गण और गणनायक दोनों स्वीकारें

मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखाएँ

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

तंत्र का सुव्यवस्थित और दीर्घकालीन संचालन और स्थायित्व बनाए रखने के लिए उससे जुड़े हुए प्रत्येक अंग-उपांग को स्वस्थ और काबिल बनाए रखना पहली शर्त और प्राथमिक अनिवार्यता है।  जड़ और जीवन दोनों के लिए अपनी कुछ मर्यादाएं हैं जिनका अनुपालन करने पर ही उनका मौलिक गुण-धर्म शाश्वत बना रहता है। इनमें जरा सी सी खोट या मिलावट आ जाने पर इनका गुण धर्म तो खत्म होता ही है, इनके अस्तित्व पर भी संकट छाने लगता है।

दुनिया की हर वस्तु और जीवात्मा अणु-परमाणु और कोशिकाओं के सिद्धान्त पर टिकी हुई है। इन्हीं के परिष्कृत भावों के रूप में इलैक्ट्रॉन,प्रोटॉन और न्यूट्रान जैसे तत्व हैं जिनकी क्रियात्मकता और प्रभावशीलता का कोई पार नहीं है। रूपान्तरण से लेकर बहुआयामी प्रभावोत्पादकता एवं महानतम परिवर्तन की भावभूमि रचने में इन तात्ति्वक रहस्यों का कहीं कोई मुकाबला नहीं।

हर तंत्र का संबंध गण और परिवेश से होता है। आज हम यहाँ भारतीय गणतंत्र की चर्चा कर रहे हैं जिसे दुनिया का महानतम गणतंत्र कहलाने का गौरव प्राप्त है। हम सभी लोगों का सौभाग्य है कि हम गणतंत्र का वह हिस्सा हैं जो वर्तमान कहा जाता है, जिसके कँधों पर वर्तमान है और भविष्य भी इन्हीं कँधों से होकर जमीं पर उतरकर आकार लेने को उतावला है।

गणतंत्र शब्द की व्यापकता को देखा जाए तो इसके प्रत्येक अंग, क्रिया और प्रतिक्रिया सभी में गण प्रधान है और गण को प्रधानता दी जाकर जो भी कर्म किया जाए, जो सँरचना की जाए, जो योजनाएं और कार्यक्रम बनाए जाएं तथा जो कुछ किया जाए, वह गणतंत्र का अहम हिस्सा ही है।

गण, तंत्र और गणनायक परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं। गण के बिना न सुगठित तंत्र की कोई कल्पना की जा सकती है और न ही गणनायक का अस्तित्व पैदा किया जा सकता है।   जो कुछ है उसकी मुख्य धुरी केवल और केवल गण ही है। गण-गण से बनकर गण तंत्र बना हुआ है।  जिस क्रिया या भाव में गण को प्रमुखता दी जाती है वही वास्तविक गणतंत्र है।

जहाँ तंत्र अपनी इच्छा से चाहे जो कुछ पका कर गण के सामने  सलीके से परोसता रहे, उसे गणतंत्र की संज्ञा कभी नहीं दी जा सकती। गणतंत्र का मूल ध्येय भी यही रहा है कि गण को सामने रखकर तंत्र का संचालन किया जाए। यों भी जिस तंत्र में गण की प्रधानता नहीं होती, गण की भागीदारी नहीं होती, वहाँ अच्छे-अच्छे गणनायक गण हीन   और गुण-हीन, रंगहीन और रस हीन होकर रह जाते हैं और उन्हें एक न एक दिन हमेशा के लिए हाशिये पर आना ही पड़ता है।

आज गणतंत्र को लेकर कहीं-कहीं जो अन्यमनस्क भाव और उदासीनता देखी जा रही है उसका मूल कारण यह है कि गण और गणनायक दोनों में कहीं न कहीं कुछ ऎसा जरूर है जो सभी को खल रहा है। गण और गणनायक दोनों का फर्ज है कि अपनी-अपनी सीमा रेखाओं में रहें, एक-दूसरे का आदर-सम्मान बनाए रखे,  कोई एक-दूसरे का व्यतिक्रम न करे, दोनों पक्षों के लिए निर्धारित लक्ष्मण रेखाएं बनी रहें, कोई लांघने का दुस्साहस न करें तथा गण और गणनायकों में ऎसी कोई दूरी पैदा न होने पाए कि एक-दूसरे को किसी भी अंश में यह लगे कि पारस्परिक सामंजस्य,श्रद्धा और आदर-सम्मान का भाव कहीं क्षरित हो रहा है।

दोनों ही पक्षों का एक-दूसरे में अगाध विश्वास हो, सामूहिक विकास की सोच हो तथा गण, समुदाय एवं देश के कल्याण का एकमेव परम लक्ष्य सामने हो। आज जो परिस्थितियां कभी-कभार दिखाई देने लगती हैं वह गणतंत्र के भविष्य की दिशा में सोचने को बाध्य करने लगी हैं।

गण की श्रद्धा उन्हीं गणनायकों पर होती है जो गण की चिंता करते हैं और गण की तरह सादगी, सरलता और सहजता से पेश आते हैं। जहां किसी भी स्तर पर आम गण को लगता है कि उनके गणनायक उनसे अलग दिशा में जा रहे हैं, जी रहे हैं,  गण की सोच बदल जाती है और फिर दूरियों का बढ़ना स्वाभाविक ही माना जा सकता है।

गण को जब कभी लगता है कि गणनायक का ध्यान उनकी ओर से हटकर किन्हीं दूसरी दिशाओं में भटकने, उछलकूद करने और मचलने लगा है, तब गण के मन को समझ पाना किसी के बस में नहीं होता, फिर तो कुछ नया ही नया होने और दिखने लगता है हर तरफ।

बात गणनायकों के उन्मुक्त और स्वच्छन्द हो जाने वाले व्यवहार तक ही सीमित नहीं है ब ल्कि गण को भी उन आदर्शो, मान्यताओं और परंपराओं को मानना चाहिए जिनके लिए गणतंत्र की स्थापना हुई और यह खुला आसमान नसीब हुआ है।   गण को भी समझनें होंगे अपने कत्र्तव्य,अपने लिए, समाज के लिए और देश के लिए।

गणनायकों को अपना चरित्र और व्यवहार समझने के लिए एक बार गणाधीश भगवान श्रीगणेश के जीवन चरित्र और उनकी विशेषताओं को आत्मसात करने का प्रयास करना होगा, अपने आप ज्ञान का संचार होने के तमाम चमत्कार इसी में छिपे हुए हैं।

गण जब गुणवान होगा, तो गणनायक भी गुणनायक होंगे और अपना वह समूचा तंत्र भी शुचिता के साथ विकास का उद्घोष करता रहेगा जिसके लिए गणतंत्र शब्द को आक्षितिज पसरा हुआ कैनवास मिला है।  आइये गणतंत्र के इस महान पर्व पर हम सभी  अपनी-अपनी मर्यादाओं में रहते हुए समाज और देश के नवनिर्माण के लिए प्राण-प्रण से जुटने का संकल्प लें।

सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ …..।

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