वैदिक धर्म के पुनरुद्धार एवं संरक्षक महर्षि दयानंद

IMG-20200604-WA0012

ओ३म्

=============
वैदिक धर्म एक मात्र धर्म है और अन्य सभी संगठन व संस्थायें मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि हैं। धर्म उसे कहते हैं जिसे मनुष्य अपने जीवन धारण करें। जिससे सभी मनुष्यों की उन्नति हो तथा उन्हें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति हो। सत्य को ही धारण किया जाता है असत्य को नहीं। सत्य ही धर्म का पर्याय शब्द है। जो सत्य नहीं वह धर्म कदापि नहीं हो सकता। सभी मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में अविद्या एवं असत्य पर आधारित मान्यतायें विद्यमान हैं। ऋषि दयानन्द ने मत-मतान्तरों के असत्य व अविद्या का अपने विश्व प्रसिद्ध सत्य मान्यताओं से युक्त ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में परिचय कराया है। अतः असत्य एवं अविद्या से युक्त कोई भी मत-पन्थ का ग्रन्थ धर्म ग्रन्थ कदापि नहीं हो सकता। ऋषि दयानन्द ने कहा है कि जिन ग्रन्थों यथा पुराणों आदि में असत्य व अविद्या विद्यमान है, वह सब विष सम्पृक्त अन्न के समान त्याज्य हैं। इसका कारण यह है कि ऐसे ग्रन्थों को पढ़ने व विश्वास करने से उन ग्रन्थों की अविद्या, असत्य व अन्य दोष भी उसके पाठक व अनुयायियों को लग जाते हैं जिससे उनकी उन्नति के स्थान पर अवनति होती है और उनका मनुष्य जन्म व भावी जन्म भी सुखों से दूर तथा दुःखों को भोगने में ही व्यतीत होते हैं। यही कारण है कि ऋषि दयानन्द ने वेदों की परीक्षा कर सत्योद्घाटन करते हुए कहा है कि वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है और सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेदों में अविद्या का नाम भी नहीं है। वेदों की भाषा संस्कृत भी संसार की सर्वोत्कृष्ट भाषा है और सभी भाषाओं जननी है। वेदों ने ही मनुष्य को बोलना सिखाया व जीवन को श्रेष्ठ सत्याचरण व धर्माचरण करना सिखाया। संसार में जितने भी मत-मतान्तर हैं उन सबके पूर्वज वैदिक धर्मी थे। अविद्या के कारण वह किसी काल खण्ड में वैदिक मत से दूर हो गये। सबका कर्तव्य है कि वह निष्पक्ष होकर सभी मत व सम्प्रदायों के सिद्धान्तों व मान्यताओं की परीक्षा करें और सत्य मत का ग्रहण और असत्य का त्याग करें। यही मनुष्य होने की कसौटी है। ऐसा न करने पर वह अपने सभी इष्ट-मित्र-बन्धुओं व कुटुम्बियों सहित अपने देश व समाज के बन्धुओं की हानि के दोषी होंगे।

ऋषि दयानन्द (1825-1883) के समय में देश देशान्तर में शुद्ध वैदिक धर्म लुप्त प्रायः था। वेद और सत्य वेदार्थ भी अप्राप्य थे। ईश्वर तथा आत्मा का सत्य स्वरूप भी लोगों को विदित नहीं था। कुछ ऐसे भी आचार्य व उनके अनुयायी थे जो आत्मा को ईश्वर का अंश मानते थे। उन्हें यह भी पता नहीं था कि आत्मा को ईश्वर का अंश मानने पर ईश्वर का खण्डित होना सिद्ध होता है जबकि ईश्वर हर काल में अखण्ड व एक रस रहता है। ईश्वर निराकार व सर्वव्यापक है परन्तु लोग अपनी अविद्या से ईश्वर को साकार तथा उसका अवतार मानते थे। कोई किसी से अपनी शंका व प्रश्न नहीं करता था। जन्मना जातिवाद ने तो वैदिक सनातन धर्मियों का घोर आत्मिक व बौद्धिक पतन किया था। धर्म व मत-मतान्तरों में सत्य व तर्क का कोई महत्व नहीं था। जो कोई सत्य व असत्य बात किसी मत का आचार्य कह देता था, सब उसको मान लेते थे। विदेशी शक्तियां वैदिक धर्म व संस्कृति को नष्ट कर उसे अपने-अपने मतों में मिलाने की गुप्त योजनायें बनायें हुए थीं जिनको योजनाबद्ध तरीकों से पूरा किया जा रहा था। ऐसे समय में ऋषि दयानन्द का आगमन हुआ।

ऋषि दयानन्द ने ईश्वर और जीवात्मा के सत्यस्वरूप तथा मृत्यु पर विजय के उपायों की खोज की। वह देश के प्रायः सभी प्रमुख धार्मिक स्थानों पर गये और वहां विद्यमान धार्मिक विद्वानों से मिले। उन्होंने अपनी सभी शंकायें उन विद्वानों के सम्मुख प्रस्तुत की और उनसे समाधान प्राप्त करना चाहा। अधिकांश विषयों में उन्हें निराश होना पड़ा। इस धर्म अनुसंधान के कार्य में उन्हें जहां जो भी प्राचीन व नवीन ग्रन्थ मिले, उन्होंने उन सबका अध्ययन किया। इस अध्ययन से उनकी आत्मा को सत्य ज्ञान के प्राप्त न होने से उन्हें सन्तोष न हुआ। वह योग के विद्वानों को प्राप्त हुए और उनसे योग विद्या प्राप्त की। दो योग गुरुओं आचार्य ज्वालानन्द पुरी तथा शिवानन्द गिरी जी ने उन्हें योग के अत्यन्त दुर्लभ रहस्यों से परिचित व पारंगत कराया। वह उनके मार्गदर्शन में समाधि अवस्था को प्राप्त करने में सफल हुए। समाधि को प्राप्त होकर भी विद्या प्राप्ति की उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई थी।

ऋषि दयानन्द को अपने एक पूर्व गुरु स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से वेद विद्या के मर्मज्ञ विद्वान मथुरा निवासी प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी का पता मिला था। उन्होंने उनके पास जाकर उनसे अध्ययन करने की प्रेरणा भी की थी। उन्हीं दिनों सन् 1857 में देश में स्वतन्त्रता के लिये प्रथम संग्राम हुआ। इसके बाद सन् 1860 में स्वामी दयानन्द जी गुरु विरजानन्द जी को प्राप्त हुए और उनसे तीन वर्ष वेदांग व्याकरण का अध्ययन पूरा किया। इस अध्ययन से स्वामी दयानन्द अविद्या व विद्या के भेद को जान सके। संसार में सभी मनुष्यों के दुःखों का मूल कारण अविद्या को जानकर वह अपने गुरु विरजानन्द सरस्वती जी की प्रेरणा से अविद्या से सर्वथा रहित तथा सब सत्य विद्याओं के ग्रन्थ वेदों का प्रचार प्रसार करने में प्रवृत्त हुए। सन् 1863 से आरम्भ कर अपनी मृत्यु के दिन 30 अक्टूबर, सन् 1883 तक का उनका जीवन वेद प्रचार द्वारा देश व समाज से अविद्या, अधर्म, अन्याय, शोषण, अत्याचार, अन्धविश्वास, पाखण्ड, मिथ्या परम्पराओं तथा सामाजिक भेदभाव दूर करने में व्यतीत हुआ।

गुरु विरजानन्द सरस्वती की पाठशाला में अध्ययन पूरा कर स्वामी दयानन्द ने कुछ महीने आगरा में रहकर अपनी वेद प्रचार योजना को अन्तिमरूप दिया। आपने वेदों को प्राप्त किया और उनकी परीक्षा की। यह सुनिश्चित हो जाने पर कि वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान, सब सत्य विद्याओं के ग्रन्थ व धर्म शास्त्र हैं, उन्होंने वेदों का प्रचार आरम्भ किया। वेदों में ईश्वर व आत्मा सहित तृण से लेकर परमेश्वर पर्यन्त सभी पदार्थों का सत्यस्वरूप व ज्ञान प्राप्त होता है। आपने पाया कि हिन्दू मत में प्रचलित अवतारवाद अथवा ईश्वर का जन्म लेने की मान्यता सहित ईश्वरोपासना के लिये मूर्तिपूजा वेद, ज्ञान, तर्क एवं युक्ति के विरुद्ध है। आपने अपने प्रचार कार्य में ईश्वर के अवतार तथा मूर्तिपूजा विषयक अपने विचारों को विद्वानों सहित साधारण जनता तक पहुंचाया। काशी के पण्डितों को मूर्तिपूजा के वेदानुकूल न होने पर शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी। 16 नवम्बर, 1869 को काशी में शास्त्रार्थ हुआ। एक ओर स्वामी दयानन्द वैदिक धर्म के अकेले प्रतिनिधि थे और दूसरी ओर देश के शीर्ष 30 से अधिक पौराणिक मूर्तिपूजक विद्वान थे। ऋषि दयानन्द प्रतिपक्षी विद्वान मूर्तिपूजा के समर्थन में वेद का एक भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके और ऋषि दयानन्द को विषयान्तर ले जाकर अन्य अन्य चर्चायें करते रहे। इस शास्त्रार्थ में ऋषि दयानन्द विजयी हुए। इसके बाद ऋषि दयानन्द ने वेदविरुद्ध सभी मान्यताओं व विचारों का खण्डन तथा वेदानुकूल मत का मण्डन देश भर में मौखिक प्रचार के द्वारा किया। देश में हजारों की संख्या में उनके अनुयायी बन गये।

ऋषि दयानन्द ने वैदिक मान्यताओं के अध्ययन वा स्वाध्याय के लिये सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय सहित ऋग्वेदभाष्य (अपूर्ण) तथा सम्पूर्ण यजुर्वेद भाष्य की संस्कृत व हिन्दी भाषाओं में रचना की। उनके उत्तरवर्ती अनुयायी विद्वानों ने वेदों के शेष भाग का भाष्य व टीका को भी पूरा किया। इसके साथ ही ऋषि दयानन्द ने अपने समाज हितैषी विद्वान अनुयायियों की प्रार्थना पर एक वेद प्रचारक संगठन ‘‘आर्यसमाज” की स्थापना भी की। ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों द्वारा देश में अपूर्व धर्म प्रचार हुआ। आर्यसमाज एवं ऋषि दयानन्द के देश में सर्वत्र भ्रमण द्वारा भी वैदिक धर्म का प्रचार हुआ। आर्यसमाज के समाज सुधार कार्यों सहित आर्यसमाज द्वारा संचालित शिक्षा आन्दोलन से देश भर में वैदिक धर्म का प्रचार एवं वेदों का उद्धार हुआ। वेदों का महत्व जानकर सभी मतों के विद्वान वेदों की शरण में आये जिससे वेदों की सर्वोपरि महत्ता एवं उपादेयता सिद्ध हुई। विधर्मियों द्वारा छल, बल व लोभ से किये जाने वाले हिन्दुओं के अन्य मतों में धर्मान्तरण पर भी रोक लगी। ऋषि के विचारों से प्रेरणा पाकर देश में स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिये आन्दालेन हुआ जिसमें सबसे अधिक संख्या व वैचारिक योगदान उनके शिष्यों पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा, महादेव गोविन्द रानाडे, स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द, पं. राम प्रसाद बिस्मिल, शहीद भंगत सिंह आदि बलिदानियों ने किया। यह भी बता दें कि वीर सावरकर सहित सभी क्रान्तिकारी ऋषि दयानन्द के शिष्य पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा के शिष्य थे और गांधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले भी महादेव गोविन्द रानाडे के शिष्य थे। श्री रानाडे ऋषि दयानन्द के साक्षात् शिष्य थे। समाज सुधार तथा अन्धविश्वासों को दूर करने में भी ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने इतिहास में अपनी सर्वोपरि भूमिका निभाई है। यदि ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज न होते तो वैदिक सनातन धर्म व हिन्दू कहे जाने वाले हमारे धर्मबन्धुओं का रक्षण व पोषण असम्भव था। ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के सभी सनातन धर्म के बन्धु ऋणी हैं और सदैव ऋणी रहेंगे।

ऋषि दयानन्द के जीवनकाल में वेद और शुद्ध वैदिक धर्म विलुप्त हो चुके थे। भारत विश्वगुरु होने का अपना महत्व भी भूल चुका व खो चुका था। ऋषि दयानन्द ने वेदों का प्रचार कर वेदों की सभी मान्यताओं को तर्क व युक्ति पर प्रतिष्ठित किया और भारत को विश्व गुरु का गौरवरपूर्ण स्थान पुनः प्रदान कराया। आज वेद एक सर्वांगपूर्ण एवं सत्य धर्म के रूप में प्रतिष्ठित है। वेदों की सभी मान्यतायें ज्ञान व विज्ञान के सभी नियमों के अनुकूल तथा तर्क एवं युक्तियों पर आधारित हैं। वेद की सभी मान्यतायें अकाट्य एवं अखण्डित हैं। ईश्वर व आत्मा का सत्य स्वरूप समूचे विश्व में सुलभ है। ईश्वर की उपासना की सत्य विधि का प्रचार भी ऋषि दयानन्द ने किया। उन्होंने ही उपासना की विधि लिखकर हमें प्रदान की है। वायु एवं जलशोधक, आरोग्यप्रद एवं रोगनिवृत्ति के आधार अग्निहोत्र यज्ञ को भी ऋषि दयानन्द ने ही प्रवृत्त व प्रचलित किया तथा इनकी विधि भी उन्होंने ही हमें प्रदान की है। जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां ऋषि दयानन्द ने वेदों के आधार पर उसका ज्ञान व विवेकपूर्ण समाधान न किया हो। आज वैदिक धर्म सुरक्षित एवं सुदृढ़ है। इसको यदि हानि हो रही है तो अपने ही अविद्याग्रस्त व सत्य का ग्रहण न करने वाले बन्धुओं से हो रही है। यदि सभी हिन्दू व अन्य मतस्थ लोग अपने मतों को सत्यासत्य की कसौटी पर कसने का प्रयत्न करेंगे तो वेद ही सत्य की कसौटी पर पूरे उतरेंगे। यह विवेकपूर्ण वचन हमें ऋषि दयानन्द से प्राप्त हुए हैं। ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने ही वेदों का उद्धार किया। उन्होंने ही वैदिक धर्म की रक्षा की। सत्याचरण, ईश्वरोपासना तथा वायुशोधक अग्निहोत्र यज्ञ का प्रचार करने सहित देश व समाज से अविद्या, असत्य, अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीतियों, सामाजिक असमानता, भेदभाव, अन्याय, अत्याचार तथा शोषण को दूर किया है। उन्होंने ही छल-बल-लोभ से होने वाले धर्मान्तरण पर विराम लगाया था। ऋषि दयानन्द के देश, समाज तथा धर्म रक्षा में योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। जब तक सृष्टि में सूर्य, चन्द्र व पृथिवी विद्यमान है, ऋषि दयानन्द का नाम व यश अमर रहेंगे। ओ३म् स्वस्ति।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

İmajbet giriş
İmajbet giriş
Safirbet giriş
Safirbet giriş
İmajbet giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
betpark giriş
Hitbet giriş
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
hitbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
casibom
casibom
casibom giriş
casibom giriş
casibom
casibom
hititbet giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
yakabet giriş
bahisfair giriş
bahisfair
betnano giriş
betorder giriş
betorder giriş
timebet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
timebet giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
hititbet giriş
betorder giriş
betorder giriş
vaycasino
vaycasino
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
kolaybet giriş
betpark
betpark
vaycasino
vaycasino
betgaranti
casibom
casibom
casibom
casibom
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
casibom giriş
betplay giriş
betplay giriş
roketbet giriş
casibom giriş
casibom giriş
betorder giriş
betorder giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
fixbet giriş
fixbet giriş
fixbet giriş
fixbet giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
casibom güncel giriş
casibom giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
betpark