वह परमपुरुष हमारे निकट से भी निकट है

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प्रार्थना और प्रभु!

हमारे अंदर जो प्रभु विराजमान हैं, उनको हम उर में बोलेंगे तो वे हमारा काम कर देंगे! जो हम चाहते हैं उससे पहले वे हमारा वह कार्य करना करवाना चाहते हैं! उनकी बिना इच्छा के हम इच्छा भी नहीं कर पाते!

प्रार्थना, स्वाध्याय, रीति रिवाजों व अपनी अभी की मान्यताओं से परे वे जहाँ हैं, उनसे एक हो, अपने जागतिक उद्देश्यों, संकल्प- विकल्पों या इच्छाओं को भूल हमें केवल उनके हृदय के आनन्द में उतरना है!

जब तक हम स्वयं के शारीरिक व मानसिक स्तर या अस्तित्व को छोड़ उनके आध्यात्मिक अस्तित्व से एक नहीं होते और उन को आनन्दित , तरंगित व झँकृत नहीं कर पाते; तब तक वे हमारे सारे कार्यों को पूर्ण रूपेण सफल कराने में सहयोग नहीं कर पाते!

बिना उन्हें अपनी सूक्ष्म तरंग लहरी दिए व रिझाए, हम उनकी विराट गंग-तरंग में प्रवेश नहीं कर पाते!

वे तटस्थ हैं, तरन्नुम में हैं, तरज रहे हैं, देख-सुन रहे हैं और सुर-सुरा भी रहे हैं पर हम उनकी आत्मीय तरंग ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं और इसलिए वे भी हमारा कुछ काम नहीं कर पा रहे और ना ही हिय-चाही गुफ़्तगू कर पा रहे!

हम केवल अपनी छोटी-छोटी फ़रियाद या सूची लिए उनके पीछे पड़े हैं और वे हमारा आमूल- चूल परिवर्तन करने की फ़िराक़ में हैं!

हम उनके इशारों, उनकी रचनाओं, उनकी सृष्टि की कलाओं व कथानकों को झाँकना नहीं चाहते!
हम अपनी पीड़ा से परेशान हैं और केवल प्राथमिक उपचार करा भाग जाना चाहते हैं और वे हैं कि हमें भागने देना नहीं चाहते!

हम बाल सरिस अपनी धुन में हैं, उनको न लख रहे हैं, न उनके लिखे को देख रहे हैं और न उनकी वाणी को अपने उर में सुन पा रहे हैं!

हम चाहते हैं कि वे हमें हमारी प्रार्थना अर्चना के अनुसार अभी ये सौग़ात दें और हम भागें! ये बात दूसरी है कि हम कुछ समय उपरांत फिर माँगने आजाएँगे और यह सिलसिला चलता रहेगा। पर कभी-कभी वे यह सिलसिला चलने नहीं देना चाहते और हमारा इच्छित कर्म नहीं करते या करने देते!

हम स्वयं को सिकोड़ें तो उनके हृद में प्रवेश करें! पर हम अपनी शारीरिक व मानस सत्ता की स्थूलता, क्षुद्रत्वता, व हठधर्मिता को नहीं हटा पाते और उनके आत्म स्वरूप को पहचानने व उसमें प्रवेश पाने में सफल नहीं हो पाते!

वे हमारे इन तन-मन के प्रयासों को गौर से देखते रहते हैं और जैसे ही उपयुक्त अध्यात्म भाव लगा वे हमें अपने उर से लगा लेते हैं! हमसे ज़्यादा वे हमें अपने गले से लगाने को आतुर हैं पर हम हैं कि उनके ही दिए अपने खिलौने छोड़, उनकी ओर हम आत्म-भाव से नहीं देखते!

हमारी और उनकी आत्म एक है, एक ही स्रोत है और एक ही तरंग है! शरीर मन का कहा माने, मन आत्म की बात सुने और आत्म जब परमात्म में प्रतिष्ठित होजाए तो सब द्वैत मिटें!

तब प्रार्थना की आवश्यकता न पड़े, साधना रह जाए और ध्यान कर जीव व ब्रह्म एक हो जाएँ!

ब्रह्म भाव आने पर अनन्त कर्म होंगे, हम सब ज्ञान की गहराइयों में डूबेंगे और परस्पर भक्ति व अनुरक्ति बढ़ेगी! तब शरीर तरंगित होंगे, मन आनन्द से भर उठेंगे और जीवात्माएँ ब्रह्मानन्द की अनुभूति करेंगी!

परम पुरुष हर जीव के हृदय में बसते हैं, वे निकट से भी निकट हैं! हम अपने उर में यदि सूक्ष्म सहज सरल हुए झाँकें तो वे हमें हमारी ओर निर्निमेष ताके मिल जाएँगे!

✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’

दि. २२ मई २०२१ मध्य रात्रि
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा

www.GopalBaghelMadhu.com

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