भारतीय वीरांगनाओं में एक नाम राजकुमारी कार्विका का भी है

images (37)

मनीषा सिंह

भारत का अतीत बड़ा गौरवमय रहा है। भारत की धरती को शस्यश्यामला कहा जाता है, रत्नगर्भा कहा जाता है, इतना ही नही अपितु वीरप्रसविनी कहा जाता है क्योंकि समय समय पर भारत मां की कोख से महान दार्शनिक ऋषि मुनि, राष्ट्रनायक उन्नायक, महान नेता युग प्रणेता, अन्वेषक, वैज्ञानिक और वीर-वीरांगनाएं उत्पन्न होते रहे हैं जिनकी यश पताका आज देश विदेश में सर्वत्र फहरा रही है। ऐसी ही एक वीरांगना हैं राजकुमारी कार्विका। यदि हम भारत की योद्धा स्त्रियों की चर्चा करें तो महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सभी को तुरंत याद आ जाता है किंतु राजकुमारी कार्विका का नाम कम ही लोग जानते हैं। राजकुमारी कार्विका की आँखों में शेरनी जैसी ज्वाला और चेहरे के आभामंडल में सूर्य जैसा तेज दमकता था। अदम्य साहस तथा शौर्य तो इसे जन्म से ही मिले थे और वीरता तथा निडरता तो मानो जैसे इसे घूंटी में पिलायी गयी हो। वह बचपन से ही अप्रतिम प्रतिभा की धनी थी।
आर्यावर्त भूमि की एक ऐसी वीरांगना हैं राजकुमारी कार्विका जिसके बारे में इतिहास में ना तो विस्तारपूर्वक लिखा गया और ना ही कभी सुना गया। यह आधुनिक इतिहासकारों द्वारा उपेक्षा की शिकार हुई एक ऐसी वीरांगना की वीरगाथा है जिसने विश्वविजय का सपना देखने वाले सिकन्दर से लोहा ले कर अपने राज्य की रक्षा की। इस अद्धभुत शौर्य से पूर्ण वो वीरांगना थी कठ गणराज्य की राजकुमारी कार्विका। कठ प्राचीन पंजाब का प्रसिद्ध गणराज्य था। इतिहास में उनके स्वरूप का वर्णन इन शब्दों में मिलता है – राजकुमारी की शारीरिक ऊँचाई छ: फीट, रंग उगते हुए सूर्य की लालिमा की भांति, मुख पर सौम्यता और क्षात्र तेजयुक्त माँ दुर्गा जैसी तेजस्वी आँखें। उनका प्रिय कार्य था शास्त्र अध्ययन एवं शस्त्र अभ्यास। मात्र दस वर्ष की छोटी आयु में ही वे धनुर्वेद के ज्ञान में पूर्ण रूप से पारंगत हो चुकी थीं। इसके अलावा उन्होंने कई सारे युद्धकला में विशेषज्ञता हासिल कर चुकी थीं। जैसे 1) यन्त्रमुक्त युद्धकला (अस्त्र शस्त्र के उपकरण जैसे धनुष और बाण के उपयोग से विभिन्न प्रकार के तरीके से शत्रु पर प्रहार करने की पद्धति), 2) पाणिमुक्त युद्धकला (हाथ से फेंके जाने वाले अस्त्र जैसे कि भाला पर बारूद लगाकर फेंकने की पद्धति), 3) तांगथा युद्धकला (आँखों में पट्टी बांध कर दोनों हाथों में तलवार लिये युद्ध करने की पद्धति), 4) हस्त अस्त्र युद्ध विद्या जिसमें हवाओं की रफ्तार से तलवार चलाया जाता था और 5) नियुद्ध अर्थात बिना हथियार के युद्ध करना जिसे आज हम मार्शल आर्ट भी कहते हैं।
राजकुमारी कार्विका के प्रजावत्सल होने का प्रमाण इसी से मिलता है कि राजकुमारी बाल्यकाल में ही प्रजा के दुख दर्द को देखना एवं उनका दुखों के निवारण की चेष्टा करना सीख गयीं थीं। इसके लिए वे साधारण वेष में प्रजाजनों के बीच जाकर उनके दुख दर्द एवं शिकायतें भाँपकर अतिशीघ्र उसका निवारण हेतु आवश्यक कदम उठाती थीं। उनके इस कार्य से बाल्यकाल से ही उनके अंदर एक प्रजावत्सल महारानी का स्वरूप दिखने लगा था और मात्र 17 वर्ष की आयु में ही सब उनमें भावी साम्राज्ञी का चित्र देखने लगे थे। कठ गणराज्य की प्रजा राजकुमारी कार्विका की प्रजावत्सलता देख अत्यंत भावविह्वल थी एवं राज्य में सम्पनता के साथ खुशहालीपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही थी। इसी बीच भारतवर्ष पर सिकन्दर का आक्रमण हुआ। सिकंदर ने भयंकर तबाही और नरसंहार मचाते हुए सिंध की तरफ से सर्वप्रथम कठ गणराज्य में प्रवेश किया। ऐसी सूचना मिलते ही राजकुमारी कार्विका ने अपने सैन्यबल को एकत्रित कर हुंकार भर रणभेरी फूंक कर युद्ध की घोषणा कर दिया। राजकुमारी ने अपनी स्त्रीसेना का निर्माण किया था एवं इस सैन्यबल का नाम चंडीसेना रखा था। इतिहास में मिले प्रमाणों के अनुसार राजकुमारी की चंडीसेना में 1300 अश्वारोही स्त्रियां, 3500 पैदल स्त्रियां, कुछ हजार के लगभग धनुर्धारी एवं ढालधारी स्त्रियां था। कुल लगभग 10 से 12 हजार तक का सैन्यबल था। सम्पूर्ण विश्व धरा के इतिहास में ऐसी पहली सेना बनी थी जो केवल वीरांगना नारियों की सेना थी।
वर्ष 325 ई.पू में सिकंदर ने अपने विशाल सैन्यबल के साथ कठ गणराज्य पर आक्रमण कर दिया था। सिकंदर को इस युद्ध में सहज विजय मिलने की अपेक्षा थी। राजकुमारी कार्विका ने बड़ी ही सूझ-बुझ, शांत चित्त, कुशल एवं अचूक रणनीति और अपने युद्धव्यूह से सिकंदर को पराजित करने का निश्चय किया। राजकुमारी कार्विका ने रणनीति बनाई कि शत्रु को जहाँ उसे बल मिल रहा है, उस जगह से बाहर ले आ कर बीच में कहीं ले आना है जिससे शत्रुदल की शक्ति कम हो जाये। राजकुमारी के इस युद्धनीति को आगे चलकर विदेशी खासकर चीन के योद्धाओं ने भरपूर व्यवहार में लाया है। इस युद्धनीति को अंग्रेज़ी में कहते है ल्यूर द टाइगर ऑफ द डेन यानी शेर को उसकी माँद से बाहर ले आना।
इस युद्धनीति के अनुसार सिकंदर की सैन्य शिविर के निकट राजकुमारी कार्विका के आदेशानुसार सर्वप्रथम दो-चार सौ सैनिकों ने बाणों की एकसाथ वर्षा कर दी। इससे सिकंदर की सेना तितर बितर हो गई। सिकंदर के सेनापति ने सिकंदर की आरामगृह शिविर में यह संदेश भिजवाया। संदेश प्राप्त होते ही सिकंदर ने अपने सैनिकों को आगे बढ़कर आक्रमण करने का आदेश दिया। इधर राजकुमारी कार्विका ने ऊंची, नीची, छोटी पर्वत जैसी बनी हुई घाटियों का सहारा लेकर हज़ार सैनिकों का दस्ता भेजा। कार्विका की सैन्य संख्या काफी कम थी, परंतु अपने अदभुत युद्धकौशल एवं रणनीति के द्वारा राजकुमारी कार्विका ने यह सिद्ध किया है कि युद्ध संख्याबल से नहीं बल्कि बुद्धिबल से जीते जाते हैं। सिकंदर के द्वारा भेजी गई पहली 35000 सैन्यबल के समक्ष कार्विका की सेना युद्ध में सिकंदर पर भारी सिद्ध हो रही थी। कार्विका की सेना ऊंचे नीचे पहाड़ जैसी बनी घाटियों का सहारा लेकर समवेत स्वर में हुंकार भरने पर आवाज की गूंज से सैनिकों की संख्या ज्यादा प्रतीत होने लगा था। इससे सिकंदर की सेना को भ्रम हो गया कि कठ गणराज्य की सेना का संख्याबल अत्यधिक है। इसी धोखे में सब एकसाथ मिलकर आगे बढ़ गये और झुंड में आक्रमण कर दिया। राजकुमारी कार्विका सिकंदर की सेना को अपने मूलस्थान से दूर ले आने की योजना में सफल हो चुकी थीं। सिकंदर का भेजा गया पहला सैन्य दस्ता बुरी तरह परास्त हो गया।
दूसरी बार सिकंदर ने 40000 का सैन्यदल भेजा और उन्हें उत्तर-पूर्व की दिशा से आक्रमण करने का निर्देश दिया। इस बार सिकंदर ने हेलेनिक एवं बारबैरियन (अर्थात बर्बर युद्ध पद्धति) को अपनाया। इस युद्ध पद्धति में सिकंदर की सेना ढाल की दीवार बनाकर भाला को मध्यभाग से पकड़ के सब एक साथ दस-दस सैनिकों का पंक्तिपद बना के आक्रमण करते थे।
इस युद्धव्यूह को तोडऩे के लिए राजकुमारी कार्विका ने भ्रमजाल नीति को अपनाया। इस युद्धनीति को अंग्रेजी में डिसेप्शन कहते हैं। डिसेप्शन युद्ध कला का जि़क्र सन् जू के किताब युद्ध कला में भी प्राप्त होता है। इस युद्धनीति के तहत कार्विका ने अपनी 150 सैनिकों की टोली को दो तरफ भेज दिया और कुछ घोड़ों को खुला छोड़ दिया। बाकी बचे सैनिकों को उत्तर एवं मध्य की दिशा में विभाजित कर बांट दिया। घोड़ों की भाग-दौड़ से यवन सेना को यह भ्रम हो गया कि राजकुमारी कार्विका की सैन्यदल पूर्व और दक्षिण की ओर से आ रही है। यवन सेना इस भ्रमजाल युद्ध नीति में फंस गई और दक्षिण की ओर मुड़ गई। तत्पश्चात राजकुमारी कार्विका अपनी उत्तर एवं मध्य में उपस्थित सैन्यबल को आक्रमण करने का आदेश दे दिया। भारतीय वीरांगनाओं ने अनुमति प्राप्त करते ही अग्नि बाणों की वर्षा कर दिया। साथ ही अश्वसेना एवं पैदल सैनिकों ने भी आक्रमण कर दिया और राजकुमारी कार्विका एक बार फिर यवन सेना के इस दस्ते को भी परास्त करने में सफल हुई। सिकंदर के 40000 सैनिकों में से केवल आठ हजार ही प्राण बचा कर भाग पाए।
तीसरा एवं अंतिम सैन्यदस्ता 75000 का मोर्चा लिए स्वयं सिकंदर ने आक्रमण किया। इस बार राजकुमारी कार्विका एवं सिकंदर का आमना सामना हुआ। राजकुमारी कार्विका ने यहाँ घात लगाकर युद्ध करने और सिकंदर का सैन्यबल कुछ कम होने पर औरमी व्यूह का उपयोग करने का निर्णय लिया। औरमी व्यूह में सेना को इस तरह से सुसज्जित किया जाता है जिस प्रकार समुद्र में लहरें दिखाई देती हैं। इस व्यूह की एक विशेषता है कि इसमें संख्या की कमी को छुपाया जा सकता है। राजकुमारी कार्विका ने इस व्यूह रचना से सिकंदर को युद्ध के अंत तक अपने सैन्यबल का अनुमान नहीं लगाने दिया। राजकुमारी कार्विका की सेना ने सिकंदर की सेना में हाहाकार मचा दिया। इस भीषण प्रलयंकारी युद्ध में राजकुमारी कार्विका की तलवार के प्रहारों ने सिकंदर की बाँह और पेट को चीर दिया था जिससे सिकंदर के आंतो पर गहरा ज़ख्म हो गया।
इस युद्ध में राजकुमारी कार्विका ने सिकंदर को सिंध के पार खदेड़ दिया था। सिकंदर की 150000 की सेना में से 25000 के लगभग सेना शेष बची थी। सिकंदर ने कठगणराज्य में दोबारा आक्रमण नहीं करने के आश्वासन के साथ एवं दंडरूपी जुर्माना देकर वापस लौट गया। इस अंतिम युद्ध में कठगणराज्य के 8500 में से 2750 साहसी वीरांगनाएं बलिदान हुईं जिसमे से कुछ वीरांगनाओ के ही नाम इतिहास के दस्तावेजों में मिलते हैं। इनमें से कुछ नाम हैं – गरिण्या, मृदुला, सौरायमिनि, जया इत्यादि।
एक वीरांगना की इतनी अदभुत वीरगाथा पढऩे एवं सुनने के बाद अवश्य ये प्रश्न उठता है कि इस वीरगाथा से हम अनभिज्ञ क्यों हैं। उसका उत्तर ये है कि राजकुमारी कार्विका के समूल इतिहास को नष्ठ कर दिया गया है। इनका इतिहास बहुत ढूंढने पर केवल दो संदर्भों में और वह भी केवल दो पन्नों में पाया जाता है।

Comment:

betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vaycasino
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
casibom
betpark
betpark
kolaybet giriş
betpark
betpark
betgaranti
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
xbahis
xbahis
vaycasino
vaycasino
millibahis
millibahis
betnano giriş
bahisfair giriş
betnano giriş
bahisfair giriş
bahisfair giriş
bahisfair giriş
betnano giriş
betnano giriş
timebet giriş
betplay giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
norabahis giriş
perabet giriş
perabet giriş
pokerklas
pokerklas
betpark giriş
betasus giriş
betasus giriş
vaycasino
vaycasino
pokerklas
pokerklas
betpark giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
oslobet giriş
oslobet giriş
oslobet giriş
betnano
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
pokerklas
pokerklas
ikimisli giriş
timebet giriş
casibom giriş
casibom giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
romabet giriş
romabet giriş
casibom
casibom
ikimisli giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
Betist
Betist giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
betpark giriş
perabet giriş
perabet giriş
bahiscasino giriş
bahiscasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betnano giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
ikimisli giriş
betplay giriş
timebet giriş
roketbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
ikimisli giriş
betplay giriş
norabahis giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
betpark
betpark
Hitbet giriş
Bahsegel giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betnano giriş
betpuan giriş
betpuan giriş