मनुष्य का आत्मा ही ईश्वर प्राप्ति और प्रार्थनाओं की पूर्ति का धाम है

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ओ३म्

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मनुष्य की अपनी अपनी आवश्यकतायें एवं इच्छायें हुआ करती हैं। वह उनकी पूर्ति के लिये प्रयत्न भी करते हैं। मनुष्य जिस सामाजिक वातावरण में रहता है वहां उसे अपने बड़ों से जो शिक्षा मिलती है उसमें उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति हो जाती है। वह बिना छानबीन व विवेक से उन्हें स्वीकार कर लेता है। उसके पास अपना निजी ज्ञान व बुद्धि इतनी नहीं होती कि वह उनकी सत्यता को जान व समझ सके। मध्यकाल में लोगों ने अनेक स्थानों पर ईश्वर के धाम कल्पित किये व बनाये। देश की जनसंख्या का अधिकांश भाग अपने अपने मत व विश्वासों के अनुसार उन पर विश्वास रखता है। समय समय पर नाना प्रकार से वह उन स्थानों की यात्रायें कर वहां जाते हैं और अपने शुद्ध मन से अपनी सभी आवश्यकताओं व इच्छाओं सहित सुख एवं ऐश्वर्य की कामना करते हैं। ऐसा करते हुए विवेक बुद्धि वाले मनुष्यों को लगता है कि ईश्वर के विषय में इन श्रद्धालु बन्धुओं को यह भी ज्ञान नहीं है कि ईश्वर एकदेशी सत्ता नहीं अपतिु वह तो सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दस्वरूप, दयालु, अनादि व नित्य है। उसने मनुष्य व इतर प्राणियों की जीवात्माओं के लिये ही इस समस्त जगत वा सृष्टि को बनाया है। इसका पालन व प्रलय करना भी उसी एक ईश्वर की सामर्थ्य व शक्ति में है। हमारे पास अपना शरीर व मकान, कार, धन आदि जो जो पदार्थ हैं, उन सब का स्वामी व दाता भी वही एक परमेश्वर है।

परमेश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक तथा सर्वान्तर्यामी सत्ता है। वह हमारी जीवात्मा के भीतर व बाहर सर्वत्र जगत व उससे भी दूर दूर तक विद्यमान है। जीव का ईश्वर से सम्बन्ध 24×7 अर्थात् हर क्षण व हर पल रहता है। मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति, उससे प्रार्थना करने व मांगने सहित उसे प्रसन्न करने के लिए अपने निवास से इतर किसी अन्य स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं है। वह तो हमारे मन की सभी बातों का जिनका हम क्षणिक विचार भी करते हैं, उन्हें पूर्णरूपेण तत्काल जान लेता है और उनका हमें फल भी प्रदान करता है।

ईश्वर हमारी सभी कामनाओं को हमारे ज्ञान, पुरुषार्थ व उसके लिये की गई सत्क्रियाओं के अनुरूप पूरी भी करते हैं। अतः ईश्वर प्राप्ति के लिये किसी अन्य स्थान व धाम आदि पर जाने की आवश्यकता वेद आदि सत्य शास्त्रों, ज्ञान व तर्क बुद्धि से सत्य सिद्ध नहीं होती। परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि सत्य व असत्य, उचित व अनुचित तथा करणीय व अकरणीय कार्यों के ज्ञान के लिये ही दी है। इस बुद्धि का प्रयोग न करना और सत्य व मिथ्या परम्पराओं को बिना विचार किये स्वीकार कर लेना मनुष्यपन अर्थात् मननशीलता नहीं है। वैदिक नियम भी है कि मनुष्य को प्रत्येक कार्य सत्य व असत्य का विचार कर ही करने चाहिये। यदि हम सब ऐसा करेंगे तभी कृतकार्य व सफल मनोरथ हो सकते हैं। वैदिक साहित्य का अध्ययन व तदनुरूप आचरण के द्वारा ही मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ व इष्ट पदार्थों धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त इष्ट व मनोरथ सिद्ध करने का अन्य कोई मार्ग नहीं है। यदि हम अनुचित तरीके से किसी पदार्थ को प्राप्त करने की इच्छा करेंगे वा वेद विरुद्ध आचरण करेंगे तो इसका दण्ड व दुःख हमें ईश्वर की व्यवस्था से अवश्य ही मिलेगा। हमें इस विषय में गम्भीरता से विचार कर अपने जीवन की दिनचर्या बनानी चाहिये जिसमें स्वाध्याय एवं ईश्वर के मनन आदि के लिए पर्याप्त समय होना चाहिये। ओ३म् तथा गायत्री मन्त्र के अर्थज्ञान पूर्वक जप से मन व आत्मा की शुद्धि होकर उन्नति को प्राप्त होती है। यह तर्क सिद्ध बात व मान्यता है। हम विश्वास रखते हुए प्रातः सायं अथवा खाली समय में जप व भक्ति आदि कार्यों को करेंगे तो हमें जीवन व परजन्म में भी इसका लाभ होगा। अतः हमें वेद, उपनषिद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों सहित ऋषि दयानन्द एवं आर्य विद्वानों के वेदभाष्यों का स्वाध्याय व अध्ययन नित्य प्रति श्रद्धा के साथ करना चाहिये। इसी से हमारी आत्मा की उन्नति होगी, हमें पुरुषार्थ की प्रेरणा प्राप्त होंगी और हम अपने जीवन में सभी आवश्यक वस्तुओं व पदार्थों सहित धन ऐश्वर्य से सम्पन्न हो सकते हैं।

प्राचीन काल में हमारे ऋषि, मुनि, वानप्रस्थी, संन्यासी, विद्वान व वैज्ञानिक आदि गुरुकुलों व आश्रमों आदि में रहा करते थे। वहां जाकर हम उनका सम्मान करते थे और अपने योग्य सदुपदेश ग्रहण करते थे। हमारी धर्म व उपासना संबंधी जो शंकायें व समस्यायें होती थी उनका निराकरण भी उन विद्वानों से हो जाता था। ये विद्वान भी समाज में गृहस्थियों के यहां यदा कदा आते जाते रहते थे और अपने सदुपदेशों से उनको लाभान्वित करते रहते थे। इससे मनुष्यों को अपनी किसी मन्नत को पूरी करने के लिये किसी स्थान विशेष पर जाकर कुछ मांगना व कहना नहीं पड़ता था। विद्वान बता देते थे कि कुछ भी प्राप्त करना है उसके लिये ज्ञान से युक्त तदनुकूल कर्म व पुरुषार्थ करना होगा। ईश्वर को हृदय व आत्मा में धारण करना होगा। सत्कर्मों में प्रेरणा व कार्यों में सफलता की कामना अपने निवास पर ही ईश्वर से प्रार्थना करते हुए करनी होगी। ऐसा करके उचित समय बाद हमारी सभी कामनायें पूरी हो सकती है। सभी मनुष्यों को जो स्वयं को धर्मपारायण वा धार्मिक कहते हैं उनको पांच यम व पांच नियमों का ज्ञान होना चाहिये। पांच यम अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह हैं। पांच नियम शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान हैं। इन यम नियमों में प्रयुक्त शब्दों के सत्य अर्थ व इनके पालन का तरीका हमें आना चाहिये। सन्तोष रखने वाले मनुष्यों की आवश्यकतायें अति न्यून होती हैं। ऐसा करके ही हम स्वस्थ एवं प्रसन्न रह सकते हैं। अधिक मात्रा में धन हो जाने, सुख के साधन हो जाने तथा नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन करने से हम सुखी नहीं होते अपितु इनका भोग करने से परिणाम में अस्वस्थता आदि दुःख होते हैं और सुख-सुविधायें मनुष्य के जीवन को धर्मपरायण व तपस्वी रखने में भी बाधक होती हैं। अतः मनुष्य को अस्तेय एवं अपरिग्रह पर ध्यान देना चाहिये और भौतिक सम्पत्ति के साथ आध्यात्मिक सम्पत्ति यथा सद्गुणों व ईश्वर के ज्ञान व उपासना से आत्मा की उन्नति पर अपने मन को लगाना चाहिये। इसी में सभी मनुष्यों का कल्याण है।

वेदों में मनुष्य के लिये पंचमहायज्ञों वा पांच पूजाओं का विधान है। यह कार्य मनुष्य जीवन के सुख व आत्मा की उन्नति के लिये ही किये जाते हैं। इनसे स्वस्थ जीवन व भौतिक उन्नति सहित आत्मा की उन्नति का लाभ भी प्राप्त होता है। प्रथम महायज्ञ व पूजा ईश्वर की उपासना है जिसे सन्ध्या व सम्यक् ध्यान करना कहा जाता है। यह प्रातः व सायं समय में रात्रि व दिन तथा दिन व रात्रि की सन्धि वेलाओं में किया जाता है। सन्ध्या का समय दोनों समय न्यून एक घंटा होने पर अधिक लाभ प्राप्त होते हैं। वैदिक धर्म में इसके अनुयायियों को प्रतिदिन प्रातः व सायं देवयज्ञ अग्निहोत्र करने का भी विधान है। इससे वायु शुद्धि, आत्म शुद्धि, आरोग्य तथा कामनाओं की सिद्धि होती है। देवयज्ञ अग्निहोत्र कर हम अनेक पापों से मुक्त भी होते हैं। यदि हम अग्निहोत्र नहीं करते व करेंगे तो हमें उन पापों का दुःख भोगना पड़ सकता है जो अनायास हमारे जीवन व्यतीत करने से वायु व जल विकार, इतर प्राणियों को अनचाहें होने वाली पीड़ा आदि के द्वारा होता है। जिन कामनाओं की पूर्ति के लिये हम अनेक धामों की यात्रायें करते व कष्ट सहन करते हैं वह तो ईश्वर की उपासना व देवयज्ञ अग्निहोत्र करने से घर बैठे ही पूरी हो जाती हैं। हमारे आजकल के धार्मिक स्थल व धाम विगत 2500 वर्षों के भीतर ही अस्तित्व में आये हैं। इससे पूर्व के लगभग दो अरब वर्षों में इन धार्मिक स्थानों व धामों की अनुपस्थिति में भी लोग धर्म कर्म करते थे। उन्हीं दिनों हमारे देश में ऋषि, मुनि, योगी, राम, कृष्ण, भीष्म पितामह, हनुमान, भीम आदि जैसे पुरुषश्रेष्ठ हुआ करते थे। अतः हमें स्वाध्याय तथा पंच महायज्ञों पर विशेष ध्यान देना चाहिये। वेद, शास्त्रों तथा ऋषियों की आज्ञा को देखना व पालन करना चाहिये। ऐसा करके ही हमारे समस्त मनोरथ पूर्ण होंगे। हमारा यह जन्म व परजन्म अर्थात् लोक व परलोक सुधरेगा। ईश्वर का परमधाम, जो हमारी आत्मा में निहित है, वहां उस ईश्वर का दर्शन व साक्षात्कार होगा तथा हमारी आत्मा दुःखों से मुक्त होकर मोक्षगामी होगी। इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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