डूब जाओ आनंद के गहरे सागर में

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आर्य जगत के सुप्रसिद्ध विद्वान और भजनोपदेशक रहे नत्था सिंह जी ने बहुत सुंदर भजन बनाया है , जिसे वे अक्सर गाया करते थे । उसे मैं यहां पर यथावत प्रस्तुत कर रहा हूं :-

गर जन्म लिया है तो तुझे मरना ही पड़ेगा।
वह काम किया है तो यह करना ही पड़ेगा।

इच्छाओं से लिपटा है वह डरता है कजा से।
चाहता है कि मैं बादशाह बन जाऊं गदा से।
तो इस मौत के कुएं में उतरना ही पड़ेगा।।१।।

इस जीभ वाले ने न कोई जीव छोड़ा।
दमड़ी के लिए लोगों की चमड़ी को निचोड़ा।
इस करनी का फल तो लाजिमी भरना ही पड़ेगा।। २।।

निर्दोष हिरण बकरे को क्यों चीर वा फाड़ा।
मासूम कबूतर ने था क्या तेरा बिगाड़ा।
बदले में यह तन सूली पर धरना ही पड़ेगा ।।३।।

आवागमन के रहा ना हम वार बनाएं ।
पापों के पत्थरों से यह दुश्वार बनाये ।।
उन घाटियों से अब तो गुजर ना ही पड़ेगा।। ४।।

अभिमान में ना तू बात करता किसी से।
औरों को डराता है ना डरता किसी से।
यमराज के डंडे से तो डरना ही पड़ेगा ।। ५।।

मन मार मिटा चाहिए जप नाम हरि का।
मुक्ति का “नत्था सिंह” है बस यही तरीका।।
भव सिंधु को इस तौर से तरना ही पड़ेगा ।।६।।

वैदिक विद्वान और कवि नत्थासिंह जी ने यहां पर जनसाधारण के लिए बहुत अच्छा रास्ता बताया है। साथ ही वर्तमान संसार की दुर्गति का कारण भी बताया है कि शाकाहार को छोड़कर मांसाहारी बना मानव अपनी मौत का रास्ता अपने आप तय कर रहा है । अपने पैरों पर अपने आप कुल्हाड़ी मारकर अपने अस्तित्व को मिटाने की युक्तियों खोज रहा है । कवि का यह दर्द आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था । विशेष रूप से तब जबकि सारा संसार कोरोनावायरस जैसी महामारी के चलते लॉक डाउन में बैठा हुआ है । तब तो सोचने के लिए विवश होना पड़ता है कि हमें अपने भारतीय ऋषियों के द्वारा बताए गए रास्ते पर ही चलना चाहिए । क्योंकि यह महामारी मनुष्य के मांसाहारी हो जाने के कारण और प्रकृति के संतुलन को मनुष्य द्वारा बिगाड़ने के कारण उपजी बीमारी है। मनुष्य की मनुष्यता आज भी पतित ही है उसका उत्थान किसी भी दिशा से होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा , सचमुच चारों ओर अंधेरा दिखाई देता है।
मनुष्य को छोटी से छोटी दिखने वाली बात को छोटा नहीं समझना चाहिए । क्योंकि बालू के कणों से पर्वत और छोटे-छोटे क्षणों से वर्ष बनते हैं और छोटी-छोटी अच्छी बातों से अच्छा जीवन बनता है।
इंद्रियों का निग्रह करने से , राग द्वेष पर विजय प्राप्त करने से और प्राणी मात्र के प्रति अहिंसक रहने से साधक लोग अमरत्व प्राप्त करते हैं।
एक मनुष्य को कम से कम प्रतिज्ञा करनी चाहिए। अधिक प्रतिज्ञाएं वैसे ही विनाशकारी होती हैं जैसे महाभारत काल में कहीं भीष्म की प्रतिज्ञा तो कहीं अर्जुन की प्रतिज्ञा , कहीं कृष्ण की प्रतिज्ञा और कहीं किसी अन्य व्यक्ति की प्रतिज्ञाओं ने सर्वनाश करा दिया था। सदा सत्य बोलना चाहिए। सत्संग करो नहीं तो अकेले में रहना चाहिए। मादक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। सच्चरित्रता दूसर सभी गुणों से श्रेष्ठ है ।अपनी गुप्त बात किसी से मत कहो ।जहां तक हो ऋण मत लो।
यदि एक मनुष्य कोई अवसर गंवा दे तो दूसरे अवसर को आंसू बहाने में मत बहा देना। जो कण कण में रमा हुआ है उस ईश्वर के तप से जो आनंदित है वहीं मानव कहलाने के योग्य है। यदि मोक्ष व ईश्वर की प्राप्ति ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य है तो क्यों हम सारी जिंदगी द्वेष, भेदभाव ,अहंकार के कृत्रिम अलंकारों का वर्णन किए रहते हैं ।कलयुग के कीचड़ में भी सतयुगी जीव रूपी कमल खिल पाना असंभव है । इस भ्रम को तोड़ने का हम प्रयास क्यों नहीं करते ? आदि, मध्य और अंत की सीमाओं से मुक्त ईश्वर का चिंतन छोड़कर नश्वर इच्छाओं की पूर्ति को आतुर जीव फिर कैसे भला मोक्ष प्राप्त कर सकता है ? प्रतिक्षण तनाव बेचैनियां , असंतोष से पीड़ित अपने अंतर्मन से यह प्रश्न पूछ कर देखिए उसी पल को आत्मचिंतन का बीज अंकुरित हो उठेगा ।
आत्म चिंतन की वह प्रक्रिया ही वह अवस्था है जिसमें आदमी अपने हृदय को अपने आप खाता है । सचमुच उस भोजन में बड़ा आनंद आता है जब आदमी अपने ही हृदय को अपने आप ही खाने लगता है । हृदय को अपने आप ही खाने का अभिप्राय है कि अपने आपसे अपने आप वार्तालाप करना , अपने आपसे स्वयं पूछना कि मैं कितना सही हूँ ? मैं कौन हूं ? कहां से आया हूं ? क्या कर रहा हूं ? क्या करना चाहिए था ? आदि आदि प्रश्नों को लेकर जब आत्मचिंतन के उस गहरे सागर में व्यक्ति उतरता है तो बहुत कुछ ऐसे मोती उसे प्राप्त होते हैं जो समुद्र की अनंत गहराइयों में जाकर ही प्राप्त हो पाते हैं । तब उसे पता चलता है कि आनंद रस क्या है ? और उस आनंद रस के लिए एकांत का आत्मचिंतन कितना सहायक होता है ?

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत

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