राजनीति सेवा है इसमें पद की अवसरवादिता भ्रष्टाचार

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सुबोध कुमार

गत वर्ष हो रहे पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों संबंधी राजनीतिक पार्टियां सक्रिय हो गई हैं। दलबदली, वापसी से लेकर गठबंधन बनाने का माहौल गर्माने लगा है। यह बात भी बड़ी अहम है कि पंजाब में जहां कई बार राज्य की सत्ता संभाल चुके शिरोमणी अकाली दल (बादल) ने बसपा के साथ समझौता कर लिया है। बड़ी बात यह है कि अकाली दल ने सरकार बनने पर उप मुख्यमंत्री का पद बसपा के लिए छोड़ दिया है।

पंजाब एक ऐसा राज्य है जहां दलित वोट जनसंख्या के अनुपात में पूरे राज्य में सबसे अधिक हैं। खासकर राज्य के दोआबा क्षेत्र में बसपा भले ही दो दशकों से कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं कर सकी, लेकिन पार्टी की राजनीतिक जमीन का बहुत महत्व है। अक्सर गठबंधन का उद्देश्य चुनाव जीतना रहता है व मुद्दों की बात बाद में होती है। भले ही अकाली दल प्रधान ने कहा है कि गठबंधन सिर्फ चुनावों के लिए नहीं, चुनावों के बाद भी यह जारी रहेगा, लेकिन दोनों पार्टियों ने इस मामले में अभी अपनी सैद्धांन्तिक नजदीकियां स्पष्ट करनी हैं।

पिछले महीने में हुए नगर कौंसिल के चुनावों में अकाली दल (बादल) भाजपा के साथ अलग होने के बावजूद भी राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरा था। इसलिए पार्टी ने बसपा के वोट बैंक का सहारा लेने की रणनीति तैयार की है। अकाली दल ऐसा करके भाजपा की कमी को पूरा करने की कोशिश करेगा। दरअसल गठबंधन देश की राजनीति की वास्तविकता बन चुका है। राज्यों से लेकर केन्द्र तक गठबंधन सरकारें चल रही हैं। यह बात अब अकाली दल व बसपा दोनों को देखनी होगी कि वह पंजाब के मुद्दों के प्रति किस तरह की पहुंच अपनाते हैं।

उधर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता जितिन प्रसाद ने भाजपा का दामन थाम लिया है। बंगाल में सरकार बनने के बाद भाजपा में गए तृणमूल कांग्रेस के बड़े व पुराने नेता मुकुल राय ने अपने बेटे सहित पार्टी में वापसी कर ली है। यह घटना बहुत से सवाल खड़े करती है कि कोई नेता चुनावों से पहले कैसे अपनी पार्टी को छोड़ जाता है, व चुनाव होने के बाद बहुत बार लौट भी आता है। दूसरी पार्टियों के नेता पटा लेने वाली पार्टी की अपनी विचारधारा व रणनीति पर भी सवाल खड़े होते हैं कि किसी पार्टी विशेष में आने वाला नेता किस लालचवश आता है व प्रतिद्वंद्वी पार्टी महज वोटआंकड़े बढ़ाने के लिए बिना वैचारिक समानता के झट से शामिल कर लेती है।

दलबदलियों का दौर पार्टियों की विचारधारा के खोखलेपन के साथ-साथ नेता की निजी राजनीतिक कमजोर पकड़ को उजागर करता है।

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