कहां-कहां है दीमक भारत में?

ओमप्रकाश त्रेहन

दीमक प्राय: दिखाई नही देती। केवल चुपचाप पेड़ को खोखला करती है। पता तब चलता है जब पेड़ अचानक गिरता है। यही काम हमारे देश में साम्यवादी अर्थात कम्युनिस्ट करते हैं। इनकी हिंदुओं के प्रति घृणा विश्वविख्यात है। फिर भी देश के लोग अनजाने में भोलेभाव से इन्हें स्वीकार कर लेते हें। जिन्होंने इस देश का इतिहास बिगाड़ा आज वही इस देश का इतिहास लिखने बैठे हैं। 1942 में इन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया। 1947 में मुस्लिम लीग की पाकिस्तान बनाने की मांग का समर्थन किया। 1962 में भारत पर हुए चीनी आक्रमण को इन्होंने आज तक आक्रमण नही माना और न ही कभी चीनी आक्रमण की निंदा की। ऐसे में इन लोगों को देश का इतिहास, स्कूलों की पुस्तकें लिखने का उत्तरदायित्व सौंपना देशद्रोह नही तो क्या है?

ये लोग शिक्षा में विशेष रूप से इतिहास की पुस्तकों द्वारा छात्रों को समाचार पत्रों और टीवी चैनलों में आम नागरिकों को गुमराह करने का सफल प्रयास कर चुके हैं। जरा नमूने देखें बात जब राम जन्मभूमि की या शंकराचार्य की गिरन्फ्तारी की हो तो कहा जाता है कि कानून को अपना काम करने दो। जब संसद पर हुए हमले पर अफजल को मृत्युदंड देने की बात आयी तो तीन अदालतों द्वारा मृत्युदंड देने पर भी न्यायाधीशों के निर्णय पर प्रश्न चिन्ह लगाये जा रहे हैं। जेहादी व साम्यवादी एक साथ इकट्ठे बोल रहे हैं। पूरे देश को सरेआम दोगलेपन से गुमराह किया जा रहा है। हम कितने गुमराह हो गये हैं कि अफजल के पक्ष में जोर अधिक विरोध कम दिखाई दे रहा है। यह साम्यवादियों की मेहनत का फल है और देश का आम आदमी देश को जानने व समझने में रूचि नही रखता।

दीमक पेड़ को खोखला करने के बाद भी स्वयं भी खोखली रहती है। साम्यवादी विचारों के अग्रणी देश सोवियत रूस के लिए एक दिन ऐसा आया कि स्वयं खोखला हो भूखों मरने लगा तब वहां उसने साम्यवाद से नाता तोड़ा, यही हाल चैकोस्लोवाकिया और यूगोस्लाविया में हुआ लौट के बुद्घू घर को आये लेकिन जो फिर भी घर नही आये वह भारत के साम्यवादी कहलाए। भारत को खोखला होने से बचाना है तो इनकी पहचान और इन्हें वहां से उखाडऩे के लिए प्रत्येक देशभक्त को कटिबद्घ होना होगा। जिस चैनल या जिस समाचार पत्र में वे जगह बनायें, पाठक व दर्शक उसके शून्य हो जाएं। यह एक आंदोलन हो जैसा सन 1962 में भारत पर चीनी हमले के समय हुआ था।  मजहबी दंगों में जैसे मऊ में जब हिंदू मरे तो मुस्लिमों पर हिंदुओं को मारने का आरोप न लगे तब शीर्षक देंगे-दो सम्प्रदायों में दंगा बीस मरे दस घायल। लेकिन यदि मुस्लिम मरे तो मरने वाले का, डरने वाले का, रोने वाले का नाम, पता और उसका फोटो बार-बार छपेगा टीवी में दिखेगा जैसे कि गुजरात दंगों का प्रचार हुआ।

हिंदू यदि अपनी जान बचा ले तो उसे हिंदुत्व फोर्स के नाम से बदनाम किया जाता है। शिक्षा साम्यवादी इतिहासकारों ने बिना प्रमाण के केवल साम्यवादी अनुमान लगाकर इतिहास लिखा नही तो वे बताते कि आर्य किस देश से आए उस देश का प्रमाण का उल्लेख करते लेकिन गुमराह करने वाले वाक्यों को लिखा जैसे कि-ऐसा माना जाता है कि ऐसा इतिहासकारों का मत है और फिर साम्यवादी झूठ और गालियों का सिलसिला। हिंदुओं के विभिन्न वर्णों में वैमनस्य हो इसके लिए इन्होंने अपने लेखकों को पार्ट टाइम काम दे रखा है, जिनमें जाने माने नाम जाने जा सकते हैं। लेकिन अक्ल के मारे नही जानते कि मुगलकाल से पूर्व इस देश में दलितों के साथ छुआछूत नही था अन्यथा एक ब्राह्मïण चाणक्य के द्वारा एक दलित चंद्रगुप्त मौर्य इस देश का राजा न बनता और इस देश ने चंद्रगुप्त मौर्य को न केवल राजा माना बल्कि पूरा सम्मान दिया। शिवाजी से लेकर बाबा साहब अंबेडकर के जीवन के कुछ ऐसे पृष्ठ हैं जिन्हें यह कभी भी सामने नही आने देंगे। बाबा साहब अंबेडकर को ब्राह्मïण जाति अंबेडकर दी गयी और महार से अंबेडकर कहलाए। यह बालक चंद्रगुप्त मौर्य की तरह भारत के आकाश पर चमका लेकिन साम्यवादी आंदोलन ने दलित आंदोलन में ऐसी हवा फूंकी कि बाबा साहब अंबेडकर तो बने लेकिन उसके गुरू को लील गये और दो वर्णों में घृणा की रेखाएं खींच दीं। इतिहास में सच को सम्मानजनक स्थान देना इनके बस की बात नही है। इनके गुमराह करने का इससे बड़ा और क्या प्रमाण होगा कि इन्होंने शिक्षा की किसी भी पुस्तक में जिहाद के प्रकार और उसकी परिभाषा तक नही दी और न ही इतिहास की पुस्तकों में जिहादी अत्याचारों का उल्लेख होने दिया। जिहाद की बात छोड़ो विश्व इतिहास में साम्यवादियों ने जो जिहादियों की भांति रूप व अन्य साम्यवादी देशों में लाखों लोगों की हत्याएं कीं उन्हें भी इतिहास में नही आने दिया। जिहादी व साम्यवादी अपने सच से डरते हैं इसलिए इतिहास लेखन किसी अन्य के हाथ नही आने देते। साहित्य-आज का साहित्य कैसा है नाटक कैसा है? नाटकों में साम्यवादी लेखन के कारण से ही आज वहां दर्शक नही हैं और न ही पढऩे वाले पाठक हैं। कचरे को सरकारी अनुदान व पुरस्कार से छापकर पाठ्यपुस्तकों के रूप में तो बेचा जा सकता है लेकिन बिक्री से नही  साम्यवादी प्रख्यात लेखकों की श्रेणी में केवल इसलिए आये कि साहित्य अकादमी जैसे संस्थानों में कोई कामरेड भाई पहले से इन्हें पुरन्स्कृत करने बैठा है। तू डाल डाल मैं पात-पात। हिंदुओं को गाली हिंदुओं से ही दिलवानी हो तो भारत के प्रथम शिक्षामंत्री मौलाना से लेकर नरूल हसन को साम्यवादियों से बढक़र इससे अच्छा कोई नही मिला। जिहादी और साम्यवादी दोनों मिलकर साथ-साथ क्या गुल खिलाएंगे? एक शरीर में खिलातो दूसरा माओवादी-नक्सवादी बना। दोनों का एक ही ध्येय है हिंदुओं से घृणा और हिंसा। हिंदुओं से घृणा करने वालों को इस देश का इतिहास लिखने का कोई अधिकार नही है। घृणा से इतिहास नही लिखा जा सकता। हमें यह सच्चाई अपने विद्यालयों में पढऩे वाले छात्रों को सीधे सीधे बतानी होगी। यह दायित्व हमारे अध्यापकों और प्राध्यापकों का है कि वह साम्यवादी और जिहादी कचरे को पढ़ाते समय सच भी बतायें। साम्यवादी कचरे को रूस यूगोस्लाविया और चैकोस्लावाकिया ने कूड़ेदान में फेंक दिया फिर इसे क्यों हमारे विश्वविद्यालयों में माक्र्सवाद के नाम से पढ़ाया जा रहा है? जेएनयू के पाठ्यक्रम की सीमाक्षा नही चाहिए, अन्यथा हमारे देश में अर्जुन सिंह जैसे लोग दीमक के अंडे इस देश के वटवृक्ष पर पैदा करते रहेंगे।

(साभार : अखिल हिंदू सभा वार्ता से)

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