इतिहास पर गांधीवाद की छाया ,अध्याय – 4 गांधीजी और भगत सिंह की फांसी

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गांधीजी और भगत सिंह की फांसी

देश में कुछ लोग हैं जिनको गांधी की आलोचना पचाये नहीं पचती । ऐसे सज्जनों की जानकारी के लिए :बीबीसी’ की ओर से जारी की गई एक समीक्षा को हम यहां प्रेषित कर रहे हैं । जिसमें ‘बीबीसी’ ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि गांधीजी ने शहीदे आजम भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी को रुकवाने के लिए कोई गम्भीर प्रयास नहीं किए । बीबीसी के अनुसार :–
17 फरवरी 1931 से वायसराय इरविन और गांधी जी के बीच बातचीत आरम्भ हुई। इसके बाद 5 मार्च, 1931 को दोनों के बीच समझौता हुआ।

इस समझौते में अहिंसक तरीके से संघर्ष करने के दौरान पकड़े गए सभी कैदियों को छोड़ने की बात निश्चित हुई । ( यही वह दुर्बल पक्ष है जो गांधीजी को क्रान्तिकारियों की फांसी का दोषी बनाता है । उन्होंने अहिंसक ढंग से स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने वाले लोगों को बचाने की बात कही । इसका अर्थ था कि जो हिंसा में विश्वास रख रहे हैं और क्रान्ति के माध्यम से देश को स्वतंत्र कराना चाहते हैं , उन्हें वह बचाना नहीं चाहते थे।)
इस सब के उपरांत भी राजकीय हत्या के मामले में फांसी की सज़ा पाने वाले भगत सिंह को माफ़ी नहीं मिल पाई। भगत सिंह के अतिरिक्त सभी दूसरे कैदियों को ऐसे मामलों में माफी नहीं मिल सकी। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई।

गांधी जी का विरोध

इस दौरान ये प्रश्न उठाया जाने लगा कि जिस समय भगत सिंह और उनके दूसरे साथियों को सज़ा दी जा रही है तब ब्रितानी सरकार के साथ समझौता कैसे किया जा सकता है। इस मसले से जुड़े सवालों के साथ हिंदुस्तान में अलग-अलग जगहों पर पर्चे बांटे जाने लगे। साम्यवादी इस समझौते से नाराज़ थे और वे सार्वजनिक सभाओं में गांधी जी के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करने लगे।
ऐसे में 23 मार्च 1931 के दिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सज़ा दे दी गई।इसके बाद लोगों में आक्रोश की लहर दौड़ गई। लेकिन ये आक्रोश सिर्फ अंग्रेजों नहीं बल्कि गांधी जी के ख़िलाफ़ भी था क्योंकि उन्होंने इस बात का आग्रह नहीं किया कि ‘भगत सिंह की फांसी माफ़ नहीं तो समझौता भी नहीं।’
साल 1931 की 26 मार्च के दिन कराची में कांग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ ‘जिसमें पहली और आख़िरी बार सरदार पटेल कांग्रेस के अध्यक्ष बने.’
25 मार्च को जब गांधी जी इस अधिवेशन में हिस्सा लेने के लिए वहां पहुंचे तो उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया गया। उनका स्वागत काले कपड़े से बने फूल और गांधी मुर्दाबाद-गांधी गो बैक जैसे नारों के साथ किया गया। इस विरोध को गांधी जी ने ‘उनकी’ गहरी व्यथा और उससे उभरने वाले गुस्से का हल्का प्रदर्शन बताया और उन्होंने कहा कि ‘इन लोगों ने बहुत ही गौरवभरी शैली में अपना गुस्सा दिखाया है।’
अख़बारों की रिपोर्ट के अनुसार, 25 मार्च को दोपहर में कई लोग उस जगह पहुंच गए जहां पर गांधी जी ठहरे हुए थे।

‘ये लोग चिल्लाने लगे कि ‘कहां हैं खूनी’

तभी उन्हें जवाहर लाल नेहरू मिले जो इन लोगों को एक तंबू में ले गए। इसके बाद तीन घंटे तक बातचीत करके इन लोगों को समझाया, लेकिन शाम को ये लोग फिर विरोध करने के लिए लौट आए। कांग्रेस के अंदर सुभाष चंद्र बोस समेत कई लोगों ने भी गांधी जी और इरविन के समझौते का विरोध किया. वे मानते थे कि अंग्रेज सरकार अगर भगत सिंह की फ़ांसी की सज़ा को माफ़ नहीं कर रही थी तो समझौता करने की कोई ज़रूरत नहीं थी. हालांकि, कांग्रेस वर्किंग कमेटी पूरी तरह से गांधी जी के समर्थन में थी । ( साभार )

गांधीजी और सुभाष के संस्कार

कई लोग इस बात को भी कहते हैं कि सुभाषचंद्र बोस ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा था , मैं भी मान लेता हूँ कि यह बात सच हो सकती है । लेकिन यह सुभाषचन्द्र बोस का संस्कार था कि वह अपने विरोधी को भी सम्मान देना जानते थे , जबकि गांधीजी का संस्कार यह था कि वह विरोधी की छाया में भी जूते मारते थे। स्वामी श्रद्धानन्द से लेकर सरदार पटेल तक उन्होंने अपने हर उस विरोधी को ‘खुड्डे लाइन’ लगाने का प्रयास किया , जिन्होंने उनकी प्रत्येक हिंदू विरोधी गतिविधि , मान्यता या आदेश के सामने झुकने से देशहित में इंकार कर दिया था।
सुभाषचन्द्र बोस ने यदि गांधीजी को :राष्ट्रपिता’ कहा तो उनके उन तथ्यों और वास्तविकताओं को भी समझने का प्रयास करना चाहिए कि जब उन्होंने गांधीजी का विरोध किया और उसे मानने से इनकार कर दिया।
यह बात डंके की चोट कही जा सकती है कि गांधीजी पूरे स्वतन्त्रता संग्राम के एकमात्र ‘नायक’ नहीं थे ।अज्ञानतावश लोग चाहे कितना ही “गांधी – गांधी ” का शोर मचाएं , लेकिन यह सच है कि गांधी एक नेता तो हो सकते हैं , लेकिन एकमात्र नेता नहीं थे । पूरे स्वतन्त्रता संग्राम को किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित करना देश के पुरुषार्थ , शौर्य और वीरता के साथ खिलवाड़ करना होगा । जिसे इस देश का शौर्य कभी भी सहन नहीं करेगा।
वर्तमान इतिहास का एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह गांधीजी को स्वाधीनता संग्राम के एकमात्र नेता के रूप में स्थापित करता है और वह शहीद ए आजम भगत सिंह को चाहे फांसी से बचाने में गाँधीजी कितने ही असफल और असमर्थ क्यों न रहे हों या उन्होंने जानबूझकर उन्हें फांसी से बचाने का प्रयास क्यों न किया हो – इसके उपरान्त भी उनके प्रत्येक कार्य का महिमामण्डन कर इतिहास में उन्हें ‘कालपुरुष’ के रूप में स्थापित किया गया है।

देश की अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे गांधीजी

जिस समय भगत सिंह और उनके साथियों को ब्रिटिश सरकार फांसी के फंदे पर झुलाने की तैयारी कर रही थी , उस समय सारे देश की अपेक्षा थी कि गांधीजी अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी से बचाएं ,परन्तु दुर्भाग्यवश गांधीजी ने जानबूझकर ऐसा नहीं किया । गाँधीजी ने भगतसिंह की हिंसा को बार-बार उठाया और देश के लोगों के क्रोध की उपेक्षा करते हुए बार-बार यह कहा कि भगतसिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध क्रान्तिकारी ढंग से जिस प्रकार अपना संग्राम जारी रखा है या उसे जारी रखने का प्रयास किया है , वह अक्षम्य है । गांधी जी भगतसिंह और उनके साथियों को आतंकवादी मानते थे और आतंकवादी ही कहते रहे । यही कारण है कि वर्तमान इतिहास की कई पुस्तकों में हमारे इन महान क्रांतिकारियों को आतंकवादी ही कहा जाता है ।
गांधीजी पर अहिंसा का भूत सवार था। वह मुस्लिमों को या ब्रिटिश अधिकारियों को तो कभी हिंसा करने से रोक नहीं पाए पर भारत के हिंदू स्वाधीनता सैनानियों और समाजसेवियों को अहिंसक बने रहने की प्रेरणा अवश्य देते रहे। 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गाँधी जी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी। देश के लोगों की अपेक्षा गांधी जी से यह नहीं थी कि वे इन समाजवादियों को इस प्रकार की प्रेरणा देंगे।
जब गांधीजी ने ‘खिलाफत आन्दोलन’ को अपना समर्थन दिया उस समय भी देश के बड़े वर्ग ने उनके इस निर्णय का विरोध किया था । इतना ही नहीं मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं ने भी उस समय उनके खिलाफत आंदोलन को दिए जा रहे समर्थन का विरोध किया था । यह सब के उपरांत भी ‘जिद्दी गांधी’ ने 1921 में खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की।
जब केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की तो गांधीजी का दोगला चरित्र एक बार फिर उभर कर सामने आया। इस हिंसा में वहां के मुसलमानों ने लगभग 1500 हिन्दु मार दिये थे , व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया था । लोगों की अपेक्षा थी कि हिंसा तो हिंसा है , वह चाहे किसी के भी द्वारा क्यों नहीं जा रही हो ? इसलिए गांधीजी हिंदुओं पर मुसलमानों द्वारा की गई इस हिंसा का विरोध करेंगे और कोई :कड़ा निर्णय’ लेंगे , परंतु लोगों को उस समय निराशा ही हाथ लगी जब गाँधी जी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में इसका वर्णन किया।
गांधीजी की इसी सोच के कारण स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी ‘खुदा के बहादुर बंदे’ हिन्दुओं का रक्त बहाते रहे हैं । जिसे इतिहास बहुत निकट से देखकर भी उपेक्षा करता रहा है । यह वैसे ही होता जा रहा है जैसे गांधीजी के समय में इतिहास ने कितनी ही घटनाओं को बड़ी निकटता से देखा , पर उनका वर्णन नहीं किया।

डॉ राकेश कुमार आर्य ,संपादक : उगता भारत एवं
राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पु0 समिति

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