वेद का पुरुष सूक्त और उसका विषय

ved-rishi

———-आचार्य करणसिह नोएडा ——- “पुरुषसूक्त और पुरुष सूक्त का विषय” ऋग्वेद के मंत्र 10 मंडलों में निबद्ध है। प्रत्येक मंडल में कई सूक्तहै, और प्रत्येक सूक्त में कई मंत्र।अंतिम(दसवें) मंडल की सूक्त संख्या 90 पुरुषसूक्त के नाम से प्रसिद्ध है। इसका देवता व विषय ‘पुरुष’ है।——————— पुरुष का अर्थ पुरी में निवास करने वाला अगणित नगर पुर वा पुरी कहलाते हैं, और उन में रहने वाले उनके नागरिक होते हैं। ऐसी किसी एक पूरी व उस में निवास करने वालों का वर्णन ‘पुरुष सूक्त’ में नहीं।एक और पूरी है, जिसके अंतर्गत यह छोटी-छोटीअसंख्य पुरिया आ जाती है। यह पुरी विश्व ब्रह्मांड है।इस में निवास करने वाले यो तो सारे प्राणी और अप्राणी सूर्य से लेकर अणु तक हैं, परंतु तत्वदर्शी यों के लिए उस में निवास करने वाला ब्रह्म है।इसका नाम ब्रह्मांड ही इसका प्रतीक है। इस महान पुरी के अतिरिक्त एक और पूरी भी है। उसमें मनुष्यों को विशेष दिलचस्पी है।वह मानव शरीर है। ब्रह्मांड के इस नन्हे से टुकड़े के साथ हमारा विशेष संबंध है। जीवात्मा इस पुरी में निवास करता है, और वह भी ‘पुरुष’ कहलाता है।-

—————– दोनों पुरुषों और दोनों पुरियों में गहरा संबंध है।दोनों पुरुषों का संबंध समझना दर्शनशास्त्र का मुख्य प्रयोजन है। जीवात्मा को परमात्मा के निकट लाना, उसके साथ मिला देना धर्म का तत्व है। मानव शरीर रूपी छोटी पुरी और बड़ी पुरी ब्रह्मांड में भी समानता दिख पड़ती है।एक आम कहावत है–जो पिंडे सो ब्रह्माण्डे। पश्चिम के दार्शनिकों ने भी कहा है कि हमारा शरीर एक छोटा सा ब्रह्मांड है। वह बड़े ब्रह्मांड को मैक्रोकॉस्म और छोटे ब्रह्मांड (शरीर) को माइक्रोकॉस्म का नाम देते हैं,और कहते हैं कि शरीर बहुत छोटे परिमाण में ब्रह्मांड का नमूना ही है।——————— शरीर को समझने के लिए दो बातें देखी जाती है। एक यह कि उसकी बनावट कैसी है? उसके प्रमुख अंग क्या है? दूसरी यह कि शरीर और उसके अंग करते क्या है? फिर हम देखना चाहते हैं, कि शरीर और ब्रह्मांड में इन दोनों बातों में क्या समानता है? भौतिक जगत में हमारा शरीर हमारे लिए विशेष महत्व और दिलचस्पी की चीज है। प्रकृति के इस नन्हे से टुकड़े को हम विश्व के अन्य पदार्थों से कैसे अलग करते हैं? मैं कैसे जानता हूं कि मेरी आंखें मेरे शरीर का भाग है, और मेरी ऐनक इसका भाग नहीं है। यह भेद तीन अनुभवों पर निर्भर है—– १- प्रथम तो यह कि रात को सोते समय ऐनक उतारकर मेज पर रख दी थी। अभी फिर स्नान करने जाऊंगा, तो उतार कर रख दूंगा। दोनों स्थानों में आंखों के संबंध में यह नहीं कर सकता जहां जाता हूं, आंखें साथ जाती हैं। प्रकृति का जो भाग, जुड़ा हुआ, इस तरह सदा मेरे साथ रहता है। मुझसे जुदा नहीं हो सकता, वह मेरा शरीर है, जो ऐसा संगीसाथी नहीं है, वह अन्य पदार्थ है ।———— २- मुझे भूख प्यास लगती है,इससे बेचैनी होती है। भूख प्यास का कारण यह होता है कि शरीर के अंश प्रतिक्षण टूटते रहते हैं, और उनकी त्रुटि पूरा करने व उनके स्थान में नया बनाने के लिए अन्न की आवश्यकता होती है।पानी से हमारे शरीर का बड़ा भाग बनता है, यह भी लगातार बाहर निकलता रहता है, और यह कमी पूरी करनी होती है। भूख प्यास न मिटे तो मुझे पीड़ा होती है। ऐसा ही अन्य मनुष्यों की अवस्था में होता है। परंतु मैं देखता हूं कि मेरी पीड़ा विशेष रूप से उन घटनाओं के साथ बंधी होती है। जो प्रकृति के एक खास टुकड़े के अंदर होती है, और यह टुकड़ा वही है। जो मेरे सदा मेरे साथ रहता है। प्रकृति के जिस टुकड़े के साथ मेरा सुख-दुख विशेष रूप से बंधा है,वह मेरा शरीर है।—————-‐–‐—-‐——– ३– जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसका प्रमुख साधन हमारी ज्ञानेंद्रिया हैं। इनमें त्वचा का स्थान विशेष महत्व का है। हमारा देखना और सुनना हमारी इच्छा पर निर्भर है।आंखें और कान बंद कर ले तो देखना सुनना भी बंद हो जाता है। यही अवस्था रस और गंध के अनुभव की है।त्वचा का प्रयोग हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं। बाहर के पदार्थों से हमारा संपर्क बना ही रहता है। जागृत अवस्था में स्पर्श का अनुभव थोड़ा बहुत रहता ही है। स्पर्श के दो रूप होते हैं– कभी मैं किसी वस्तु को छूता हूं? कभी कोई अन्य वस्तु मुझे छूती है? इन दोनों में भेद होता है, और इस भेद को प्रकट करने के लिए हम कहते हैं कि स्पर्श के लिए क्रियानिष्ठा क्रिया शून्य होता है। आश्चर्य की बात है कि जहां शेष सारे पदार्थों की हालत में हमें एक काल में एक प्रकार का स्पर्श ही हो सकता है। हमारे शरीर की अवस्था में यह दोनों स्पर्श एक साथ अनुभूत हो सकते हैं। जब मेरा हाथ मेरे मुख को छूता है तो एक साथ ही मुझे क्रियानिष्ठा और कियाशून्य स्पर्श का अनुभव होता है।——————————– वैज्ञानिक दृष्टि से यह सबसे अधिक निर्णय करने वाला चिन्ह है। जो हमें हमारे शरीर की सीमा का बोध देता है। प्रकृति के जितने भाग में मुझे दोहरा स्पर्श देने की शक्ति है, वह मेरा शरीर है। जिस भाग में यह सामर्थ्य नहीं वह मेरा शरीर नहीं।——————– मैं अपने शरीर का की बाबत कहता हूं। यह कथन काअर्थहीयह है कि मै शरीर से पृथक हूं।मैं क्या हूं। मेरा संबंध शरीर से और अन्य मनुष्यों से क्या है?जीवात्मा के संबंध में भी हम हमें इसके स्वरूप और इसकी क्रियाओं की बाबत पूछना होता है। इसके अतिरिक्त एक और बात भी विचारने योग्य है। प्रकृति और पशु पक्षी नियम में बंधे अपना कार्य करते हैं।उनके लिए एक ही मार्ग खुला होता है। जिस पर उन्हें चलना होता है। मनुष्य अपने कार्य में स्वतंत्र है। उसके सामने एक से अधिक मार्ग खुले होते हैं,और उनमें से किसी एक को चुनना उसके लिए संभव होता है। यह चुनाव कैसे करता है? यह मनोविज्ञान का विषय है। यह चुनाव कैसे करना चाहिए? यह आचार शास्त्र का विषय है।मनुष्य की अवस्था में ही कर्तव्य का प्रश्न उठता है। एक लेखक ने कहा है कि कर्तव्य कर्म अति कठिनाई के विपरीत चलना है। पशु पक्षियों के लिए संभव नहीं, क्योंकि वह ऐसा मुकाबला करने की सामर्थ्य ही नहीं रखते। देवताओं के लिए, यदि वे हैं ,ऐसे मुकाबले का अवसर ही नहीं होता, क्योंकि उनमें तो कोई बुराई है ही नहीं, जिस पर उन्हें विजय प्राप्त करनी है।

Comment:

Latest Posts

kolaybet giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
jojobet güncel
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
jojobet
jojobet
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet giriş
favorisen
betpark giriş
hitbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpas giriş
bettilt giriş
hitbet giriş
hitbet
interbahis giriş
hitbet giriş
betpark
hititbet
hititbet
betpark
betpark