धरती स्वर्ग बन जाए

यदि परस्पर मैत्री भाव आ जाए

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

महिलाओें के विकास और उत्थान के लिए हर तरफ बहुत कुछ हो रहा है, जानें कितनी योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं का संचालन हो रहा है, कितने ही विभाग मिलकर काम कर रहे हैं, अलग से आयोग भी हैं।

देश और दुनिया में महिलाओं के सशक्तिकरण का माहौल है। इन सबके बावजूद आज महिला दिवस मनाने और महिलाओं के उत्थान के लिए हमें संकल्प लेने और समर्पित कार्य करने की हर साल आवश्यकता पड़ती है।

जिस स्त्री को वेदों और पुराणों से लेकर भारतीय जीवन पद्धति में शक्ति के रूप में स्वीकारा गया है और कहा गया है कि इस शक्ति के बिना शिव भी शव ही हैं। शक्ति के बगैर न कोई हिल-डुल सकता है, न जीवन की कल्पना कर सकता है।

इस स्त्री तत्व को शक्ति के रूप में हर काल में पूरी श्रद्धा के साथ स्वीकारा गया है। यहाँ तकjannat_310 कि स्त्री परिवार और समाज, परिवेश आदि सभी स्थानों पर अहम निर्णायक और संचालक की इतनी प्रभावशाली भूमिका में रही है कि पुरुष के नाम से पहले उसका नाम जोड़ा जाता रहा है।

फिर अचानक  ऎसा कौनसा पहाड़ टूट पड़ा कि स्त्री को दुर्बल और अबला माना जाने लगा जबकि शक्ति का कोई मुकाबला नहीं। स्त्री को जहाँ शक्ति माना जाता रहा है वहाँ न तो महिला दिवस मनाने की जरूरत पड़नी चाहिए थी और न ही उसके लिए कुछ करने की।

भारतीय संस्कृति में स्त्री को सर्वाधिक सशक्त और निर्णायक माना गया है। पाश्चात्य प्रभावों और सदियों तक विदेशियों की परम गुलामी के दौर से गुजरते हुए  हमने स्त्री की महिमा और सामथ्र्य को भुला दिया और विदेशी संस्कृति का बिना सोचे-समझे अंधानुकरण कर लिया है।

विदेशों में जहाँ स्त्री को वस्तु और भोग्या माना जाता है, उन लोगों के लिए महिला दिवस मनाया जाना औचित्यपूर्ण हो सकता है लेकिन भारत में इस दिन को नारी महिमा पुनर्जागणरण दिवस के मनाया जाना ज्यादा उपयुक्त हो सकता है।

महिलाओं की मौजूदा स्थिति के लिए विदेशी दासत्व और पाश्चात्य अप संस्कृति को ही सर्वाधिक जिम्मेदार माना जा सकता है जिनकी वजह से पौरुषी मानसिकता के बीजों का इतनी तेजी से अंकुरण हुआ और स्त्री को पुरुषों के बाद में रखा जाने लगा।

आज महिला अत्याचार, अन्याय और शोषण की जो घटनाएं हमारे सामने हो रही हैं उनका मूल कारण यही है कि हमने स्त्री के हमसे अधिक प्रतिष्ठित वजूद को स्वीकार करने की पुरातन परंपराओं, पौराणिक और ऎतिहासिक गाथाओं तथा संस्कृति के तमाम मूल्योें को भुला दिया है।

शक्ति के महत्व और सामथ्र्य को अंगीकार व आत्मसात करने की बजाय हमने स्त्री के प्रति हीनता दिखाने का दुस्साहस आरंभ कर दिया है। बहरहाल जो कुछ अब तक हो गया , वो हो गया। लेकिन अब नारी के महत्त्व को जानने के लिए और नारी को उसके वास्तविक स्वरूप एवं सामथ्र्य से परिचित कराने के लिए यह जरूरी है कि नारी के शक्ति तत्व को जानने का प्रयास करें और इस दिशा में इतनी गंभीरता बरतें कि नारी को सिर्फ भोग्या न मानें बल्कि सर्जक, संरक्षक और उत्पे्ररक के रूप में स्वीकारें।

इसके साथ ही नारी के विकास में आ रही तमाम प्रकार की बाधाओं के लिए पुरुषों से कहीं अधिक जिम्मेदार महिलाओं को माना जाना चाहिए जो कि एक-दूसरे के वजूद को स्वीकारने, आदर-सम्मान देने, सदभावना रखने और पारस्परिक साहचर्य एवं सामूहिक विकास की भावना से साथ-साथ रहने और कार्यसंपादन करने तक को स्वीकार नहीं कर पाती।

इस मामले में कुछ महिलाएं अपवाद हो सकती हैं जो उदारता के साथ पारस्परिक मैत्री और आत्मीयता को अंगीकार कर लिया करती हैं और कौटुम्बिक माधुर्य को आकार देते हुए आत्मीयता के साथ पाारस्परिक विकास का प्रेरक इतिहास रचती है। मगर आमतौर पर ऎसा नहीं देखा जाता।

स्वयं महिलाएं भी तहेदिल से यह स्वीकार करती हैं कि स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी दुश्मन होती है। तभी तो एक ही घर-परिवार में रहने वाली बहू, सास, बहन, माँ और सभी प्रकार के रिश्तों में कुछ न कुछ ऎसा होता ही रहता है जिसे कलह या अस्वीकार्यता की श्रेणी में रखा जा सकता है।

इस मामले में अनपढ़ से लेकर अभिजात्य वर्ग की सभी प्रकार की उच्च शिक्षित, गृहिणियों और कामकाजी महिलाओें तक में समानता है। कुछ अपवादों को छोड़कर ये एक-दूसरे के वजूद को स्वीकार करने से लेकर परस्पर आदर-सम्मान और मैत्री भाव देने तक में भी संकोच करती हैं।

एक स्त्री यदि दूसरी स्त्री के प्रति आत्मीय सद्भावना रखे, आदर दे और एक-दूसरे के लिए काम आने की भावना से रहे, तो दुनिया भर से स्ति्रयों की तमाम समस्याओं, पीड़ाओं, अभावों और दुःखों का एक झटके में ही खात्मा हो जाए।

इस मामले में खुद महिलाओं को आत्मीयता के साथ आगे आना होगा और पूरी उदारता के साथ परस्पर मैत्री एवं सद्भावना के भाव जगाने होंगे। अगर किसी वजह से या किसी की प्रेरणा से भी ऎसा होना शुरू हो जाए तो यह दुनिया अपने आप स्वर्ग बनने लग जाएगी और फिर हमें यह आवश्यकता ही नहीं होगी कि हम हर साल महिला दिवस मनाएं और महिलाआें के कल्याण की बातें करते रहें।

आज मातृशक्ति को मातृशक्ति के लिए ही आराधना करने का दिवस है। सभी को महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ….।

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