साठ साल पश्चात् लगातार हो रही सेंधमारी से तंग आकर फरीदाबाद के प्रबुध्द वाल्मीकियों ने 14 प्रश्न हिंदू धार्मिक विद्वानों को उत्तर देने के लिये भेजे। ये प्रश्न दैनिक प्राण , फरीदाबाद , बुधवार 8 मार्च 1989 के अंक में प्रकाशित हुये।ये प्रश्न थे :
1- हमारा धर्म क्या है ?
2- अगर हम हिंदू हैं तो अस्पृश्यता क्यों है ?
3- कोई भी धर्म हमें बराबर मानने को तैयार नहीं।ऐसा क्यों ?
4- हमें इतना नीचे क्यों जाना पड़ा ?
5- हम कहां के रहने वाले हैं और हमारी जायदाद कहां है ?
6- हमारी संस्कृति क्या है ?
7- हमें ही भूत पूजा क्यों करनी पड़ी ?
8- अब हम सामाजिक , आर्थिक व राजनीतिक समानता किस तरह हासिल कर सकते हैं ?
9- हमारा महर्षि वाल्मीकि जी से क्या रिश्ता है ?
10- अकेले महर्षि वाल्मीकि जी के नाम पर एक कौम का नाम वाल्मीकि क्यों पड़ा ?
11- महर्षि जी ने शिक्षा कहां प्राप्त की जबकि हरिजनों के लिये स्कूल के दरवाजे चार हजार साल बंद रहे ?
12- महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण में अपने लिये दो शब्द क्यों नहीं लिखे जबकि उन्हें समाज द्वारा चोर डाकू कहा गया है ?
13- महर्षि वाल्मीकि जी ने श्रीराम के पुत्रों को शिक्षा दी । क्या एक भी अछूत शिक्षा के काबिल नहीं था ?
14- महर्षि जी जब इतने अज्ञानी थे कि जब उन्हें राम-राम के दो शब्द भी याद नहीं रहे और वह मरा-मरा रटने लगे तो इतनी बड़ी रामायण उन्होंने कैसे लिख दी ?
आज से नब्बे वर्ष पूर्व अमीचंद शर्मा ने अपनी पुस्तक में इनसे मिलते जुलते प्रश्नों के उत्तर संक्षेप दे दिये थे। दोबारा राजेंद्र सिंह ने अत्यंत विस्तार से इन सभी 14 प्रश्नों के उत्तर श्रुति और स्मृतियों से प्रामाणिक संदर्भों के साथ दिये जो इसी पत्रिका के संपादकीय पृष्ठों पर लगातार 9 अप्रिल 1989 तक छपते रहे।
आइये अत्यंत संक्षेप में जाने कैसे राजेंद्र सिंह के प्रश्नवार उत्तरों ने विधर्मियों के झूठ का सदा के लिये पर्दाफाश कर दिया।
प्रश्न 1- हमारा धर्म क्या है ?
उत्तर – अच्छे और बुरे कर्मों को अलग अलग भलीभांति जानकर सदाचार का पालन करना हर मनुष्य का कर्तव्य है। भारत में लंबे समय की मुस्लिम- अंग्रेजी दासता के प्रभाव से शास्त्र से अनभिज्ञ बुध्दिजीवियों ने रिलीज़न और मजहब शब्दों का अनुवाद धर्म कर दिया। धर्म का पर्यायवाची शब्द विश्व की किसी भी प्राचीन या अर्वाचीन भाषा में प्राप्त नहीं है।शास्त्र में सदाचार को धर्म और दुराचार को अधर्म कहा गया है। मनुस्मृति 6/12 के अनुसार धैर्य , क्षमा , मन को वश में रखना , इंद्रियों का निग्रह, बुध्दि का कल्याणकारी सदुपयोग करना , विद्या प्राप्त करना , सत्य का पालन और क्रोध न करना ये धर्म के दस लक्षण हैं। यही मानव धर्म हैं जिसका सर्वप्रथम परिचय विश्व में हमें ही हुआ।इसी तरह धर्म के विपरीत अधर्म होता है।जो भी इन दस आचारों को जान , समझ और मानकर इनके अनुसार जीवन यापन करता है वह हिंदू है।वाल्मीकि समाज भी चूंकि इन दस मर्यादाओं को मन से मानता और कर्म में ढालता है, वह हिंदूधर्मी है।उसके कुछ और होने का प्रश्न ही नहीं है।
प्रश्न 2- अगर हम हिंदू हैं तो अस्पृश्यता क्यों है ?
उत्तर – हिंदूधर्मी होने के कारण नहीं बल्कि अज्ञानतावश ऐसा मान लिया गया है।शास्त्र में स्पृश्य और अस्पृश्य का किसी वर्ग विशेष से कोई संबंध नहीं बताया गया है।परिस्थितिवश कोई भी अस्पृश्य हो सकता है।एक ब्राह्मण भी यदि मैले और दुर्गंधयुक्त वस्त्र पहन समाज में स्वच्छंद घूमता है तो धर्म के पांचवें लक्षण शौचधर्म के उल्लंघन से अस्पृश्य हो जाता है। उल्लंघन करने वाला यदि राजा भी है तो शास्त्र के अनुसार अशौचकाल तक वह अस्पृश्य ही माना जायेगा।अत: अस्पृश्यता को किसी भी एक वर्ग विशेष के मत्थे मढ़ देना अशास्त्रीय और दुर्भाग्यपूर्ण है।
प्रश्न 3- कोई भी धर्म हमें बराबर मानने को तैयार नहीं।ऐसा क्यों ?
उत्तर – धर्म की सही परिभाषा और इसका मजहब के अर्थ से अंतर प्रथम प्रश्न के उत्तर में में देखें ।वाल्मीकि समाज को यदि कोई मजहब अपने समान नहीं मानता तो यह उस मजहब विशेष की विचारधारा-विशेष का विषय है , धर्म का विषय नहीं।इसलिये किसी मजहब विशेष की एकपक्षीय विचारधारा को छोड़कर वाल्मीकि समाज को यह देखना चाहिये कि वह धर्म के कितना अनुकूल है।दो विभिन्न मजहब तो किसी न किसी अंश में विरोधी होते ही हैं।उनमें जो सदाचार की सांझी बातें थोड़ी-बहुत कहीं-कहीं देखने को मिलती है, वो धर्म के कारण है। अत: महत्व किसी मजहब की समानता-असमानता का नहीं अपितु महत्व धर्म के अनुकूल होने में है। हिंदू समाज ने इस तथ्य को भलीभांति समझा है।इसी कारण वह इतना सहिष्णु बन पाया है। धर्म के इस महत्व को विदेशी मजहब ना समझ पाने के कारण असहिष्णु हो गये।
प्रश्न 4- हमें इतना नीचे क्यों जाना पड़ा ?
उत्तर – जब कोई मानव या मानव समाज स्वाध्याय और अभ्यास को आलस और अज्ञानता के कारण त्याग देता है तो एक दिन उसका पतन हो जाता है।ऐसी ही असावधानी के काल में विदेशी ताकतों का आक्रमण हुआ।प्रथम मुसलमान आक्रांता और फिर अंग्रेजों के दुष्प्रभाव से मनीषी वर्ग प्रताड़ित और पथभ्रष्ट दोनों एक साथ बड़ी संख्या में व्यापक स्तर पर हुये।परिणामस्वरूप शास्त्रज्ञ ब्राह्मणों के स्थान पर शास्त्र से अनभिज्ञ ब्राह्मणों का प्रभाव बढ़ गया।ऐसा होने पर राष्ट्र का क्षत्रिय वर्ग असावधान और उदंड रहने लगा। दुष्परिणाम यह हुआ कि शास्त्र के कल्याणकारी मार्ग पर चलने वाली वर्णव्यवस्था अपने गुण कर्म के शास्त्र सम्मत आधार को त्याग कर मात्र जन्म के आधार पर स्वीकार कर ली गयी।
मानवधर्मशास्त्र मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है : ब्राह्मण की श्रेष्ठता ज्ञान से होती है (2/155) , सिर के सफेद बालों से कोई बड़ा नहीं होता (2/156) और अनपढ़ विप्र नाममात्र का ब्राह्मण होता है (2/157) इत्यादि।जन्मना अनपढ़ ब्राह्मणों के अभिमान और शूद्रवर्ण की हीनभावना के मिलेजुले विचारों के कारण वाल्मीकि समाज का पतन हुआ है। शास्त्र में अनपढ़ व्यक्ति को शूद्र कहा गया है , दुराचारी को नहीं दुराचारी अधर्मी होता है , उसका कोई वर्ण नहीं होता।इसलिये वह म्लेच्छ कहलाता है।इसलिये मिथ्या थोपी हुई हीन भावना का त्याग करें। ब्राह्मणादि वर्ण किसी वर्ग या समुदाय विशेष की बपौती नहीं है।कोई भी व्यक्ति पढ़ लिखकर अच्छे आचार को धारण कर इन पदों को प्राप्त कर सकता है।आवश्यकता अपने अंदर ऐसे गुणों को उत्पन्न करने की है।इसी संदर्भ में शुक्राचार्य का भी स्पष्ट कथन है कि इस संसार में जन्म से कोई भी ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र या म्लेच्छ नहीं होता है।वस्तुत: इन सबके भेद का कारण गुण-कर्म ही हैं (शुक्रनीतिसार 1/38)। महर्षि वाल्मीकि का जीवन , आचार और लेखनी भी यही कहती है। अत: महर्षि वाल्मीकि के आप सब अनुयायी भी किसी आचारवान ,सुयोग्य शास्त्रज्ञ से ज्ञान प्राप्त करें तो कोई कारण नहीं कि आपकी उन्नति न हो सके।
प्रश्न 5- हम कहां के रहने वाले हैं और हमारी जायदाद कहां है ?
उत्तर – वाल्मीकि समाज भारत का ही वासी है और पूरा भारत उसका अपना है।यह उसका और हम सबका बड़ा सौभाग्य है कि हम सबको इस श्रेष्ठ कर्मभूमि भारतवर्ष में जन्म प्राप्त हुआ है।अत: वाल्मीकि समाज भी अपने आपको बड़ा सौभाग्यशाली समझे कि सारा भारत उसका अपना है तथा उसे इसको अपना समझकर ही श्रेष्ठ कर्मभूमि से लाभान्वित होना चाहिये।इसके लिये बड़े विवेक की आवश्यकता है।
प्रश्न 6- हमारी संस्कृति क्या है ?
उत्तर – अपनी ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से मनुष्य जो अनुभव प्राप्त करता है उस अनुभव से बने संस्कारों से जो उसका स्वभाव परिपक्व होता है उसे संस्कृति कहते हैं।ये संस्कार धर्म के अनुकूल भी हो सकते हैं और प्रतिकूल भी। यह संस्कृति मानव की व्यक्तिगत पूंजी अर्थात् संपदा होती है।धर्म के अनुकूल संस्कृति दैवी संपदा और अधर्म के अनुकूल संस्कृति आसुरी संपदा कहलाती है।वाल्मीकि समाज चूंकि धर्म की शास्त्रसम्मत परिभाषा से सहमत है , इसलिये मानसिक रूप से वो हिंदू संस्कृति का पक्षधर है।हिंदू संस्कृति दैवी संपदा की समर्थक है।वाल्मीकि समाज स्वयं दैवी संपदा के कितना अनुकूल है , यह वह स्वयं आत्मविश्लेषण कर जान सकता है।
प्रश्न 7- हमें ही भूत पूजा क्यों करनी पड़ी ?
उत्तर – भूत-पूजा शब्द दो अर्थों में आता है।एक है पंचमहाभूतों से बने भौतिक जगत की पूजा।दूसरा अर्थ है भूत-प्रेतों की पूजा।आपका प्रश्न किस अर्थ में है स्पष्ट करना चाहिये था।यहां दोनों ही अर्थ के अनुसार उत्तर दिये जाते हैं।
भौतिक जगत मोक्ष प्राप्ति का एक साधन मात्र है साध्य नहीं।जब मनुष्य इसे साध्य समझ लेता है तो वह अज्ञानमय स्वप्नलोक में विचरने लगता है।आकाश में किन्हीं स्वर्ग-नर्क इत्यादि लोकों के होने की मिथ्या कल्पना करके भूत-प्रेतों और भटकती आत्माओं के अशास्त्रीय और कल्पनापूर्ण कुविचारों से भयभीत होकर यह जन्म और अगला जन्म दोनों बिगाड़ लेता है। पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थ पंचमहाभूतों के संयोग से बने हैं।सुयोग्य गुरु के मार्गदर्शन में इन पदार्थों का समुचित मात्रा में निष्काम भाव से प्रयोग मानव को मोक्ष दिलाने में सहायक सिध्द होता है। विद्या और कलाओं के ज्ञाता होने के कारण महर्षि वाल्मीकि सुयोग्य गुरू थे।जो गुण कर्म से शुद्र अर्थात अनपढ़ थे उन्हें महर्षि ने विभिन्न कलाओं जैसे शिल्पकर्म में पारंगत होने की शिक्षा दी , हस्तकौशल से मानव के कल्याण के लिये जीवनोपयोगी वस्तुओं को बनाना सिखाया।ऐसा करने के कारण वह पंचमहाभूतों का उचित दिशा में सदुपयोग करने के कारण भूतपूजक माना जाता है।इस दृष्टि से वाल्मीकि समाज विद्या में पारंगत अथवा प्रशिक्षित न होने पर भी अपने हस्तकौशल द्वारा भौतिक वस्तुओं का सुयोग्य निर्माता होने से सही अर्थों में भूतपूजक था।इसी कारण उसे शास्त्र सम्मत भूत पूजा करनी पड़ी।कोई भी वाल्मीकि गुण कर्म से विद्या पूजन भी कर दूसरे वर्ण में प्रवेश कर सकता है। यही शास्त्रों का कथन है।
प्रश्न 8- अब हम सामाजिक , आर्थिक व राजनीतिक समानता किस तरह हासिल
कर सकते हैं ?
उत्तर – धर्म के सत्त्वगुणी मार्ग पर चलते हुये विद्या ग्रहण कर समानता प्राप्त हो सकती है।इसके लिये हीन भावना त्यागनी होगी कि हम असहाय और असमर्थ हैं।कोई भी मनुष्य जन्म से नहीं अपितु सद्गुण और सत्कर्म से श्रेष्ठ बनता है।जन्म से सभी शूद्र अर्थात् अनपढ़ होते हैं।पुरुषार्थ में अशक्त मनुष्य ही नपुंसको की भांति भाग्य भरोसे बैठे रहते हैं।पुरुषार्थ करते रहने से मनुष्य एक दिन मोक्ष भी पा लेता है , फिर पढ़ा-लिखा द्विज बनना कौन सी बड़ी बात है।
प्रश्न 9- हमारा महर्षि वाल्मीकि जी से क्या रिश्ता है ?
उत्तर – महर्षि वाल्मीकि विद्या और कला दोनों के सुयोग्य अधिकारी विद्वान थे।अमर ऐतिहासिक महाकाव्य वाल्मीकीय रामायण के अतिरिक्त भी उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की थी।वो विमान निर्माण कला के एक प्रमुख आचार्य थे। उन्हीं के शिष्य भरद्वाज ने यंत्रकला पर ‘ यंत्रसर्वस्व ‘ नामक एक ग्रंथ रचा था। इस ग्रंथ में 40 प्रकरण थे।इनमें से एक का नाम वैमानिक प्रकरण है।वैमानिक प्रकरण मूलत: 8 अध्याय , 100 अधिकरण और 500 सूत्रों में रचा गया है। इससमय यह ग्रंथ बृहद् विमानशास्त्र के नाम से अधूरा उपलब्ध होता है। विमान निर्माण कला संबंधी इस वैज्ञानिक तकनीकि ग्रंथ पर यति बोधानंद ने वृत्ति टीका लिखी है।वृत्तिकार बोधानंद ने अपनी इस महत्वपूर्ण टीका में वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकीय गणितम् नामक ग्रंथ के अनेक अंशों को कई स्थलों पर उद्धृत किया है।वाल्मीकीय गणितम् से ज्ञात होता है कि वाल्मीकि मुनि को आकाश परिमंडल के रेखामार्ग , मंडल ,कक्ष्य , शक्तिपथ और केंद्रमंडल आदि की निश्चित संख्या का ज्ञान था जिनका उन्होंने इस गणितशास्त्र में सविस्तार उल्लेख किया है ( बृहद् विमानशास्त्र , सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा , नई दिल्ली , माघ 2015 विक्रमी , पृष्ठ 19-20)।वस्तुत: महर्षि वल्मीकि 32 विद्याओं और विविध कलाओं के असाधारण ज्ञाता थे। जो व्यक्ति अपने गुण कर्म के अनुरूप शास्त्र में वर्णित ब्राह्मकर्म , क्षत्रिय कर्म अथवा वैश्य कर्म को कुशलता पूर्वक धारण करने में समर्थ नहीं , उसकी जीविका का निर्वहन कैसे हो ? इस प्रश्न के उत्तर में शास्त्र का कथन है कि ऐसा व्यक्ति यदि किसी के अधीन रहना नहीं चाहता तो वह अपने जीवन यापन के लिये कला पक्ष का विकास करे।इसप्रकार वह आत्मनिर्भर हो सकता है।
महर्षि के गुरुकुल में जो विद्यार्थी विद्या और इससे जुड़े सूक्ष्म विषयों ठीक से समझने की योग्यता नहीं रखते थे उनको ऐसी कलाओं में प्रवीण बनाया जाता था। एक अनपढ़ अर्थात शूद्र भी राष्ट्रीय कार्य में समान रूप से सहायक हो इसलिये उसे इन कलाओं में पारंगत बनाया जाता था।यह इसलिये भी आवश्यक था क्योंकि विद्याविहीन स्वयं को हीन भावना से ग्रसित कर जुआ , मद्यपान और चोरी जैसे दुष्कर्म से बचा रहे। ऐसा नहीं कि कोई जन्म से शुद्र अर्थात अनपढ़ होकर विद्या योग्य नहीं था। जो योग्यता रखते थे वो शास्त्रों के ज्ञाता होकर गुण कर्म से ब्राह्मण हो जाते थे।ऐसे लोगों के प्रेरणा के स्त्रोत होने के कारण महर्षि वाल्मीकि शूद्रों के गुरु कहलाये।इसलिये वाल्मीकि समाज का महर्षि वाल्मीकि से वही संबंध है जो एक प्रज्ञावान सुयोग्य गुरु और एक श्रद्धावान् शिष्य में होता है।
प्रश्न 10- अकेले महर्षि वाल्मीकि जी के नाम पर एक कौम का नाम वाल्मीकि क्यों पड़ा ?
उत्तर – वाल्मीकि नाम किसी कौम का नाम नहीं है।वाल्मीकि समाज ने महर्षि वाल्मीकि के नाम से ‘वाल्मीकि कौम’ की कल्पना कर स्वयं को संदेहास्पद बना दिया है। वाल्मीकि कौम की कल्पना का अभिप्राय तो यह हुआ कि जो अशास्त्रीय वर्णव्यवस्था मात्र जन्म पर आधारित मानने की महती भूल से भारत के चतुर्दिक् पतन का कारण बनी , उसी जन्म पर आधारित कथित वर्णव्यवस्था को प्रकारांतर से स्वीकार कर लेना।शास्त्र के अनुसार वर्ण गुणकर्म के आधार पर माना गया है।कौम की कल्पना जन्ममात्र पर आधारित होती है।जब आप स्वयं ही कौम शब्द का प्रयोग करके अपने आप को जन्म पर आधारित करने लगे हैं तब आप सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक और राजनैतिक समानता कैसे प्राप्त करेंगे? फिर तो वही बात हो गई कि किसी वेदों के विद्वान ब्राह्मण के घर में जन्म लेने मात्र से उनके अनपढ़ बेटे को केवल इसलिये वेदों का विद्वान मान लिया जाये क्योंकि उसके पिता वैदिक विद्वान हैं।
कौम शब्द में निहित संकीर्णता को महर्षि वाल्मीकि के उदार विचारों के समतुल्य बैठाना उचित नहीं है। इस शब्द में निहित आसुरी विचार महर्षि के धर्मसम्मत शास्त्रीय विचारों से मेल नहीं खाते।इसलिये यदि वाल्मीकि समाज स्वयं को महर्षि का सच्चा और श्रद्धावान अनुयायी मानता है तो उसे अपने आप को कौम मान लेने का राष्ट्रघाती विचार त्यागना होगा।वैदिक वर्णव्यवस्था के अनुसार उसे ज्ञान द्वारा ब्राह्मण बनने का पूरा अधिकार है। यही महर्षि का उपदेश है।
प्रश्न 11- महर्षि जी ने शिक्षा कहां प्राप्त की जबकि हरिजनों के लिये स्कूल के दरवाजे चार हजार साल बंद रहे ?
उत्तर – आपका प्रश्न भ्रांतिकारक है। इसमें सबसे बड़ी भ्रांति है महर्षि वाल्मीकि को हरिजन समझ लेना और वह भी चार हजार वर्ष पूर्व का।प्राचीन भारत में शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी। उस समय हरिजन शब्द का प्रयोग कहीं नहीं होता था।इस शब्द का प्रयोग गांधी ने किया।प्राचीन काल की गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक भारतीय के लिये पढ़ना अनिवार्य था।यदि पाठशालाओं में जाकर कोई सीख न सके, वह दूसरी बात थी। वस्तुत: किसी के लिये भी पाठशाला के द्वार बंद नहीं थे।
प्रश्न 12- महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण में अपने लिये दो शब्द क्यों नहीं लिखे
जबकि उन्हें समाज द्वारा चोर डाकू कहा गया है ?
उत्तर – महर्षि वाल्मीकि ने वाल्मीकीय रामायण में अपने कुल का परिचय दिया है।आश्चर्य है कि उनके अनुयायी होते हुये भी आपने रामायण के उस विशेष स्थल का अध्ययन नहीं किया।उनका कुल और उनके कुल से शिक्षा प्राप्त विद्वान मनीषी वंदनीय हैं। वाल्मीकि मुनि को भ्रमवश चोर-डाकू कहा जाता है।
प्रश्न 13- महर्षि वाल्मीकि जी ने श्रीराम के पुत्रों को शिक्षा दी । क्या एक भी अछूत शिक्षा के काबिल नहीं था ?
उत्तर : निवेदन है कि महर्षि वाल्मीकि त्रेता युग में हुये थे।उस प्राचीन काल में अछूतपन की कल्पना भी नहीं थी।छूआछूत संबंधी कल्पना मुस्लिम-अंग्रेजी गुलामी काल की देन है। अत: इस निराधार कल्पना को त्रेता युग में देखना अदापि उचित नहीं है। विशेषकर अंग्रेजों और उनके मानसपुत्रों ने अछूत प्रसंग को अतिरंजित रूप से उभारा था। इन मानसपुत्रों ने इसे सांप्रदायिक वैमनस्य की राष्ट्रघाती सीमा तक उभार दिया।वामपंथी लेखक भी दशकों से इस घातक प्रसंग को उछाले जा रहे हैं।
प्रश्न 14- महर्षि जी जब इतने अज्ञानी थे कि जब उन्हें राम-राम के दो शब्द भी याद नहीं रहे और वह मरा-मरा रटने लगे तो इतनी बड़ी रामायण उन्होंने कैसे लिख दी ?
उत्तर – महर्षि वाल्मीकि अज्ञानी नहीं थे।अज्ञानी व्यक्ति किसी साधारण से काव्य की भी रचना नहीं कर सकता , रामायण जैसी अति श्रेष्ठ कृति की रचना करना तो बहुत दूर है।रामायण काव्य मात्र नहीं अपितु यह एक काव्यात्मक ऐतिहासिक ग्रंथ है जो अधर्म और अन्याय पर धर्म और न्याय की महत्वपूर्ण विजय का प्रतीक है।भारतवर्ष के प्राचीन मनीषियों के मत में किसी पूर्वघटित घटना विशेष को लेखनीबध्द कर देना मात्र इतिहास नहीं है।किसी लेखनीबध्द घटना में जबतक पुरुषार्थ चातुष्टय संबंधी दिशा निर्देश न हो तबतक वह इतिहास नहीं कहला सकती।अत: इतिहास की एक विशिष्ट परिभाषा है।
इतिहास पूर्ववर्ती सत्य घटनाओं की स्मृति पर आधारित होता है।दीर्घदर्शी वाल्मीकि की स्मृति जन्म-जन्मांतर तक का ज्ञान रखती थी।राम-राम के स्थान पर मरा-मरा रूप उल्टे मंत्र को जपना किसी अज्ञानी का नहीं अपितु महाज्ञानी का काम है। वाल्मीकीय रामायण का प्रारम्भ तप:स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् शब्दों से होता है। जिस ग्रंथ का प्रारंम्भ ही तप और स्वाध्याय ( कर्म और विद्या ) से होता हो उसका रचयिता कदापि अज्ञानी नहीं हो सकता।
प्रश्नों के उत्तर पाने के पश्चात् फरीदाबाद का प्रबुध्द वाल्मीकि समाज संतुष्ट और प्रसन्न हो गया। उनके समस्त भ्रम दूर हो गये।तुरंत ही समाचार पत्र के 26 जुलाई 1989 के अंक में नीलम-बाटा मार्ग पर स्थित अंबेडकर नगर के वाल्मीकि मंदिर में महर्षि की प्रतिमा स्थापित होने का समाचार वाल्मीकि समुदाय के नाम से प्रकाशित हुआ।इस समारोह में वाल्मीकि समुदाय के प्रतिनिधि रमेश पारछा ने धन्यवाद देते हुये कहा:
” पत्र में प्रकाशित उत्तर से हमें पता चला कि हम अछूत नहीं बल्कि हिंदू समाज के अभिन्न अंग हैं।”
और इस प्रकार हिंदुओं को विभाजित करने वालों को मुंह की खानी पड़ी।
विदेशी ताकतों के हाथ की कठपुतली बने अम्बेडकरवादी राष्ट्रवादी और हिंदुत्ववादी वाल्मीकियों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे है। इस लेख को पढ़कर कोई भी छदम अम्बेडकरवादियों के मुँह बंद कर सकता है।

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