अश्वमेधादिक रचाएं यज्ञ पर उपकार को , भाग 2

अध्याय 5

पांच महायज्ञ

गृहस्थ को पांच महायज्ञ के करने का विधान हमारे ऋषियों ने किया है। यह पंच महायज्ञ है:-ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ,अतिथियज्ञ और बलिवैश्वदेव यज्ञ । इनमे प्रथम है-ब्रह्मयज्ञ । ईश्वरोपासना और धर्म ग्रंथों के अध्ययन का नाम ब्रह्मयज्ञ है। ईश्वरीय गुणों का धारण और मोक्ष की ओर अग्रसरता आदि लाभ हैं।धर्मग्रंथों के अध्ययन से धार्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है।

दूसरे देवयज्ञ से अभिप्राय यज्ञ- करना और विद्वानों की संगति करने से हैं। हवन-यज्ञ से वायु और जल शुद्ध होते हैं। इससे आरोग्य,बुद्धि , बल और पराक्रम बढ़कर धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। विद्वानों के संग से सेवा , पवित्रता आदि दिव्य गुणों का धारण तथा विद्या की उन्नति होती है I

तीसरा यज्ञ है – पितृयज्ञ । पितृयज्ञ का अर्थ है माता-पिता और ज्ञानी महात्माओं की सेवा। ऐसा करने से सत्यासत्य का ज्ञान होता है और उससे सुख की प्राप्ति होती हैI इससे कृतज्ञता जैसे उच्च मानवीय गुणों का हमारे भीतर विकास होता है। कुछ लोगों ने इस पितृयज्ञ को मृतकों के श्राद्ध आदि तक ले जाकर भ्रष्टाचार कर दिया है। उन्होंने ऐसा इसलिए कर दिया है कि वे लोग श्राद्ध तर्पण का सही अर्थ नहीं समझ सके। जिस क्रिया से सत्य को ग्रहण किया जाए , उसे श्राद्ध और श्राद्ध से जो कर्म किया जाए उसे श्रद्धा कहते हैं, जबकि जिस कर्म से (जीवित)माता-पिता आदि पितर तृप्त हों , उसका नाम तर्पण है। यह श्राद्ध तर्पण जीवित माता-पिता के लिए है,मृत पितरों के लिए नहीं। इसी पितयज्ञृ में ही देवतर्पण और ऋषि तर्पण भी सम्मिलित है। विद्वानों को देव कहा जाता है।

33 करोड़ देवताओं का एक अर्थ यह भी

जिन तैंतीस कोटि (प्रकार के) देवताओं का उल्लेख हमारे यहां कुछ लोग किया करते हैं, उन्हें यदि कुछ देर के लिए तैंतीस करोड़ भी मान लिया जाए तो उनका अर्थ तैंतीस करोड़ की आर्यावर्त की उस की उस जनसंख्या से है जो सारी की सारी ही विद्वानों की थी। इसलिए हर व्यक्ति ही अपने आप में देव था। ऐसे विद्वानों और विदुषियों की सेवा करना ही देवतर्पण कहा जाता है। जबकि ऋषियों और ऋषिकाओं की सेवा करना ऋषि तर्पण कहा जाता है। इस प्रकार पितृयज्ञ में सेवा को अधिक महत्व दिया गया है। आजकल के सामाजिक परिवेश में से सेवाभाव को निकाल दिया गया है। हमारे यहां प्राथमिक विद्यालयों से ही अर्थात गुरूकुलीय शिक्षा प्रणाली में गुरूकुलों से ही बच्चों के भीतर सेवा का संस्कार उत्पन्न किया जाता था। घर में भी बच्चों को आने वाले अतिथियों की सेवा सत्कार का कार्य सौंपा जाता था, जिससे उनके भीतर सेवा का एक संस्कार पैदा होता था, बच्चे को अपना कार्य अपने आप कराने के लिए ही नही अपितु विद्यालयों की स्वच्छता आदि का भी कार्य दिया जाता था। बच्चे अपने वस्त्रादि तो धोते ही थे साथ ही उन्हें अपने आचार्यों व प्राचार्य के वस्त्रादि भी धोने होते थे। इससे भी उनके भीतर सेवा का एक संस्कार जन्मता था जो आजीवन उनका साथ देता था। जिससे समाज सेवा और राष्ट्रसेवा को वे बच्चे नि:स्वार्थ भाव से करते थे।

हमारे शिक्षार्थियों से उनके आचार्य लोग प्राचीनकाल में भिक्षाटन भी कराते थे। इससे उनके भीतर का अहंकार समाप्त होता था, और राजा या रंक के बच्चे बड़ी सरलता से एक साथ विद्याध्ययन कर लेते थे। एक प्रकार से यह सारी तैयारी राष्ट्रयज्ञ के लिए प्रत्येक नागरिक को नि:स्वार्थ भाव से अपनी आहुति डालने के लिए करायी जाती थी। इस प्रकार हमारी छोटी से छोटी गतिविधि या कार्य व्यापार का अंतिम लक्ष्य परसेवा और परोपकार ही होता था। जब विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करके हमारे ब्रह्मचारी घर आते थे तो माता-पिता उनका विवाह-संस्कार कराते थे। विवाह-संस्कार के पश्चात भी हमारे युवा और युवतियां अपने माता-पिता, दादा-दादी आदि की सेवा करने को अपना सौभाग्य मानते थे, उसे भी एक यज्ञ मानते थे। जिससे पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय परिवेश बड़ा ही आनंददायक बना रहता था।

आज के स्कूलों में और घरों में बच्चों में सेवा के संस्कार को मारा जा रहा है। यदि बच्चे से स्कूल में कुछ काम करा लिया जाए तो माता-पिता या अभिभावक तुरंत न्यायालय में पहुंच जाते हैं। घरों में आतिथ्य सेवा के लिए नौकर रखा जाना अच्छा माना जा रहा है। कुल मिलाकर सेवायज्ञ को युवा के जीवन से निकाल दिया गया है। फलस्वरूप घरों में माता-पिता, दादा-दादी की सेवा करना बच्चों को अपराध सा लग रहा है। जिससे भारत के जीवनमूल्य और यज्ञीय परंपरा का विनाश हो गया है। हम कृतज्ञता को भूल गये हैं और हमें लगने लगा है कि हम जो कुछ हैं अपने परिश्रम से ही हैं-अर्थात ‘सैल्फमेड’ हैं। अब आते हैं चौथे-बलिवैश्वदेव यज्ञ पर। अपनी कमाई के अन्न में से कुछ भाग कुत्ते, पापी-चाण्डाल, पापरोगी, कौवे और कृमि (चींटी आदि) के खाने के लिए देना बलिवैश्व देव यज्ञ कहा जाता है। इस यज्ञ का अभिप्राय है कि हम दयालु हों, और जो लोग या जीवधारी अपनी जीविकोपार्जन में असमर्थ हों, उन्हें हम कुछ खाने-पीने की चीजें, देने के लिए आगे आयें।

आजकल बहुत लोगों ने भिक्षावृत्ति को अपना व्यवसाय बना लिया है। ये लोग आपको अपनी असहायावस्था दिखाकर आपसे पैसे मांगते हैं और उस पैसे से शराब आदि पीते हैं या कोई अन्य व्यसन पालकर उसकी पूर्ति करते हैं। हमें ऐसे लोगों से बचना चाहिए उन्हें कुछ भी दानादि देना अनुचित है। इसीलिए महर्षि दयानंद का कहना है कि दान भी पात्र का प्रत्यभिज्ञान (पहचान) लेकर की देना चाहिए।

बलिवैश्वदेवयज्ञ हमारी दानवृत्ति को बलवती किये रखने के लिए किया जाता है। इसका अभिप्राय है कि हम दूसरों के सहायक हों, दूसरों के जीवन में प्रसन्नता बिखरने वाले हों। दूसरों के प्रति सहानुभूति और सद्भाव का प्रदर्शन करने वाले हों।

पांचवां यज्ञ है-अतिथि यज्ञ। ‘‘धार्मिक सत्योपदेशक सबके उपकारार्थ सर्वत्र घूमने वाला, पूर्ण विद्वान, परमयोगी संन्यासी गृहस्थ के यहां आवे तो उसे तीन प्रकार का जल-पाद्य, अघ्र्य और आचमनीय (पांव धोने योग्य, मुख धोने योग्य और पीने योग्य जल) देने के पश्चात आसन पर सत्कारपूर्वक बिठाकर खान-पान आदि उत्तमोत्तम पदार्थों से सेवा सुश्रूषा करके उनको प्रसन्न करने को अतिथि यज्ञ कहते हैं।’’

अतिथियों से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के साधक उपदेशों को सुनना और उनके अनुसार चाल-चलन बनाना अतिथि यज्ञ के लाभ हैं। भारत के ग्रामीण आंचल में अतिथि सत्कार की यही परंपरा आज भी चली आती है। वहां जाते ही आपको पांव धोने के लिए, मुंह धोने के लिए और पीने के लिए जल उपलब्ध कराया जाता है। तब बड़े पे्रम से आसन पर बैठाया जाता है। बहुत से स्थानों पर आज भी आपके लिए चारपाई पर वस्त्र बिछाकर उस पर बिठाने की परंपरा है। यह सारी की सारी परंपरा वेदानुकूल है। यह अलग बात है कि कुछ अतिथि-अतिथि नही होते। पर जिसके यहां कोई अतिथि गया है, उसे तो उसकी सेवा सत्कार उसी भाव से करनी है, जैसे उसे परंपरा से बताया व समझाया गया है। कुल मिलाकर यह परंपरा भी यज्ञमय है और इसीलिए इसमें आनंद है, रस है, ऊर्जा है, आशा है और प्रेम ही प्रेम है। किसी कवि ने कितना सुंदर कहा है :-

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।

जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से।।

ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।

करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।।

दर्जा है तीन लोक में महान यज्ञ का।

भगवान का है यज्ञ, है भगवान यज्ञ का।।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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