मोदी किस मर्ज की दवा हैं ?

वीरेन्द्र सिंह परिहार

आखिर में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने संसदीय बोर्ड की सहमति से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर ही दिया। राजनाथ सिंह ने गोवा में चल रही कार्यकारिणी में जब नेरन्द्र मोदी को भाजपा की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। तभी यह तय हो गया था कि लोकसभा चुनाव के पूर्व किसी भी समय नरेन्द्र मोदी को भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जायेगा, भले ही भाजपा के सर्वोच्च नेता लालकृष्ण आडवाणी और लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज इस निर्णय के पक्ष में न खड़े हों। यधपि इन नेताओं का तर्क था कि मोदी के उम्मीदवारी की घोषणा चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के पश्चात होनी चाहिए। इसकी वजह वो यह बताते थे कि विधानसभा चुनावों के पूर्व नरेन्द्र मोदी की उम्मीदवारी घोषित होने से भाजपा को मुस्लिम मत नहीं मिलेंगे। अब सोचने का विषय यह है कि यदि विधानसभा चुनावों में जहां मुख्यमंत्री किसी और को बनना है, तो मुस्लिम मत न मिलते तो फिर लोकसभा चुनावों में जहां नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनना है, वहां मुस्लिम मत कैसे मिलते ? भाजपा को वैसे भी कितने मुस्लिम मत मिलते रहे हैं और आगे भी कितने मिलेंगे, यह बात तो अपनी जगह पर है। वैसे भी मोदी की उम्मीदवारी के चलते चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में हानि से ज्यादा लाभ होने की ही संभावना है। क्योंकि एक तो मोदी भी विकास-पुरुष की छवि के चलते मुसिलमों का एक तबका उनका पक्षधर है दूसरे मोदी की उम्मीदवारी के चलते जो जन-समर्थन भाजपा के पक्ष में खड़ा हो रहा है, उसका लाभ निश्चित रूप से भाजपा को चार राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में मिलेगा।

अब आडवाणी द्वारा भी मोदी की पक्षधरता व्यक्त करने के बाद अब ऐसा कोर्इ आधार या आशंका नहीं रह गर्इ है कि मोदी को लेकर भाजपा विभाजित है, क्योंकि अब मोदी सर्वसम्मत भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के सर्वसम्मत उम्मीदवार हैं। अब कहने वालों ने खासतौर पर कांग्रेस पार्टी ने मोदी को पार्टी के साथ देश को भी बांटने वाला बताया। अब देश को कौन बांटने वाला है और कौन जोड़ने वाला ! यह बात अपनी जगह पर है। पर यह एक ध्रुव सत्य है कि देश के अधिसंख्य मतदाता यह मानते हैं कि मोदी जैसे दृढ़ निश्चयी राजनेता और कठोर प्रशासक के चलते देश अंदर और बाहर दोनों से ही सुरक्षित रहेगा। कम से कम गुजरात की जनता में भी ऐसा कोर्इ बंटवारा देखने को नहीं मिल रहा है इसके उलट उत्तर प्रदेश राज्य में जहां पर धर्मनिरेपक्षता की झण्डाबरदार समाजवादी पार्टी शासन में है। और जिसके डेढ़ वर्ष के शासनकाल में सौ से ऊपर दंगे हो चुके हैं वहां निश्चित रूप से लोगों में एक बंटवारा देखने को मिल रहा है। जहां तक पार्टी बांटने का सवाल है तो क्या कांगे्रसी भूल गये कि श्रीमती इंद्रा गांधी ने अपनी व्यक्तिवादी एवं स्वेच्छाचारी नीतियों के चलते कांग्रेस पार्टी को एकबार नहीं बलिक दो बार बांटा था। एकबार वर्ष 1969 में और दूसरी बार 1978 में। कम से कम मोदी ने ऐसा कहीं एहसास नहीं कराया कि यदि भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाया तो वह भाजपा को तोड़ देंगे या उससे अलग होकर नर्इ पार्टी बना लेंगे। इसके लिए उनके द्वारा कोर्इ तिकड़म या पैंतरेबाजी दिखार्इ जाने की भी कोर्इ खबर नहीं है। उनके द्वारा इस विषय को लेकर कम से कम किसी वरिष्ठ या कनिष्ठ किसी नेता को अपमानित किए जाने की बातें भी सामने नहीं आर्इं। उल्टे चाहे चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने का मामला हो या प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की घोषणा का क्षण रहा हो। दोनों ही अवसरों पर वह पूरी विनम्रता से जाकर श्री आडवाणी से मिले। वर्ष 1998 में तात्कालिक कांग्रेसाध्यक्ष सीताराम केशरी को किस अपमान जनक एवं फूहड़ व्यवहार के साथ अध्यक्ष पद से हटाया गया था, यह लोग अभी तक नहीं भूले होंगे।

अब कर्इ क्षेत्रों में ऐसा प्रचारित किया जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मोदी को भाजपा पर थोपा है। यानी संघ के बाध्य करने के चलते भाजपा ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है। लेकिन जब देश का जनमत मोदी के साथ है, भाजपा का कार्यकर्ता इस पक्ष में खड़ा था कि मोदी को शीघ्रातिशीघ्र प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाए। तो यह कैसे कहा जा सकता है कि संघ के चलते यह फैसला हुआ। हाँ इतना जरुर कहा जा सकता है कि संघ के चलते समय पर भाजपा को यह फैसला करने में मदद मिली। पर इससे यह तो नहीं कहा जा सकता कि मोदी को संघ के चलते थोपा गया, बलिक इतना ही कहा जा सकता है कि संघ ने एक सही फैसला करवाने में मदद की। और यदि संघ ने ऐसा किया तो इसे गलत कैसे कहा जा सकता है ? खासकर इस फैसले का देश में जिस ढ़ंग से स्वागत किया गया। मोदी को थोपने का कोर्इ प्रश्न ही नहीं पैदा होता, क्योंकि वह किसी ऐसे खानदान से नहीं हैं जिसका राज-पाट पर विशेषाधिकार हो। वैसे भी यदि एक राज्य का मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो जाता है, तो इसे चमत्कारिक की कहा जाएगा, क्योंकि अभी तक ऐसा हुआ नहीं।

अब मोदी विरोधियों का कहना है कि यह गठबंधन का दौर है और मोदी के साथ सहयोगी दल आ नहीं सकते। पर मोदी का जन-समर्थन जिस ढ़ंग से बढ़ रहा है और देश की जनता जिस ढ़ंग से उन्हें देश की सभी समस्याओं का समाधान मान रही है तो इस बात की भरपूर संभावना है कि उत्तरी और पशिचमी भारत कहीं एकतरफा न मोदी के साथ खड़ा हो जाए। जहां तक पूर्वी भारत का प्रश्न है तो सभी जनमत सर्वे में बिहार में भाजपा को नम्बर एक बताया जा रहा है। उड़ीसा में भी भाजपा कहीं-न-कहीं मजबूत स्थिति में है और ऐसा हो सकता है कि वहां भी मोदी के पक्ष में माहौल खड़ा हो जाए। दक्षिण में भी कर्नाटक में येदुयरप्पा की वापसी और कर्नाटक में भाजपा के जनाधार को देखते हुए भाजपा वहां भी अपना पुराना प्रदर्शन दुहरा दे तो आश्चर्य नहीं। जहां तक तमिलनाडु का प्रश्न है तो जयललिता के साथ आने की पूरी संभावना है। फिर भी यदि ऐसा मान लिया जाए कि भाजपा को लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा नहीं मिलता तो कर्इ दल ऐसे होंगे जिनके पास भाजपा के अलावा कांग्रेस के साथ जाने का कोर्इ विकल्प नहीं है। बावजूद इसके भी यदि बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटता तो किसी और को आगे लाकर सरकार बनायी जा सकती है। पर कुल मिलकार ऐसा लगता है कि मोदी ही इस देश की नियति हैं। क्योंकि जन मानस को यह विश्वास हो चला है कि देश में जहां बुरी तरह खदबदा रहे भ्रष्टाचार को मोदी समाप्त कर सकते हैं, जो हमारी सारी त्रासदियों का कारण है। वहीं वह चाहे नक्सलवाद हो या जेहादी आतंकवाद हो, अथवा पाकिस्तान की दरिंदगी और चीन की दादागीरी हो, वह सबसे निपट सकते हैं। देश को कुछ ऐसा एहसास हो चला है कि मोदी विकास के पर्याय तो बन ही सकते हैं, साथ ही वह लौह पुरुष की भी भूमिका बखूवी निभा सकते हैं। कुल मिलाकर देश मोदी में एक मसीहा देख रहा है जो देश में सभी मर्जों की रामबाण औषधि है। ऐसी स्थिति में जब नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता अटल बिहारी बाजपेयी जी की लोकप्रियता से भी आगे निकल गर्इ है और उन्हें चुनौती देने वाला कोर्इ मैदान में आता नहीं दिख रहा हो, तो आने वाले कल को समझा जा सकता है।

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