गोवंश के लिए संजीवनी है मीठा सोडा

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गायो का प्राथमिक प्राकृतिक आहार गोचर भूमि जंगल की रसीली हरी घास वनौषधि या खेतों में उगाया जाने वाला सूखा वह हरा चारा ही है जिसमें उच्च मात्रा में फाइबर vitamin protein मौजूद रहता है। गाय के पेट के विशेष हिस्से रूमन में जा कर यह सूखा हरा चारा गाय के पेट की लाजवाब बायोकेमिस्ट्री से अपचयित होकर अमृत्तुल्य दूध में तब्दील हो जाते हैं। गाय के पेट का वह हिस्सा जहां गाय के द्वारा चारा ब्रेकडाउन होकर पोषण में तब्दील होती है अर्थात रूमैन की पीएच वैल्यू 6 से 7 के बीच होती है। पश्चिमी देशों में गायों से अधिक दूध उत्पादन के लिए उनके आहार को लेकर अधिक से अधिक प्रयोग हुए। गायों के आहार में गेहूं मक्का जौ के दाने को उनकी खुराक में शामिल किया गया। जिस में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा होती है। अनाज दानों में कार्बोहाइड्रेट स्टार्च की उच्च मात्रा ही गायों के लिए एसिडोसिस जैसे मेटाबॉलिक डिसऑर्डर रोग को उत्पन्न करती है जो अपने आप में बहुत बड़ी व्याधि है। ऐसी गाय जिनको हरा सूखा चारा तिनका कम मात्रा में लेकिन गेहूं जो मक्का का दाना सामान्य से अधिक मात्रा में मिलता है इस आहार का गायों के पेट के विशेष हिस्से रूमन में जाकर फर्मेंटेशन होता है फर्मेंटेशन के कारण अधिक मात्रा में लैक्टिक एसिड उत्पन्न होता है लैक्टिक एसिड में फलने फूलने वाले हानिकारक बैक्टीरिया बढ़ते हैं फाइबर आहार को पचाने वाले मित्र बैक्टीरिया गट फ्लोरा तेजी से नष्ट होने लगते हैं गाय की खून में हानिकारक एंडोटोक्सीन बढ़ जाते हैं। खून मैं अम्ल की मात्रा सामान्य से से 10 गुनी बढ़ जाती है इसे ही एसिडोसिस बोला जाता है। यह तेजाब गाय के पेट की अंदरूनी परत संरचना को क्षतिग्रस्त करता है गायों में सैकड़ों बैक्टीरिया जनित संक्रमण के लिए अकेला जिम्मेदार है। पेट के अंदर की परत में छेद होने से हानिकारक बैक्टीरिया खून में मिलकर तमाम अंगों में जाकर संक्रमण करते हैं एसिडोसिस थन की खराबी से लेकर गाय के खुर में खतरनाक संक्रमण लैमिनाइटिस आंतों में लिवर में पस तक पड़ जाती है।

गाय के खून में जब अम्लता अधिक हो जाती है तो गाय चारा पानी खाना कम कर देती है एकदम छोड़ देती है। गाय की धड़कन बढ़ जाती है शरीर का तापमान भी बढ़ने लगता है। दूध एकदम घट जाती है दूध में फैट की मात्रा 2% से भी नीचे आ जाती है। गायों की प्रजनन क्षमता भी नष्ट हो जाती है जब यह रोग अधिक बढ़ जाता है। आजकल के डेरी फार्मर पशुपालक हैरान परेशान हो जाते हैं। वेटरनरी की महंगी अंग्रेजी दवाइयों के लिए दौड़ धूप शुरू हो जाती है। इलाज गाय की खून में बढ़ी हुई अम्लता का होना चाहिए लेकिन इलाज होता है अम्लता से होने वाले दुष्प्रभाव का अर्थात संक्रमण को कम करने के लिए महंगी से महंगी एंटीबायोटिक गाय को दी जाती है। इसका दुष्प्रभाव गाय के लीवर पर पड़ता है। हमारे बुजुर्ग बहुत बुद्धिमान थे उनका साइंटिफिक टेंपरामेंट गजब था गाय की किसी भी रोग को diagnose करने की विधि जन्मजात परंपरागत कौशल पर आधारित थी । वह गायों को कभी भी दाना अधिक नहीं खिलाते थे वह हरा सूखा प्राकृतिक चारा ही खिलाते थे जिसमें मौसमी चारा शामिल होता था ज्वार बाजरा ग्वार आदि आदि। गाय के रक्त की अम्लता के लिए क्षारीय पदार्थ सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं। पहले गायों को एक दूसरे तीसरे दिन 10 से 20 ग्राम मीठा सोडा अर्थात सोडियम बाइकार्बोनेट खाने के लिए दिया जाता था सोडा अल्कलाइजर होता है जो गाय की पेट में जाकर चारे के पाचन में उपयोगी good bacteria की ग्रोथ करता है हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करता है गाय के पेट में लैक्टिक एसिड की मात्रा को सामान्य करता है। गाय को सोडा देने से गाय अधिक मात्रा में पानी पीती है ऐसे में रक्त की अम्लता हानिकारक विजातीय पदार्थ पेशाब के रास्ते तेजी से मुक्त होते हैं। जिन पशुओं के दूध में बदबू आती है ऐसे पशुओं को सोडा खिलाने से यह समस्या दूर हो जाती है । जिन दुधारू पशुओं का आहार में पर्याप्त मात्रा में सोडा दिया जाता है पशु और पशुपालकों के दुश्मन थनैला रोग से ग्रस्त होने की संभावना महज 2 प्रतिशत पाई जाती है।

गोवंश के लिए मीठा सोडा संजीवनी है प्रत्येक गाय को 10 से 20 ग्राम तक की मात्रा में ऐसीडोसिस ही नहीं गोवंश में मेटाबॉलिज्म पाचन संबंधी अधिकांश समस्या में होने पर दूसरे तीसरे दिन वैकल्पिक तौर पर सोडा खिलाया जाना अति आवश्यक है । आजकल की परिस्थिति में तो है अति आवश्यक है। अब गायो को फाइबर युक्त हरा चारा नहीं मिलता गाय पूरी तरह दाना मिश्रण पर ही निर्भर है, और हमें यह ध्यान रखना चाहिए था गेहूं जो मक्का दाना मिश्रण गायों का प्राथमिक प्राकृतिक आहार नहीं है यह इंसान ने अपने स्वार्थ के लिए उसके आहार में शामिल किया है उससे क्षमता से अधिक दुग्ध उत्पादन प्राप्त करने तथा इस शरीर में मांस की वृद्धि के लिए उसे विक्रय के लिए मोटा ताजा दिखाने के लिए। आजकल की परिस्थिति के लिए जलवायु परिवर्तन के कारण हरा सूखा चारा उपलब्ध नहीं है तो दाना मिश्रण संतुलित मात्रा में देने में कोई परेशानी नहीं है लेकिन जब मात्रा का अतिक्रमण होता है गाय जैसा परोपकारी प्राणी इसका खामियाजा उठाता है। ऐसे में हमें दोहरे नुकसान से बचने के लिए अर्थात वेटरिनरी मेडिसिन जो बहुत महंगी होती है इनकी निर्माता कंपनियों के आर्थिक शोषण से बचते हुए अपने परंपरागत पशु चिकित्सा पद्धति को इस्तेमाल में लाना चाहिए। सोडा भी ऐसी ही एक निरापद औषधि है।

आर्य सागर खारी✍✍✍

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