स्वामी श्रद्धानंद जी का स्मारक गुरुकुल कुरुक्षेत्र – आर्य समाज की शान गुरुकुल कुरुक्षेत्र एवं आचार्य देवव्रत जी

ओ३म्

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आर्यसमाज का एक प्रसिद्ध गुरुकुल है गुरुकुल कुरुक्षेत्र। इस गुरुकुल की स्थापना आर्यसमाज के महान नेता एवं गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के पुरस्कर्ता स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी महाराज ने सन् 1913 में की थी। गुरुकुल से जुड़े हमारे एक मित्र श्री भोपाल सिंह आर्य जी ने आज फोन पर हमें बताया कि यह गुरुकुल लगभग 200 एकड़ भूमि में स्थित है। 30 एकड़ भूमि में गुरुकुल के भवन आदि हैं और शेष 170 एकड़़ भूमि में कृषि की जाती है। इस गुरुकुल के वर्तमान आचार्य ऋषिभक्त प्रसिद्ध विद्वान आचार्य देवव्रत जी हैं। आप इन दिनों गुजरात के राज्यपाल के महिमाशाली पद पर प्रतिष्ठित हैं। इससे पूर्व आप हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल भी रहे हैं। आपने इस गुरुकुल को आर्यजगत में गौरव एवं प्रसिद्धि दिलाई है। हमारी जानकारी के अनुसार साधनों की दृष्टि से यह गुरुकुल आत्मनिर्भर है। यह गुरुकुल आर्यसमाज को आगे बढ़ाने और वैदिक आर्य विचारधारा का प्रचार प्रसार करने के लिये अनेक योजनाओं व प्रकल्पों को जारी करने सहित उनका पोषण भी करता है। वर्तमान में इस गुरुकुल के अपने भव्य एवं विशाल भवन हैं जिन्हें गुगल पर सर्च कर देखा जा सकता है।

इस गुरुकुल का संक्षिप्त इतिहास यह है कि यह समस्त भूमि बाबू ज्योति प्रकाश जी की थी। यह व्यक्ति आर्यसमाजी नहीं थे परन्तु धर्मभाव से गहराई से जुड़े हुए थे। बाबू ज्योति प्रकाश जी निःसन्तान थे। एक बार उनके भतीजे बाबू ज्योति प्रकाश जी के पास खेत में आये और उनसे बोले कि आपकी कोई सन्तान नहीं है इसलिये आप अपनी समस्त भूमि हमारे नाम कर दो। बाद में तो यह समस्त भूमि हमें मिलनी ही है। बतातें हैं कि जिस लहजे में उनके भतीजे ने यह शब्द कहे, वह श्री ज्योति प्रकाश जी को अच्छे नहीं लगे। कुछ काल बाद सन् 1913 में हरिद्वार में कुम्भ का मेला आरम्भ हुआ। बाबू ज्योति प्रकाश जी अपने कुछ साथियों के साथ कुम्भ के मेले में आये। उन्हीं दिनों गुरुकुल कांगड़ी का वार्षिकोत्सव भी चल रहा था। इसकी सूचना मिलने पर बाबू ज्योति प्रकाश जी अपने साथियों के साथ वहां चले गये। उन्होंने गुरुकुल का उत्सव देखा जिससे वह अत्यन्त प्रभावित हुए। गुरुकुल के ब्रह्मचारियों के संस्कृत भाषण, उनके व्यायाम तथा अनेक आश्चर्यजनक करतबों को देखकर वह गुरुकुल के प्रशंसक हो गये। उन्होंने गुरुकुल में विद्वानों के जो उपदेश सुने, भजन सुने व अन्य कार्यक्रम देखे उनसे भी वह अत्यन्त प्रभावित हुए। उनकी आत्मा ने वैदिक धर्म की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया था। वह कांगड़ी में ही स्वामी श्रद्धानन्द जी से मिले और उन्हें कुरुक्षेत्र में गुरुकुल कांगड़ी जैसा एक गुरुकुल खोलने के लिये निवेदन किया।

स्वामी श्रद्धानन्द जी ने गुरुकुल के लिये भूमि एवं धन की आवश्यकता बताई। बाबू ज्योति स्वरूप जी ने अपनी समस्त 200 एकड़ भूमि गुरुकुल स्थापना के लिये स्वामी श्रद्धानन्द जी को प्रदान कर दी और इसके साथ आवश्यकता के अनुरूप धन भी उन्हें दिया। इस संयोग से कुरुक्षेत्र में स्वामी श्रद्धानन्द जी के कर-कमलों से गुरुकुल की स्थापना हो गई। दिन प्रतिदिन यह गुरुकुल उन्नति करता रहा और अब यह आर्यसमाज के गुरुकुलों में एक प्रसिद्ध गुरुकुल है। हमारा अनुमान है कि यहां संस्कृत की आर्ष व्याकरण प्रणाली एवं स्कूली शिक्षा के अनुसार बच्चों का निर्माण किया जाता है। यहां के बच्चों का शैक्षिक स्तर बहुत ऊंचा होता है और यहां प्रवेश के लिये बच्चों के माता-पिता लालायित रहते हैं। हमारी एक बार गुरुकुल देखने की इच्छा है जिससे हम गुरुकुल विषयक कुछ विस्तृत जानकारी प्राप्त कर उसे अपने मित्रों तक पहुंचा सकें। यह कब होगा या नहीं हो पायेगा, कह नहीं सकते। हमें इसका प्रस्ताव अपने मित्र से प्राप्त हुआ है। भविष्य में यदि संयोग बना तो हम इसके लिये प्रयत्न करेंगे।

आचार्य देवव्रत जी ऋषि दयानन्द के लिये मन, वचन एवं कर्म से समर्पित हैं। आप गुजरात के राज्यपाल बने तो आपने राज्यपाल पद की शपथ लेने के बाद सबसे पहली यात्रा गांधीनगर से टंकारा की ही की थी। वहां आपने सपत्नीक यज्ञ किया और लाखों रुपये ऋषि दयानन्द जन्म भूमि न्यास, टंकारा को प्रदान किये। इस वर्ष 21 फरवरी, 2020 को भी आप गुजरात के मुख्यमंत्री श्री विजय रुपाणी जी को अपने साथ लेकर टंकारा पहुंचे थे। दोनों नेताओं के ऋषिभक्ति से युक्त उद्बोधन हमने स्वयं सुने तथा उन्हें लेखों के माध्यम से भी प्रस्तुत किया। देश के प्रधानमंत्री श्री मोदी जी भी टंकारा को एक भव्य पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना चाहते हैं। इसकी विस्तृत योजना पर आचार्य देवव्रत जी और मुख्यमंत्री श्री विजय रुपाणी जी ने अपने टंकारा के सम्बोधनों में प्रकाश डाला। महाशय धर्मपालजी, एमडीएच भी ऋषि दयानन्द जन्म भूमि के विकास एवं सौन्दर्यीकरण के लिये 2-3 करोड़ रुपये व्यय करने की घोषणा कर चुके हैं। हम आशा करते हैं कि भविष्य में ऋषि दयानन्द की जन्म भूमि को वैदिक धर्म एवं संस्कृति के उद्धार सहित देश व समाज की उन्नति तथा देश की स्वतन्त्रता में उनके योगदान के अनुरूप विकसित किया जायेगा और यह स्थान विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होगा। इसके साथ हम यह भी चाहेंगे कि वहां आर्यसमाज की वर्तमान में ऋषि बोधोत्सव एवं गुरुकुल संचालन आदि गतिविधियां भी चलती रहें।

आचार्य देवव्रत जी जैविक कृषि के विशेषज्ञ हैं। उन्हांेने गुरुकुल कुरुक्षेत्र की 170 एकड़ भूमि में जैविक कृषि करके अनेक अनुभव प्राप्त किये हैं। उनको जैविक खेती का अच्छा ज्ञान एवं अनुभव है। हमें ज्ञात हुआ है कि कुरुक्षेत्र में एक जैविक खेती पर अनुसंधान कार्यों के लिए विश्वस्तरीय प्रयोगशाला की स्थापना भी होने को है। आचार्य जी ने हिमाचल प्रदेश में भी जैविक खेती के लिये सफल प्रयास किये थे। अब वह गुजरात में भी जैविक खेती विषयक क्रान्ति का आरम्भ करेंगे, ऐसा अनुमान करते हैं। हम आचार्य जी को अपने सभी कार्यों में सफलता के लिये अपनी हार्दिक शुभकामनायें देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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