तपोवन में चतुर्वेद पारायण महायज्ञ में स्वामी आशुतोष परिव्राजक जी तथा डॉ महावीर अग्रवाल जी के व्याख्यान

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ओ३म्

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रविवार दिनांक 28-3-2021 को हमें वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून में 7 मार्च 2021 से चल रहे चतुर्वेद पारायण यज्ञ, गायत्री यज्ञ एवं योग साधना शिविर में यज्ञ की पूर्णाहुति के अवसर पर यज्ञ में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यज्ञ स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी द्वारा आयोजित किया गया। वह पूरे समय सभी आयोजनों में उपस्थित रहे। स्वामी जी ऋषि भक्त, यज्ञों में अनन्य निष्ठा रखने वाले याज्ञिक एवं योग एवं उपासना को समर्पित हैं। आपने अपने जीवन में बड़ी संख्या में चतुर्वेद पारायण एवं गायत्री महायज्ञ सहित योग एवं ध्यान शिविर आयोजित कराये हैं। तपोवन आश्रम में भी आप प्रति वर्ष चतुर्वेद पारायण यज्ञ का आयोजन करते हैं। उसी श्रृंखला में इस वर्ष का चतुर्वेद पारायण यज्ञ भी हुआ। आज समाप्त हुए चतुर्वेद पारायण यज्ञ के ब्रह्मा सोनीपत से पधारे आर्यजगत के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य सन्दीप जी थे। यज्ञ में मन्त्रोच्चार गुरुकुल पौंधा के चार ब्रह्मचारियों ने किया। यज्ञ प्रतिदिन प्रातः व सायं दो दो घण्टे किया जाता रहा। यज्ञ सभी 22 दिन पांच यज्ञ-वेदियों में देश के विभिन्न भागों से पधारे यज्ञ के साधकों द्वारा किया गया जिसमें लगभग साठ नियमित याज्ञिकों ने भाग लिया।

 

आज के सत्र में स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती, स्वामी आशुतोष जी, डा. महावीर अग्रवाल भी, आचार्य सन्दीप जी, साध्वी प्रज्ञा जी आदि के सम्बोधन हुए। हम इस लेख में स्वामी आशुतोष जी और डा. महावीर अग्रवाल जी के सम्बोधन प्रस्तुत कर रहे हैं। अन्य विद्वानों के सम्बोधन पहले लेखों में प्रस्तुत कर चुके हैं। स्वामी आशुतोष जी ने अपना व्याख्यान करने से पूर्व सब श्रोताओं को कुछ क्षण ईश्वर का ध्यान कराया। उन्होंने कहा कि परमात्मा हमारे प्राणों के आधार हैं। वह हमारे अनादि माता, पिता, बन्धु, मित्र, न्यायाधीश और उपास्य देव हैं। हमारा परमात्मा से संबंध सनातन है। हमारा परमात्मा से संबंध अनन्त काल तक रहेगा। परमात्मा आनन्द का महासागर है। इस अनुभूति को हम सबको अनुभव करना चाहिये।

स्वामी जी ने ओ३म् आनन्दः का कई बार पाठ किया। वह बोले हे सर्वरक्षक, आनन्द के सागर, आप अपने आनन्द को हमें प्रदान करें। हम आपके आनन्द का भोग करें। हमारे जीवन में पवित्रता, सादगी तथा देश के प्रति अगाध श्रद्धा हो। हम अपने जीवन में परमानन्द का अनुभव कर सकें। स्वामी जी ने कहा कि यह संसार परमात्मा का संसार है। वेदों का ज्ञान तथा ऋषियों का साहित्य हमारे जीवन के आधार हैं। ऋषियों के ग्रन्थों की सहायता से हम वेदों को समझते हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा को जानने के लिए हमें सृष्टि विज्ञान तथा वेद संहिताओं को जानना होता है। स्वामी जी ने बताया कि वेदों का प्रकाशक परमात्मा है। ईश्वर में अनन्त आनन्द भरा है। ईश्वर के समान संस्कृत में भी अनन्त आनन्द है। उन्होंने बताया कि सारा वैदिक वांग्मय संस्कृत में ही है। जिस सत्ता से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व प्रलय होती है वह परमात्मा हमारे जानने के योग्य है।

स्वामी आशुतोष जी ने यज्ञ तथा योग की महत्ता सभी श्रोताओं को बताई। उन्होंने कहा कि परमात्मा विश्व का आधार है। परमात्मा को उन्होंने सभी मनुष्यों का मित्र बताया। उन्होंने कहा कि जो विद्वान सत्यवादी तथा वेदविद् हैं, वह यज्ञ को करते व कर सकते हैं। स्वामी जी ने श्रोताओं को जीवन में धैर्य की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रत्येक अनुकूल व विपरीत परिस्थिति में धैर्य से युक्त रहना चाहिये। इसी के साथ स्वामी आशुतोष जी, रोजड़ ने अपनी वाणी को विराम दिया।

स्वामी आशुतोष जी के पश्चात हरिद्वार से पधारे वैदिक विद्वान डा. महावीर अग्रवाल जी का व्याख्यान हुआ। विद्वान वक्ता ने अपने व्याख्यान के आरम्भ में ऋषि दयानन्द के हरिद्वार के कुम्भ मेले में आने का उल्लेख किया। डा. महावीर जी ने कहा कि ़ऋषि दयानन्द ने स्वयं को मानवता, वेद और भारत माता की सेवा में समर्पित किया था। उन्होंने कहा कि यदि हम सब अपनी आत्माओं को शुद्ध करना चाहते हैं तो हमें परमात्मा रूपी ज्ञान व आनन्दमय नदी में स्नान करना चाहिये। विद्वान वक्ता ने कहा कि हम स्वयं ही अपने बन्धु भी हैं और शत्रु भी। संयम से युक्त जीवन तीर्थ के समान है। डा. महावीर जी ने प्रधानमंत्री मोदी जी की बंगलादेश यात्रा का उल्लेख कर कहा कि वहां उन्होंने मन्दिर में ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कोरोना महामारी के संकट को दूर करने की प्रार्थना की। डा. महावीर जी ने मोदी जी के मानवीय गुणों व सच्चाई से देश हित के साहसपूर्ण कार्य करने की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि मनुष्य को सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। विद्वान वक्ता ने ऋषि के इन वाक्यों व आर्यसमाज के नियम पर प्रकाश डाला। उन्होंने आगे कहा कि ऋषि दयानन्द कभी अपने सत्य पथ से विचलित नहीं हुए। आचार्य महावीर जी ने सत्याचरण व वेदानुकूल आचरण को सबसे बड़ा धर्म बताया। अपने व्याख्यान में विद्वान वक्ता ने ऋषि दयानन्द की अनेक बातें बताईं। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द ने अपने विषदाता को अभय प्रदान किया था।

डा. महावीर जी ने कहा कि हमें वेद के बताये मार्ग पर चलना चाहिये। हमें वेदमार्ग का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिये। अपने विचारों को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि हमें आत्मारूपी नदी में ईश्वर चिन्तन व सत्याचरण करके स्नान करना चाहिये।

तपोवन के इस चतुर्वेद पारायण यज्ञ में गायत्री मन्त्र से 1 लाख 25 हजार से अधिक आहुतियां भी दी गईं। शिविर में भाग लेने वाले बन्धुओं को स्वाध्याय सहित योग एवं ध्यान का अभ्यास भी कराया गया। समापन दिवस 28 मार्च, 2021 को 95 वर्षीय माता सुनन्दा जी तथा साध्वी प्रज्ञा जी का सम्मान हुआ। माता सुनन्दा जी ने 10 वर्ष का मौनव्रत किया है। उन्होंने 4 वर्ष का अदर्शन व्रत भी किया है। साध्वी प्रज्ञा जी ने तीन बार तीन तीन वर्ष के मौनव्रत तथा अदर्शन व्रत का पालन किया है। साध्वी प्रज्ञा जी एक उच्च कोटि की कवित्री भी हैं। समापन दिवस उनकी दो पुस्तकें ‘ब्रह्मयज्ञ’ तथा ‘अन्तःस्थल से प्रस्फुटित काव्यधारा’ वितरित की गईं। साध्वी प्रज्ञा जी ने पूर्णाहुति के बाद अपनी साधना के अनुभव भी श्रोता बन्धुओं को सुनाये। हम इसे भी एक अन्य लेख के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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