देश का युवा राहुल के नही मोदी के साथ

राकेश कुमार आर्य

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित रैली ने उनकी अब तक की पूर्व की रैलियों के अनुसार एक बार फिर सिद्घ कर दिया है कि देश का युवा कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी की ओर आकर्षित न होकर मोदी की ओर आकर्षित हो रहा है। नरेन्द्र मोदी की इस रैली से कांग्रेस की शीला दीक्षित की कुर्सी की चूलें हिल गयीं और मनमोहन सिंह सरकार के लिए भी संदेश चला गया है कि  देश की राजधानी के लोगों ने मोदी के लिए मन बना लिया है। मोदी के बारे में कोई यह नही कह सकता कि उनकी रैलियों में आ रही भीड़ किराये की है। लोग उन्हें सुनने आ रहे हैं और जो उनकी रैली में नही आ पाते हैं वो उन्हें टीवी आदि पर सुन रहे हैं। उन्हें किसी फिल्म स्टार, या फिल्मी हीरोइन को मंच पर लाकर बैठाने की आवश्यकता नही है, जैसा कि हम पिछले लंबे समय से देखते आ रहे थे कि नेता अपनी सभाओं को सफल करने के लिए फिल्मी स्टार या हीराइनों की सहायता लिया करते थे। निश्चित रूप से उनकी यह सभा सफल तो हो जाती थी लेकिन सभा में आयी भीड़ वोटों में नही बदल पाती थी। परंतु लंबे समय के बाद देश की राजनीति से इस ब्लैकमेलिंग की राजनीति को हम विदा होते देख रहे हैं।

दुनिया का सबसे अधिक जवान भारत में बसता है और यह अब एक नई इबारत लिखने जा रहा है। भारत का युवा अधेड़ उम्र के प्रौढ़ मोदी के साथ जुड़कर यह बता रहा है कि उसे निर्णय लेना आता है और वह इतिहास बदलना जानता है।

राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी  ने मतदाताओं की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की थी और तब उस नये मतदाता ने युवा प्रधानमंत्री का साथ दिया था। लेकिन अब आज का युवा कुछ दूसरी बात सोच रहा लगता है। नई दिल्ली में मोदी की रैली में गांधी टोपी धारी बुजुर्ग और सफेद सिर वालों का अभाव था। सारा हुजूम युवाओं का था। मोदी ने युवा की नब्ज को पहचाना है और उन्होंने भारत के परिपक्व युवा को संतुलित किंतु जोशीले अंदाज में आगे बढ़ने का संदेश दिया है। मोदी ने मुजफ्फर नगर दंगों पर सावधानी से चुप्पी साधी है और उनकी सावधानी ने ही मुजफ्फरनगर दंगों के दोषियों को दोषी सिद्घ कर दिया है। यह उनके व्यक्तित्व का ही चमत्कार है कि जो ‘चक्रव्यूह’ उन्हें फंसाने के लिए रचा गया था उसमें वह बड़ी चतुराई से दूर से ही बचकर निकल गये हैं। वह ऐसे योद्घा सिद्घ हो चुके हैं जो चक्रव्यूह को तोड़ना भी जानते हैं और अपने शत्रुओं को ही उसमें फंसाकर आगे बढ़ जाते हैं।

मोदी ने दिल्ली की रैली में कांग्रेस के दो महारथी-प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गांधी को बिना तीर छोड़े पराजित योद्घा बना दिया है। उन्होंने पीएम मनमोहन सिंह को पाकिस्तानी पीएम नवाज शरीफ द्वारा ‘देहाती महिला’ कहने पर जिस अच्छी भाषा का प्रयोग किया है उसमें उनकी देशभक्ति, जिम्मेदारी की भावना और देश के संवैधानिक संस्थानों के प्रति सम्मान भाव तो झलकता ही है साथ ही उनका रणनीतिक चातुर्य भी झलकता है कि वह अपने श्रोताओं को अपने प्रति किस प्रकार मंत्रमुग्ध किये रख सकते हैं। उनके विचारों को और उनकी अभिव्यक्ति की शैली को लोगों ने सुना और सराहा, यही उनकी उपलब्धि है।

जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो उसकी स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही हो रही है जैसी राजा विराट की गौहरण के समय विराट पुत्र उत्तर कुमार की भीष्म पितामह के सैन्यदल को देखकर हो गयी थी। कांग्रेस के युवराज ने 2014 के चुनाव की तैयारी नही की है। वह चुनाव की ओर नही बढ़ रहे हैं, बल्कि चुनाव उनकी ओर बढ़ रहे हैं। जबकि मोदी स्वयं चुनावों की ओर बढ़ रहे हैं। मनमोहन सिंह चाहे कितने ही अपमानित किये जाएं पर अब उनकी चुप्पी भी कुछ बता  रही है। वह नरसिंहाराव की तरह ढीठ तो नही हैं, परंतु उनकी शालीनता भी अब कुंठित है, और वह अपने ऊपर गांधी परिवार के उपकार के उपरांत शांत रहकर ही कांग्रेस का खात्मा होते देखना चाहते हैं। उन पर भार है- उपकारों का और वह उन उपकारों से मुक्त होना चाहते हैं, परंतु अपनी शालीनता के साथ। कांग्रेस इस समय बचाव की मुद्रा में है और वह चुनाव के लिए कुछ बैसाखियों की खोज कर रही है। राष्ट्रव्यापी संगठन को लेकर चलने वाली भारत की सबसे बड़ी पार्टी के लिए इस समय सचमुच संकट का काल है। पार्टी के पास नेता हैं, पर फिर भी नेताविहीन पार्टी के संकट से कांग्रेस गुजर रही है।

भाजपा ने समय को पहचान लिया है और वह अपने नेता के पीछे लग गयी है। इसके लिए पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह की रणनीति ही उत्तरदायी है, वह अपने बुजुर्ग नेता आडवाणी को भी साथ लाने में और समझाने में सफल रहे हैं। उन्हें ‘मोदी’ नाम का मुद्दा मिल गया है। मोदी अब पार्टी के लिए एक मुद्दा भी हैं और एक चेहरा भी। जब तक वह चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष थे, तब तक वह केवल एक मुद्दा थे, पर अब पीएम पद के भाजपा के उम्मीदवार घोषित होने पर एक चेहरा भी बन गये हैं।

देश का युवा परिवर्तन की बाट जोह रहा है, और वह परिवर्तन के लिए राष्ट्रवादी आंदोलन चलाने के मूड में है। सचमुच ऐसी चाह रखने वाले युवाओं को एक चेहरे की तलाश थी और संयोग से मोदी ने युवा की इस चाह को पूरा करने की आशा बंधाई है।  जबकि कांग्रेस के राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सवा सौ वर्ष पुरानी बूढ़ी कांग्रेस के वारिस हैं। वह उसकी मान्यताओं से बाहर आने को तैयार नही हैं, जबकि नरेन्द्र मोदी 33 वर्ष पुरानी जवान भाजपा में भी परिवर्तन की आशा बनकर उभरे हैं। बस इन्हीं दोनों बिंदुओं को भारत के युवा ने समझा और परखा है, और उसी का परिणाम है कि देश में परिवर्तन की लहर चल गयी लगती है। जब देश का युवा जाग जाता है तो परिवर्तन अवश्यम्भावी हो जाया करता है। पुरानी व्यवस्था जलती है और उसी के अवशेषों पर नई व्यवस्था जन्मती है। भारत 2014 में नई व्यवस्था के लिए अंगड़ाई ले रहा है। 2014 का आम चुनाव परिवर्तन कारी होगा। यह कई चीजें तय करने जा रहा है और हर देशवासी को उम्मीद करनी चाहिए कि यह परिवर्तन इस बार स्थायी होगा। जिसके लाभ इस देश को सदियों तक मिलेंगे। चूंकि भारत हम सबका है, इसलिए हम सब मिलकर ही नये भारत का निर्माण करें तो ही अच्छा है। साम्प्रदायिक आधार पर नही बल्कि राष्ट्रीय दृष्टिकोण से उचित निर्णय लें और देश को सक्षम नेतृत्व प्रदान करें। दिल्ली की रैली का संदेश तो यही है।

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