क्या जितिन प्रसाद उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को भाजपा के साथ जोड़े रखने में मददगार साबित हो सकते हैं ?

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संतोष पाठक

2008 में जितिन प्रसाद राहुल गांधी के कोटे से मनमोहन सिंह की सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री के तौर पर शामिल हुए। लेकिन देशभर खासकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की खस्ता होती हालत का खामियाजा जितिन प्रसाद को भी भुगतना पड़ा।

मनमोहन सिंह की सरकार में राहुल गांधी के कोटे के तहत मंत्री बने जितिन प्रसाद ने भी भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है। जितिन प्रसाद कांग्रेस के दिग्गज ब्राह्मण नेता रहे जितेन्द्र प्रसाद के बेटे हैं। जितेन्द्र प्रसाद भारत के दो प्रधानमंत्रियों राजीव गांधी और पी.वी. नरसिम्हा राव के सलाहकार रह चुके हैं। सोनिया गांधी ने जब कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी तो उस समय जितेन्द्र प्रसाद और राजेश पायलट ने ही उनके खिलाफ चुनाव लड़ा था। निश्चित तौर पर पिता की विरासत का फायदा जितिन प्रसाद को मिला। 1973 में यूपी के शाहजहांपुर में ही जन्मे जितिन के राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत साल 2001 में भारतीय युवा कांग्रेस से हुई। 2004 में लोकसभा का चुनाव जीतकर जितिन प्रसाद पहली बार सांसद बने। धीरे-धीरे वो राहुल गांधी के करीब आते गए और ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट की तरह ही जितिन प्रसाद को भी राहुल गांधी के युवा नेताओं की टीम का अभिन्न हिस्सा माना जाने लगा।

2008 में जितिन प्रसाद राहुल गांधी के कोटे से मनमोहन सिंह की सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री के तौर पर शामिल हुए। लेकिन देशभर खासकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की खस्ता होती हालत का खामियाजा जितिन प्रसाद को भी भुगतना पड़ा। 2014 के बाद एक-एक करके तीन चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। पश्चिम बंगाल के प्रभारी के तौर पर भी उनका प्रदर्शन काफी खराब रहा। धीरे-धीरे वो कांग्रेस आलाकमान की कोर टीम से भी बाहर होते चले गए और जबसे प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश की कमान संभाली तब से वो लगातार अपने आपको उपेक्षित महसूस करने लगे।

कहा तो यहां तक जा रहा है कि जितिन 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ही भाजपा में शामिल होने वाले थे लेकिन उस वक्त अंतिम समय पर बात नहीं बन पाने के कारण जितिन प्रसाद ने अपना इरादा बदल दिया था। हालांकि इस समय पर जितिन प्रसाद के कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल होने के कई मतलब भी निकाले जा रहे हैं। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय को याद कीजिए। भाजपा ने उस चुनाव की तैयारी भी लगभग दो साल पहले 2015 से ही शुरू कर दी थी और उस समय हमने देखा था कि बृजेश पाठक, स्वामी प्रसाद मौर्य, रीता बहुगुणा जोशी जैसे कई दिग्गज कांग्रेसी, बसपाई और सपाई नेताओं को भाजपा में शामिल करवाया गया था।

अब 2022 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। पिछले कुछ दिनों से योगी आदित्यनाथ और भाजपा आलाकमान के बीच तनातनी की खबरों से निश्चित तौर पर भाजपा के खिलाफ माहौल बनता जा रहा है। भाजपा की तमाम कोशिशों के बावजूद इस तरह की खबरों पर लगाम नहीं लग पा रही है। प्रदेश में ब्राह्मणों की योगी सरकार से नाराजगी की खबरें लगातार आ रही हैं। दिल्ली से सटे गाजियाबाद से लेकर बिहार की सीमा से लगे गोरखपुर तक लगातार ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी की खबरें आ रही हैं और कई नेता एवं संगठन उन्हें प्रदेश सरकार के खिलाफ गोलबंद करने में लगे हैं। आपको बता दें कि स्वयं जितिन प्रसाद ने भी ब्राह्मणों का एक संगठन बनाकर योगी सरकार के खिलाफ लगातार मोर्चा खोल रखा था। जितिन अपने संगठन के माध्यम से लगातार ब्राह्मणों पर अत्याचार की खबरों को साझा करते हुए योगी सरकार के खिलाफ राजनीतिक निशाना साधा करते थे। लेकिन अब खुद जितिन प्रसाद भाजपा में शामिल हो गए हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल तो यही खड़ा हो रहा है कि जितिन प्रसाद भाजपा के लिए कितने उपयोगी साबित हो सकते हैं ? क्या जितिन प्रसाद उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को भाजपा के साथ जोड़े रखने में मददगार साबित हो सकते हैं ? क्या वाकई भाजपा को लगता है कि जितिन प्रसाद को लाने से नाराज ब्राह्मणों को मनाया जा सकता है ? या जितिन प्रसाद के बहाने भाजपा सिर्फ एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रही है ? लेकिन अगर वाकई ऐसा है तो फिर सवाल यह उठता है किसे ? क्या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कोई संदेश दिया जा रहा है लेकिन अगर भाजपा आलाकमान को ऐसा कोई संदेश देना होता तो उनके पास गोरखपुर में पहले से ही योगी के विरोधी शिवप्रताप शुक्ला मौजद हैं।

दरअसल, जितिन प्रसाद भाजपा के लिए तभी फायदेमंद सिद्ध हो सकते हैं जब वो प्रदेश के लोगों को यह भरोसा दिला पाए कि वो वाकई एक ब्राह्मण नेता हैं। यह लाइन आपको चौंकाएगी जरूर लेकिन सच यही है कि 2004 में पहली बार सांसद बनने के समय से लेकर मनमोहन सरकार में मंत्री बने रहने तक कभी भी जितिन प्रसाद ने अपने ब्राह्मण होने के कार्ड को खुलकर नहीं खेला था। उनके शाहजहांपुर और धौरहरा लोकसभा क्षेत्र के मतदाता जरूर उन्हें ब्राह्मण जितेन्द्र प्रसाद के बेटे के तौर पर जानते हैं लेकिन उन्हें अपने आपको उत्तर प्रदेश में एक ब्राह्मण चेहरे के तौर पर स्थापित करने के लिए काफी काम करना होगा और जब तक जितिन इस मामले में कामयाबी हासिल नहीं कर लेते हैं तब तक वो भाजपा के लिए वोटों के माध्यम में कोई फायदा पहुंचा पाने की स्थिति में नहीं रहेंगे।

लेकिन जैसा कि जितिन प्रसाद ने स्वयं भाजपा में शामिल होते समय कहा कि भाजपा इस समय देश की एकमात्र संस्थागत पार्टी है तो ऐसे में वो भाजपा के कैडर का लाभ उठाकर निश्चित तौर पर अपने लिए तो लाभ अर्जित कर ही सकते हैं और अगर उन्होंने जमीनी धरातल पर जाकर ब्राह्मणों के लिए काम किया तो अपने आपको एक ब्राह्मण नेता के तौर पर स्थापित भी कर सकते हैं।

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