हिंदुत्व की राजनीति के रास्ते पर आती प्रियंका गांधी को दी जा रही है मुस्लिम समर्थन

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अजय कुमार

हाल यह है कि प्रियंका जहां भी पहुंचती हैं, वहां भीड़ तो खूब जुट जाती है, लेकिन इस भीड़ में वह लोग ज्यादा होते हैं जो प्रियंका की कांग्रेस को वोट देने नहीं, उनका चेहरा देखने आते हैं। यह सच है कि तमाम राजनैतिक लड़ाइयां चेहरों के बल पर ही जीती जाती हैं।

कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका वाड्रा फिर मैदान में हैं। 2019 में जहां उनके निशाने पर ‘दिल्ली का ताज’ था, वहीं अब प्रियंका की नजर यूपी की गद्दी पर लगी है। बस फर्क इतना है कि 2019 में प्रियंका को अपने भाई और तब के अमेठी के सांसद राहुल गांधी का भी साथ मिल रहा था, लेकिन अब राहुल केरल की वॉयनाड लोकसभा सीट से सांसद हैं। अमेठी में हार के बाद राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश से किनारा कर लिया। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अब कुछ माह ही शेष बचे हैं, लेकिन अभी तक राहुल गांधी की यूपी विधान सभा चुनाव को लेकर बेरूखी बरकरार है। ऐसे में प्रियंका के कंधों पर कांग्रेस और गांधी परिवार की साख बचाने की दोहरी जिम्मेदारी आ गई है, लेकिन प्रियंका के साथ मजबूरी यह है कि यूपी में न तो संगठन मजबूत है, न ही दमदार नेता दिखते हैं, जो कार्यकर्ता कभी कांग्रेस की रीढ़ की हड्डी हुआ करते थे, उन्होंने या तो दूसरे दलों का दामन थाम लिया है अथवा निराशा की चादर ओढ़कर घर में सो गए हैं। जो कांग्रेस का झंडा-बैनर लिए दिखते भी हैं उनमें राजनैतिक परिपक्वता की कमी दिखाई देती है और यह नेता हुड़दंग को ही अपना जनाधार समझने की अवधारणा पाले हुए हैं। एक तरह से यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि प्रियंका वाड्रा एक ऐसी ‘सेना’ (कांग्रेस) की ‘सेनापति’ नजर आ रही हैं, जिनके पीछे कदम ताल करने के लिए ‘सैनिक’ ही नहीं हैं।

हाल यह है कि प्रियंका जहां भी पहुंचती हैं, वहां भीड़ तो खूब जुट जाती है, लेकिन इस भीड़ में वह लोग ज्यादा होते हैं जो प्रियंका की कांग्रेस को वोट देने नहीं, उनका चेहरा देखने आते हैं। यह सच है कि तमाम राजनैतिक लड़ाइयां चेहरों के बल पर ही जीती जाती हैं, लेकिन प्रियंका वाड्रा में वह गुण नहीं दिखते हैं, जो उनकी दादी और परदादा में हुआ करते थे। प्रियंका में न तो राजीव गांधी जैसा ‘विजन’ दिखता है और न ही सोनिया गांधी जैसा जुझारूपन जिसके चलते 2004 में तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच कांग्रेस केन्द्र में सरकार बनाने में सफल रही थी, जबकि उस समय कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सशक्त नेता मोर्चा संभाले हुए थे।
   
दरअसल, सवाल गांधी परिवार की मंशा पर भी उठ रहा है। जब कांग्रेस प्रियंका वाड्रा के चेहरे के सहारे मिशन यूपी फतह करना चाहती है तो प्रियंका को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट करने से कांग्रेस क्यों कतरा रही है। जबकि पूर्व केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता सलमान खुर्शीद गोलमोल शब्दों में कह रहे हैं कि प्रियंका गांधी ही कांग्रेस की सीएम मैटीरियल हैं। सलमान के बयान को कांग्रेस आलाकमान ने भी खारिज नहीं किया है, जिससे यही लगता है कि सलमान सही कह रहे हैं, लेकिन गांधी परिवार दुविधा में फंसा है कि प्रियंका को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया तो कहीं कांग्रेस की बागडोर गांधी परिवार से निकल कर वाड्रा फैमली में नहीं चली जाए। क्योंकि दिल्ली का रास्ता यूपी से ही होकर जाता है, जो यूपी में मजबूत होता है, दिल्ली में भी उसी की धमक सुनाई देती है। कांग्रेस ने तो लम्बे समय तक यूपी के सहारे केन्द्र में राज किया है। इसी तरह से जब यूपी में बसपा-समाजवादी पार्टी को मजबूती मिली तो इन दोनों दलों के नेताओं ने केन्द्र सरकार को अपने हिसाब से चलाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी। 2004 से 2014 तक यूपीए की सरकार इस बात की सबसे बड़ी गवाह है। अब यूपी में बीजेपी मजबूत है तो केन्द्र में मोदी राज कर रहे हैं। ऐसे में यदि प्रियंका यूपी में कांग्रेस को जीवनदान देने में सफल हो जाती हैं तो दिल्ली अपने आप उनकी मुट्ठी में आ जाएगा, यह बात शायद ही राहुल गांधी को पीएम बनाने का सपना देख रहीं सोनिया गांधी को पसंद आए।
वैसे दूसरी तरफ चर्चा इस बात की भी है कि कांग्रेस आलाकमान राहुल गांधी के बाद प्रियंका को भी ‘सियासत की झाड़’ पर चढ़ाकर उनका राजनैतिक जीवन शुरू होने से पहले खत्म नहीं करना चाहता है। कांग्रेस आलाकमान को पता है कि यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजों से कांग्रेस उस स्थिति में नहीं आने वाली है जिसके सहारे उसकी सरकार बन सके। इतना ही नहीं कांग्रेस को तो इस बात की भी उम्मीद नहीं है कि वह सरकार बनाना तो दूर ‘किंग मेकर’ भी बन सकती है।
कांग्रेस के लिए परेशानी यहीं खत्म नहीं हो जाती है। सबसे दुखद पहलू यह है कि जिस कांग्रेस की कभी केन्द्र सहित तमाम राज्यों में अपनी सरकारें हुआ करती थीं, वह महाराष्ट्र, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि तमाम राज्यों में सी ग्रेड की पार्टी बनकर रह गई है। उससे बड़े दल तो दूर छोटे-छोटे राजनैतिक दल भी चुनावी समझौता नहीं करना चाहते हैं। बात यहीं तक सीमित नहीं हैं, न जाने प्रियंका वाड्रा को किसने यह बता दिया है कि उनके मंदिरों के चक्कर, माथे पर टीका लगाने और हाथ में मूर्ति पकड़ लेने भर से कांग्रेस के अच्छे दिन लौट आएंगे। कांग्रेस और प्रियंका चाहे जितने भी टोटके अपना लें, लेकिन फिलहाल तो नहीं लगता है कि हिन्दुत्व की राजनीति में वह बीजेपी या योगी को पछाड़ पाएंगी, अच्छा होता कि प्रियंका अपना हिन्दूवादी चेहरा चमकाने की बजाए सबको साथ लेकर चलने वाली छवि बनातीं। इससे उन्हें मुसलमानों का भी साथ मिलता और जो लोग योगी सरकार के कामकाज से खुश नहीं हैं, वह भी कांग्रेस के साथ आ जाते, लेकिन अपनी हिन्दुत्व वाली छवि के चलते प्रियंका वाड्रा 14 फीसदी मुसलमानों से दूर होती जा रही हैं।

लब्बोलुआब यह है कि यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में कहीं मजबूती के साथ खड़ी नजर नहीं आ रही है तो उसके लिए प्रियंका वाड्रा भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। 2019 लोकसभा चुनाव के समय प्रियंका को जब उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था, तभी यह भी स्पष्ट कर दिया गया था कि 2022 के विधान सभा चुनाव भी कांग्रेस प्रियंका की लीडरशिप में ही लड़ेगी, लेकिन प्रियंका ने यूपी की सियासत में पैर जमाने की कोशिश ही नहीं की। वह ट्विटर के माध्यम से अपनी राजनीति चमक जाने का ख्वाब पाले रहीं। अब जब चुनाव सिर पर आ गया तो प्रियंका वाड्रा इधर से उधर दौड़ लगा रही हैं, लेकिन उनके सामने न कोई वीजन है न कोई प्लानिंग। बीजेपी के विरोध में कांग्रेस और प्रियंका ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली है, जिसके चलते वह उत्तर प्रदेश की जनता का मूड और सियासत का रूख ही नहीं भांप पा रही हैं। हाल यह है कि यूपी के चुनाव सिर पर हैं और प्रियंका अभी तक दिल्ली में बैठकर ही यूपी की सियासत का पारा नापने में लगी हैं, जबकि चुनाव के मद्देनजर प्रियंका को काफी पहले से ही लखनऊ में अपना ठिकाना बना लेना चाहिए था।

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