महाराणा प्रताप सिंह के पिता राणा उदय सिंह के साथ इतिहास में न्याय नही किया गया। सचमुच उनकी आत्मा आज तक हमारे द्वारा अपने साथ किये गये व्यवहार को लेकर दुखी होगी। हमने राणा उदय सिंह को बहुत ही ‘दुर्बल और कायर’ राणा सिद्घ करके रख दिया है। महाराणा प्रताप के प्रति जहां असीम श्रद्घा हमने प्रकट की है वहीं राणा उदय सिंह के प्रति हम उतने ही नीरस हो गये हैं। इस नीरसता पूर्ण उपेक्षा भाव के लिए कई बातें उत्तरदायी हैं। जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है।

राणा उदय सिंह
राणा संग्राम सिंह उपनाम राणा सांगा एक बहुत ही वीर शासक थे। परिस्थितियों ने उनकी मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र कुंवर उदय सिंह को वीरमाता पन्नाधाय के संरक्षण में रहने के लिए विवश कर दिया। माता पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर ‘मेबाड़ के अभिशाप’ बने बनवीर से मेवाड़ के भविष्य के राणा उदय सिंह की प्राण रक्षा की और उसे सुरक्षित रूप में किले से निकालकर बाहर ले गयी। तब चित्तौड़ से काफी दूर राणा उदय सिंह का पालन पोषण आशाशाह नाम के एक वैश्य के घर में हुआ। हमें इतिहासकारों ने बताया है कि माता पन्नाधाय के बलिदान की देर सवेर जब चित्तौड़ के राजदरबार के सरदारों को पता चली तो उन्होंने बनवीर जैसे दुष्ट शासक से सत्ता छीनकर राणा सांगा के पुत्र राणा उदय सिंह को सौंपने की रणनीति बनानी आरंभ कर दी। उसी रणनीति के अंतर्गत राणा उदय सिंह को चित्तौड़ लाया गया। राणा के आगमन की सूचना जैसे ही बनवीर को मिली तो वह राजदरबार से निकलकर सदा के लिए भाग गया इससे राणा उदय सिंह ने निष्कंटक राज्य करना आरंभ किया। यह घटना 1542 की है। यही वर्ष अकबर का जन्म का वर्ष भी है।
राणा उदय सिंह की मृत्यु 1572 में हुई थी। उस समय उनकी अवस्था 42 वर्ष थी और उनकी विभिन्न रानियों से उन्हें 24 लड़के थे। उनकी सबसे छोटी रानी का लड़का जगमल था, जिससे उन्हें असीम अनुराग था। मृत्यु के समय राणा उदय सिंह ने अपने इसी पुत्र को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। लेकिन राज्य दरबार के अधिकांश सरदार लोग यह नही चाहते थे कि राणा उदय सिंह का उत्तराधिकारी जगमल जैसा अयोग्य राजकुमार बने। राणा उदय सिंह के काल में पहली बार सन 1566 में चढ़ाई की थी, जिसमें वह असफल रहा। इसके बाद दूसरी चढ़ाई सन 1567 में की गयी थी और वह इस किले पर अधिकार करने में इस बार सफल भी हो गया था। इसलिए राणा उदय सिंह की मृत्यु के समय उनके उत्तराधिकारी की अनिवार्य योग्यता चित्तौड़ गढ़ को वापस लेने और अकबर जैसे शासक से युद्घ करने की चुनौती को स्वीकार करना था। राणा उदय सिंह के पुत्र जगमल में ऐसी योग्यता नही थी इसलिए राज्य दरबारियों ने उसे अपना राजा मानने से इंकार कर दिया।
फलस्वरूप राणा उदय सिंह की अंतिम क्रिया करने के पश्चात राज्य दरबारियों ने राणा जगमल को राजगद्दी से उतारकर महाराणा प्रताप को उसके स्थान पर बैठा दिया। इस प्रकार एक मौन क्रांति हुई और मेवाड़ का शासक राणा उदय सिंह की इच्छा से न बनकर दरबारियों की इच्छा से महाराणा प्रताप बने। इस घटना को इसी रूप में अधिकांश इतिहासकारों ने उल्लेखित किया है। हमें इसी घटना से एक बात स्पष्टï हो जाती है कि महाराणा प्रताप और उनके पिता राणा उदय सिंह के बीच के संबंध अधिक सौहार्दपूर्ण नही थे। महाराणा प्रताप ने जब अपने पिता राणा उदय सिंह के द्वारा अपने छोटे भाई जगमल को अपना उत्तराधिकारी बनाते देखा तो कहा जाता है कि उस समय उन्होंने संन्यास लेने का मन बना लिया था। लेकिन राज्यदरबारियों की कृपा से उन्हें सत्ता मिल गयी और वह मेवाड़ाधिपति कहलाए। महाराणा प्रताप मेवाड़ के अधिपति बन गये तो उनके मानस को समझकर कई कवियों और लेखकों ने महाराणा संग्राम सिंह और महाराणा प्रताप के बीच खड़े राणा उदय सिंह की उपेक्षा करनी आरंभ कर दी। जिससे राणा उदय सिंह के साथ कई प्रकार के आरोप मढ़ दिये गये। जिससे इतिहास में उन्हें एक विलासी और कायर शासक के रूप में निरूपति किया गया है। परंतु इतिहास की घटनाओं का सूक्ष्मता से अनुशीलन करने की आवश्यकता है। सौभाग्य की बात है कि नये अनुसंधानों से यह बात स्पष्ट हो रही है कि राणा उदय सिंह के साथ जो कुछ किया गया है उसमें अति हो गयी है। अब हम नये अनुसंधानों पर विचार करते हैं। 1567 में जब चित्तौड़ गढ़ को लेकर अकबर ने इस किले का दूसरी बार घेराव किया तो यहां राणा उदय सिंह की सूझबूझ काम आयी। अकबर की पहली चढ़ाई को राणा ने असफल कर दिया था। पर जब दूसरी बार चढ़ाई की गयी तो लगभग छह माह के इस घेरे में किले के भीतर के कुंओं तक में पानी समाप्त होने लगा। किले के भीतर के लोगों की और सेना की स्थिति बड़ी ही दयनीय होने लगी। तब किले के रक्षकदल सेना के उच्च पदाधिकारियों और राज्य दरबारियों ने मिलकर राणा उदय सिंह से निवेदन किया कि राणा संग्राम सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में आप ही हमारे पास हैं, इसलिए आपकी प्राण रक्षा इस समय आवश्यक है। अत: आप को किले से सुरक्षित निकालकर हम लोग शत्रु सेना पर अंतिम बलिदान के लिए निकल पड़ें। तब राणा उदय सिंह ने सारे राजकोष को सावधानी से निकाला और उसे साथ लेकर पीछे से अपने कुछ विश्वास आरक्षकों के साथ किले को छोड़कर निकल गये। अगले दिन अकबर की सेना के साथ भयंकर युद्घ करते हुए वीर राजपूतों ने अपना अंतिम बलिदान दिया। जब अनेकों वीरों की छाती पर पैर रखता हुआ अकबर किले में घुसा तो उसे शीघ्र ही पता चल गया कि वह युद्घ तो जीत गया है, लेकिन कूटनीति में हार गया है, किला उसका हो गया है परंतु किले का कोष राणा उदय सिंह लेकर चंपत हो गये हैं। अकबर झुंझलाकर रह गया।
1567 की इस लड़ाई में यदि राणा उदय सिंह भी बलिदान हो गये होते तो क्या होता? इस प्रश्न पर कभी विचार नही किया गया। यदि राणा उदय सिंह भी बलिदान हो जाते तो हमें उदयपुर नाम की नई राजधानी कभी बसी हुई नही दिखती, चित्तौड़ के लिए उदयपुर के महलों से कभी संघर्ष की ज्योति जलती भी नही दीखती और बहुत संभव है कि महाराणा प्रताप का स्थान भी तब आज के महाराणा से सर्वथा विपरीत ही होता। क्योंकि राणा उदय सिंह ने जिस प्रकार किले के बीजक को बाहर निकालने में सफलता प्राप्त की वह उनकी सूझबूझ और बहादुरी का ही प्रमाण है। यदि राणा उदय सिंह कायर होते तो वह किले से अकेले भागते और फिर कहीं अरावली की पहाडिय़ों में भटक भटककर मर जाते। परंतु वह कुछ विश्वस्त सैनिकों ने राज्यदरबारियों और साथियों को बीजक सहित बाहर निकालकर लाने में भी सफल रहे। यह बीजक या राजकोष कितना भारी था इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इसी धन से एक नयी राजधानी ही बसा डाली और वहां रहकर अगले 5 वर्ष तक शेष बचे मेवाड़ पर शासन भी किया। अपने बीजक की देखभाल का दायित्व उन्हेांने अपने पिता राणा संग्राम सिंह के विश्वासपात्र रहे भामाशाह को दिया। समकालीन इतिहास में संभवत: ऐसे उदाहरण मिलने दुर्लभ हैं जब किसी शासक ने अपना एक किला इस प्रकार राज्यकोष से खाली किया और दूसरी जगह जाकर नई राजधानी बनाकर वहां से शासन किया। जहां तक राणा उदय सिंह के द्वारा राज्यदरबारियों के परामर्श को मानकर किले को छोडऩे की घटना में उनकी दुर्बलता को देखने की बात है तो यह कोई गलत बात नही थी। महाराणा प्रताप जब 1576 में हल्दीघाटी की लड़ाई लड़ रहे थे तो उस समय सरदार झाला ने भी अपना छत्र उन्हें देकर युद्घ के मैदान से बाहर निकलने के लिए विवश कर दिया था, जिसे महाराणा प्रताप ने स्वीकार कर लिया था। ऐसी ही सलाह को यदि राणा उदय सिंह ने भी स्वीकार कर लिया था तो क्या गलत हो गया था? राणा उदय सिंह ने 1566 में अकबर को एक बार परास्त भी किया था परंतु अगले ही वर्ष अकबर विभिन्न राजपूत शक्तियों को साथ जोड़कर जब पुन: आ धमका तो निरंतर छह माह तक इस चढ़ाई का दिलेरी से सामना करते हुए रहकर भी अंतिम विकल्प मौत ही नजर आ रही थी जिसे अपनाकर देश और मेवाड़ का लाभ होने वाला नही था। नये अनुसंधानों से अनुसंधानकर्ता इतिहासकारों ने ऐसे तथ्य भी दिये हैं कि भामाशाह ने महाराणा प्रताप को कभी कोई दान नही दिया था। रायबहादुर गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने अपनी पुस्तक ‘वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप’ में इन तथ्यों की अच्छी जानकारी दी है। उन्होंने हमें बताया है कि भामाशाह के पिता भारमल भी राणा वंश के अच्छे स्वामी भक्त थे। ये लोग खजाने के व्यवस्थापक थे। राणा उदय सिंह ने चित्तौड़ गढ़ को छोड़ते समय भामाशाह को अपने साथ लिया था। उक्त लेखक हमें बताते हैं कि चित्तौड़ पर विक्रमादित्य के समय गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने दो चढ़ाईयां की थी, महाराणा उदय सिंह के समय में अकबर ने आक्रमण किया। बहादुर शाह की पहली चढ़ाई के समय युद्घ से पूर्व ही राज्य की सारी संपत्ति चित्तौड़ से हटा ली गयी। जिससे बहादुरशाह और अकबर में से एक को भी चित्तौड़ विजय के समय कुछ भी हाथ नही लगा। यदि कुछ हाथ लगता तो अबुलफजल जैसा खुशामदी लेखक तो राई का पहाड़ बनाकर लिखता। परंतु फारसी तवारीखों में उसका उल्लेख न होना इस बात का प्रमाण है कि उन्हें चित्तौडग़ढ़ में कोई खजाना हाथ नही लगा था। हमारा मानना है कि उदयसिंह और विक्रमादित्य के बीच में जितनी देर बनवीर चित्तौड़ का शासक रहा उतनी देर उसने बिना खजाने के शासन नही किया होगा। इसलिए श्री ओझा जी के इस कथन से हम असहमत हैं कि सारा राज्यकोष बहादुरशाह की चढ़ाई के समय ही निकाल लिया गया था। सारा राज्यकोष तो राणा उदय सिंह के साथ ही गया। हां, बहादुरशाह को कोई कोष किले में हाथ नही लग पाया हो, यह तो भामाशाह जैसे कुशल व्यवस्थापक के कारण संभव है। कर्नल टाड ने भी हमें बताया है कि भामाशाह अपने इसी महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह महाराणा प्रताप के काल तक करता रहा। ओझा जी हमें बताते हैं कि भामाशाह अपनी एक वही अपने पास रखता था और उसमें अपने गुप्त राज्यकोष की जानकारी रखता था। समय आने पर वह इन गुप्त स्थानों से द्रव्य ले लिया करता था। उसे वह राष्ट्र की संपत्ति माना करता था। जब महाराणा प्रताप को आवश्यकता पड़ी तो इस वृद्घ राष्ट्रभक्त ने एक बीजक की चाबी अपने स्वामी के पास अपनी पत्नी के द्वारा भिजवा दी थी। कर्नल टाड ने बताया है कि इस बीजक से महाराणा बारह साल तक 25 हजार सेना को लेकर युद्घ कर सकते थे। हमारा उद्देश्य भामाशाह की दानशीलता को कम करके आंकना नही है, वह तो राष्ट्रभक्त थे उनका कार्य तो श्लाघनीय ही है क्योंकि जिस कोष की जानकारी महाराणा प्रताप को भी नही थी, उसकी जानकारी देशभक्त भामाशाह ने सही समय पर महाराणा को दी तो यह उनकी राष्ट्रभक्ति ही थी।
लेकिन विशेष बात तो ये है कि इस गुप्त बीजक के पीछे भी राणा उदय सिंह की योजना छिपी थी। अत: तो उसकी उपेक्षा क्यों की जाए? यदि किन्हीं भी कारणों से पिता पुत्र में संवादहीनता रही तो क्या पिता के सत्कृत्य पर पूरी तरह पानी फेर दिया जाए? महाराणा प्रताप के विषय में भी हमें स्मरण रखना चाहिए कि वे भामाशाह से कभी उस की निजी धन संपदा को लेकर अपने भृत्य के धन से निर्वाह करने की भूल कदापि नही कर सकते थे। एक उदाहरण है राणा शक्ति सिंह और महाराणा प्रताप का जब हल्दीघाटी के युद्घ के बाद पुर्नमिलन हो गया तो शाहजादा सलीम की सेना से विधिवत बाहर निकलने के उपरांत शक्ति सिंह बड़े भाई से मिलने गये। रास्ते में विचार आया कि भाई को भेंट क्या दी जाए तो फसरूर के किले को विजय कर लिया और उसकी चाबी श्रीमान जी की सेवा में जा दी। जब राणा ने पूछा तो सब वृतांत कह सुनाया। तब महाराणा ने वह चाबी लेकर भी प्रेम से छोटे भाई को लौटा दी कि छोटों वनों दिया जा है उनसे कभी लिया नही जाता है। अत: महाराणा प्रताप, भामाशाह से कुछ ले नही सकते थे? उन्होंने तभी लिया होगा जब यह स्पष्ट हो गया होगा कि ये धन भामाशाह का नही अपितु उनके पिता का है। आज उस पिता को नमन करने की आवश्यकता है। बहुत अपमान हो चुका, अब यह समाप्त होना चाहिए, गलती के अनुपात में सजा का अनुपात रखना ही उचित होता है। राणा उदय सिंह ना होते तो अकबर की नींद हराम करने वाला महाराणा प्रताप कैसे पैदा होता और कैसे उस महाराणा को इतना बड़ा कोष हाथ लगता, तनिक इस पर भी विचार किया जाए और कैदी की स्थिति में खड़े राणा उदय सिंह को इतिहास के न्यायालय से ससम्मान रिहा किया जाए, अपने पाठकों से यही अनुरोध है। आशा है आप स्वीकार करेंगे।
साथ ही एक अनुरोध और भी है कि जो कुछ भी मेरे द्वारा आपकी सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है, उसमें बहुत सारी अल्पताएं हो सकती हैं, न्यूनताएं हो सकती हैं, उन्हें हमें पूर्ण करने के लिए आगे बढऩा है। ये लेख केवल संकेत मात्र हैं कि कहीं न कहीं कोई गलती है जिसे सुधारा जाए। उस सुधार के लिए आपके सुझाव नतमस्तक होकर स्वीकार करूंगा, इसलिए लेख को सही भाव से स्वीकार करने का आकांक्षी हूं। अपनी विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए आपका समय नष्ट नही करना चाहता और न ही आपके चिंतन पर अनावश्यक दबाव बनाना चाहता हूं।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
hititbet
hititbet
Tuzla İpek Kirpik
betnano
hititbet giriş
hititbet
betnano
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
hititbet
hititbet
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
hititbet giriş
xslot giriş
xslot giriş
betpark giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betkom giriş
betkom giriş
grandpashabet
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş