सावरकर के विचार को संदर्भ सहित समझें

समग्र सावरकर ही समग्र राष्ट्र का पर्याय है

अनुच्छे (1)-कई हिंदुत्व प्रेमी और साथ ही हिंदू राष्ट्रवादी चिंतकों ने वीर सावरकर जी द्वारा 1936 में हिंदू महासभा के कर्णावती अहमदाबाद में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में दिये गये अध्यक्षीय भाषण के एक अंश पर गंभी आपत्ति प्रकट की है। इस आपत्ति पर विचार करते हुए प्रस्तुत लेख में यह समीक्षा करने का प्रयत्न किया गया है कि सावरकर जी के उक्त भाषण को संदर्भ सहित समझा जाए तो स्वत: सिद्घ हो जाएगा कि सावरकर केवल हिंदू राष्ट्र के ही प्रतिपादक थे और आपत्ति किये गये कथन हिंदू मुस्लिम दो राष्ट्र सिद्घांत का उन्होंने सदैव ही डटकर विरोध था।

अनुच्छेद (2) आपत्ति इस प्रकार है-

इस परिप्रेक्ष्य में सावरकर जी के 1936 के अहमदाबाद के हिंदू महासभा अधिवेशन में किये गये विधान को दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना होगा क्योंकि उसके कारण परोक्ष रूप में जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद का ही अनजाने, अनचाहे समर्थन हो गया। उन्होंने सावरकर जी  से कहा था- हम साहस के साथ वास्तविकता का समाना करें। भारत को आज एकात्म और एकरस राष्ट्र नही माना जा सकता प्रत्युत यहां दो प्रमुख राष्ट्र हैं-हिंदू और मुसलमान।

अनुच्छेद (3) उपर्युक्त उद्घरण विकलांग और गार्डिल्ड कोटेशन के रूप में इसके पूर्व के और बाद के संदर्भ को पूर्णतया काटकर प्रस्तुत किया है जिसके अर्थ का अनर्थ बन जाता है। अत: यह आवश्यक है कि कोई समीक्षा करने से पूर्व पूरे संदर्भ सहित भाषण को उद्घृत किया जाए जिससे सुधी पाठक स्वयं भी यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सावरकर ने किसी भी रूप में द्विराष्ट्रवाद का समर्थन नही किया और साथ ही उस से लोहा लेने और उसे उखाड़ फेंकने का आह्वान भी किया।

अनुच्छेद (4) सावरकर जी के भाषण का कथित अंश-संदर्भ सहित

प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए वीर सावरकर जी  ने कहा-

4 (क) मुस्लिम लीग द्वारा खुले रूप से चर्चित उस दुखसाइसी प्रस्ताव की ओर आपका ध्यान दिलाना आवश्यक पर्याप्त समझता हूं जिसमें मुसलमानों की इस मांग पर विचार हुआ है कि हमारी मातृभूमि को दो भागों में बांटा जाए मुस्लिम भारत व हिंदू भारत जिसका उद्देश्य एक पृथक मुस्लिम देश का निर्माण करना है जिसमें काश्मीर, पंजाब, पेशाबर, और सिंध प्रांत सम्मिलित हों।

(ख.) मुस्लिम लीग की इस देश विभाजन की मांग पर टिप्पणी करते हुए सावरकर जी ने आगे कहा इस प्रकार यदि तुम हिंदुओं को उनकी ही भूमि में दासों की स्थिति में रखना चाहिए कि औरंगजेब जैसे कईयों ने-जब वे यहां सम्राट के रूप में करते थे यह कलाबाजी की  पर वे असमर्थ रहे। और यह उद्देश्य पूरा करते करते वे स्वयं की कब्र खोदने में ही सफल हो पाए।

(ग.) अपने लंबे अध्यक्षीय भाषण में वीर सावरकर जी ने इसी मुस्लिम मनोवृत्ति का वास्तविक चित्रण स्मरण कराते हुए आगे कहा-‘मैं हिंदुओं को सावधान करता हूं कि जब कभी भी इंग्लैंड भारत छोड़ दे, हिंदू राष्ट्र और सामान्य रूप से भारतीय राज्य के प्रति  मुसलमान भयप्रद सिद्घ हो सकते हैं। इस तथ्य की ओर हम जड़ अंध न बने कि जाति के रूप में वे अभी भी भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना का जातिवादी आशय संजाए है। हम शांति के लिए कार्य करें, अधिक अच्छे की आशा करें, किंतु सावधान रहें।

अनुच्छेद 4 (क) (ख) (ग) में दिये गये संदर्भ के पश्चात भाषण का वह भाग प्रस्तुत है जिस पर कथित आपत्ति तथा भ्रांति की गयी है-

अनुच्छेद (5) भारत में दो विरोधी राष्ट्र रह रहे हैं।

जैसी कि स्थिति है भारत में दो विरोधी राष्ट्र साथ साथ रह रहे हैं। कई अपरिपक्व राजनीतिज्ञ यह समझने में गंभीर भूल करते हें कि भारत एक समग्र राष्ट्र में ढल चुका है अथवा चाहने मात्र से वह वैसा ढल जाएगा।

                क्रमश:

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