नदी संरक्षण से जुड़ा महाकुंभ

vijender-singh-aryaहजारों सालों से चली आ रही अपनी परम्परा के गौरवशाली इतिहास के अनुरूप एकबार फिर महाकुंभ का आरम्भ हो चुका है । वार्षिक कुम्भ का आयोजन तो प्रतिवर्ष किया जाता है, पर प्रत्येक बारह वर्ष में, एक विशेष ग्रह स्थिति आने पर, आयोजित होने वाले इस महाकुंभ का विशेष महत्व है । वहाँ उपस्थित प्रशासन की माने तो छप्पन दिन चलने वाले इस महाकुंभ के पहले दिन लगभग एक करोड़ लोगों ने इसमे डुबकी लगाई । और कुल मिलाकर दुनियाभर से लगभग सात करोड़ लोगों के इसमे शामिल होने की बात भी कही जा रही है । सांस्कृतिक तौर पर देखें तो भारतीय संस्कृति के समन्वयकारी स्वरुप का एक विराट दर्शन हमें इस महाकुंभ में होता है । जहाँ साधू-संतों से लेकर आम जन और नेता तथा विदेशी पर्यटकों तक का एक विशाल हुजूम उमड़ता है और ऊँच-नीच, जाति-धर्म, अमीरी-गरीबी के भेदभाव से मुक्त होकर महाकुंभ के स्नान का अक्षय पुण्य प्राप करता है महाकुंभ के विषय में अगर पौराणिक मान्यताओं पर गौर करें, तो मान्यता है कि समुन्द्र-मंथन से उत्पन्न अमृत के घड़े (कुम्भ) को असुरों से बचाने के लिए देवताओं ने बारह दिन तक समूचे ब्रह्मांड में छुपाया था, इस दौरान उन्होंने इसे धरती के जिन चार स्थानों पर रखा, वो ही चारो कुम्भ के आयोजन स्थल बन गए । इलाहाबाद और हरिद्वार में गंगा का तट तथा नासिक की गोदावरी और उज्जैन की क्षिप्रा के तट, ये कुम्भायोजन के चार स्थल हैं । इन चारों स्थानों पर कुम्भ के आयोजन के लिए ज्योतिष की तमाम अवधाराणाएं हैं । जिनके अनुसार जब जीवनवद्र्धक ग्रहों का स्वामी बृहस्पति किसी जीवनसंहारक ग्रह की राशि में प्रवेश करता है, तो इस संयोग को शुभ तिथी के रूप में माना जाता है और इसी क्रम में एक समय ऐसा भी आता है जब बृहस्पति का प्रवेश जीवनसंहारक ग्रहों के प्रधान शनि की राशि कुम्भ में होता है और इसका प्रभाव बिंदु हरिद्वार बनता है । इस स्थिति में कुम्भायोजन हरिद्वार में होता है । ठीक इसी प्रकार बृहस्पति का शुक्र में और सूर्य-चन्द्र का शनि की मकर राशि में प्रवेश इलाहाबाद के लिए महाकुम्भ का योग बनाता है और यही वो समय भी होता है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं, जिसे शुभ मानते हुवे मकर संक्रांति के रूप में मनाया भी जाता है । कुछ इसी प्रकार जब बृहस्पति का प्रवेश सूर्य की सिंह राशि में होता है, तो ये संयोग नासिक की गोदावरी के लिए कुम्भायोजन का सुयोग उत्पन्न करता है । बृहस्पति की सिहंस्थ स्थिति में ही अगर सूर्य मेष राशि और चंद्रमा तुला राशि में पहुँच जाए, तो ये उज्जैन के लिए कुम्भ के आयोजन का संकेत होता है । सामान्य जनों की समझ के लिए ये ज्योतिषीय अवधारणाएं निस्संदेह बड़ी ही जटिल प्रतीत होती हैं, पर पुरातन काल से इन्ही के आधार पर कुम्भ का आयोजन होते आ रहा है । यूँ तो इन चारो ही स्थानों का कुम्भस्नान फलदायी आस्था से पुष्ट है, पर इलाहाबाद के संगम तट का कुम्भस्नान इनमे भी श्रेष्ठ माना जा सकता है । क्योंकि यह गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम का वो अद्भुत स्थल है जिसके प्रति लोगों के मन में अनायास ही अनंत श्रद्धा का भंडार है, उसपर जब महाकुम्भ का शुभ योग बने तो कहना ही क्या । वैसे ज्योतिष-विज्ञान की इन मान्यताओं से अलग श्रद्धालु कल्पवासियों की अपनी एक सीधी और सरल मान्यता भी है कि सकारात्मक शक्तियों द्वारा नकारात्मक शक्तियों के दुष्प्रभाव को रोकने का एकजुट प्रयास ही कुम्भ की पृष्ठभूमि है । उनका मानना है कि महाकुंभ के स्नान से मानव के पाँप तो जाते ही हैं, साथ ही संसार की विपत्तियों का भी नाश होता है ।
चूंकि, पालक-पोषक होने के कारण और कुछ पौराणिक आस्थाओं के कारण भी, भारत में पुरातन काल से ही नदियों को माँ का स्थान प्राप्त है । इसे देखते हुवे महाकुंभ के विषय में बहुतों विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि प्राचीनकाल से निरंतर आयोजित हो रहे इस महाकुंभ का एक प्रमुख उद्देश्य नदी-संरक्षण भी है । और अगर हम स्वयं भी आस्था व अध्यात्म के दायरे से थोड़ा बाहर आकर तार्किकता से महाकुंभ के उद्देश्य पर विचार करें, तो विद्वानों का ये कथन काफी हद तक उचित व व्यवहारिक ही प्रतीत होता है । इसकी पूरी संभावना है कि पूर्वज ऋषि-मुनियों द्वारा नदियों के प्रति मातृगत आस्था का प्रतिस्थापन व उनमे स्नान को धर्म से जोडऩे का विधान, उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए ही किया गया होगा । पर इसे विडम्बना ही कहेंगे कि समय के साथ नदियों को मिला माँ का ये स्थान सिर्फ प्रतीकात्मकता तक सीमित रह गया है, यथार्थ के धरातल पर तस्वीर कुछ और ही है । स्थिति ये है कि आज औद्योगिक प्रगति के उत्साह में हम इतने मूढ़ होते जा रहे हैं कि उसके लिए अपनी नदियों की स्वच्छता तक से समझौता करने को तैयार हैं । औद्योगिक प्रगति की होड़ ने हमे इस कदर अंधा कर दिया है कि हम औद्योगिक प्रगति के प्रतीक बने तमाम औद्योगिक संस्थानों से निकसित दूषित तत्वों से अपनी नदियों को होने वाली हानि को भी नही देख पा रहे । इसके अतिरिक्त अबाध गति से बढ़ती जनसंख्या और उसके द्वारा किया जा रहा जल का अंधाधुंध इस्तेमाल भी नदियों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह ही लगाता है । इन्ही सबके बीच, बेशक भारत सरकार द्वारा नदियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के तहत नदियों के पानी की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रदूषण हटाने सम्बन्धी कार्य किए जा रहे हैं, पर बावजूद इसके नदियों की दशा का अनुमान इसीसे लगाया जा सकता है कि देश में प्रतिदिन 26 लाख लीटर दूषित तत्वों का उत्सर्जन नदियों में जा रहा है । जिससे दिन-प्रतिदिन नदियों का रंग बदलता जा रहा है । दुग्धांगी गंगा का कालापन इसका सबसे सशक्त प्रमाण है । नदियों के प्रदूषित होने के कारण ही अब लोग कुम्भ, छठ या अन्य किसी भी नदी-स्नान सम्बन्धी पर्व में स्नान की औपचारिकता मात्र ही निभाने लगे हैं और पूर्व की उस सच्ची श्रद्धा और उस उत्साह की हर तरफ कमी नजऱ आने लगी है ।इन सभी तथ्यों को देखते हुवे कुछ प्रश्न बड़े ही मुखरित ढंग से हमारे सामने आते हैं कि क्या हमारा दायित्व नदियों को सिर्फ प्रतीकात्मक रूप से माँ मानने, मन-बेमन उनमे नहाने व उन्हें पूजने तक ही रह गया हैं ? क्या व्यवहारिकता में उनके लिए हमारा कोई दायित्व नही बनता ? क्या उनकी समस्याओं की कुल जवाबदेही सिर्फ सरकार पर है ? कहीं ऐसा तो नही कि ये समस्या सरकार पर थोपकर हम अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं ? ये वो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनपर समय रहते अगर विचार नही किया गया तो हो सकता है कि आगे आने वाला समय ऐसा हो जब हमें कुम्भ या महाकुंभ के स्नान के लिए तो छोड़ो, पीने व सामान्य गृह स्नान के लिए भी शुद्ध व स्वच्छ जल न मिले । और वैसे वक्त के लिए हमारे पास न ही कोई भगीरथ है और न ही कोई गौतम । इसलिए आज जरुरत है कि हम खुद ही कुछ करें । जरूरत है कि हम जल की उपयोगिता को समझें और उसके दुरुपयोग से बचें । महाकुंभ में स्नान करने के साथ-साथ उसके सही उद्देश्य को भी समझें और अपनी नदियों के संरक्षण के लिए सरकार पर तो दबाव डालें ही, स्वयं भी प्रयास करें ।अगर हम ऐसा करते हैं तो ही हम सही मायने में महाकुंभ को जानने, समझने और मनाने वाले होंगे और तभी हमें ये अधिकार भी होगा कि हम नदियों को अपनी माँ कह सकें

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