क्या थी भारत की स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा ?

भारत में लोकतंत्र की बहुत स्वस्थ प्रणाली प्राचीन काल से कार्य करती रही है । लोकतांत्रिक स्वस्थ प्रणाली के अंतर्गत समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी सुयोग्यतम संतान को राष्ट्र के लिए प्रदान करता आया है । विज्ञान की मान्यता है कि हर पिता की पहली संतान उसके अधिकतम गुणों को लेकर उत्पन्न होती है। यही कारण है कि भारत में पिता का उत्तराधिकारी उसका ज्येष्ठ पुत्र ही होता है। जिससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपने पिता का अनुव्रती होकर और माता के हृदय के समान गुणों वाला होकर संसार में माता-पिता की दिव्यता और भव्यता की चादर को तानकर संतान के दायित्व से उऋण होने के लिए प्रयास करेगा।
पिता का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र को बनाने की परंपरा भारत में आज भी देखी जा सकती है । यद्यपि हम आजकल इस परंपरा को केवल रूढ़िवाद के नाम पर जानते मानते हैं । जबकि सच्चाई यह है कि इसके पीछे एक वैज्ञानिक सच छिपा हुआ है। जब हम किसी पिता के ज्येष्ठ पुत्र को उसका उत्तराधिकारी बनाने के लिए उठाला या रस्म पगड़ी आदि के माध्यम से उसके सिर पर ‘ ताज ‘ रखते हैं तो उसका अभिप्राय यही होता है कि आज से संसार में तुम अपने पिता के सुयोग्यतम सुपुत्र होने के कारण उसके उत्तराधिकारी के रूप में जाने जाओगे , और समाज व संसार को सही दिशा देने के लिए सामाजिक कार्य में बढ़-चढ़कर भाग लोगे।

हर परिवार के द्वारा इस प्रकार समाज को एक सुयोग्यतम कार्यकर्ता दिया जाना भारत की एक अद्भुत परंपरा है । समझिए कि वह अपने राष्ट्र व समाज की पार्टी का एक समर्पित कार्यकर्त्ता है । जिसे लोग सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जानते वह मानते रहे हैं । यह किसी पार्टी का कार्यकर्ता नहीं होता अपितु केवल और केवल राष्ट्र व समाज का कार्यकर्ता होता है । हमारे यहां कोई पार्टी नहीं होती अपितु देश का हर नागरिक राष्ट्र नाम की पार्टी का स्वाभाविक सदस्य होता है और उसी के प्रति सदा निष्ठावान रहता है । एक प्रकार से वह नीचे रहकर अपने राजा की उन सभी जनहितकारी नीतियों का संदेशवाहक , प्रचारक व प्रचारक बन जाता है जिनसे समाज में सुव्यवस्था व शांति स्थापित किए रखने में सहायता मिलती है । इस प्रकार एक ही राष्ट्रीय पार्टी के ये सभी लोग अघोषित सदस्य बन जाते हैं और ये सब सकारात्मक सोच के साथ सही दिशा में कार्य करने के गंभीर प्रयास करते हैं ।
अंग्रेजों ने हमारी आदर्श प्राचीन परंपराओं को मिटाने का हर संभव प्रयास किया और उनके स्थान पर उन्होंने अपनी मान्यताओं और धारणाओं को हम पर थोपने का अपराध किया । भारत की लोकतंत्र की यह आदर्श परंपरा भी अंग्रेजों ने अपनी इसी नीति के अंतर्गत मिटा दी । यदि इसको आज भी भारत के लोग धार देकर अपना लें तो इससे भारत का ही नहीं विश्व का भी कल्याण हो सकता है । समय के अनुसार इस परंपरा को हमने मान्यता तो दे रखी है परंतु पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण की अपनी मूर्खतापूर्ण धारणा के कारण इसकी वास्तविकता और राष्ट्रहित में उपयोगिता को हम समझने में चूक कर रहे हैं । अब समय आ गया है कि जब अपनी इस परंपरा को सही संदर्भ में हम स्वीकार करें । वास्तव में हर परिवार से राष्ट्र के लिए एक विशिष्ट व्यक्ति प्रदान करने की भारत की यह परम्परा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की परंपरा से लाख गुणा उत्तम परंपरा है।

आज की पार्टियां तो विखंडनवाद को प्रोत्साहित करती हैं । समाज में विषमता , विखंडन और विघटन के बीज बोती हैं , जबकि राष्ट्रीय पार्टी के यह अघोषित सदस्य सारे समाज को एक सही दिशा में लेकर चलने के लिए उसे जोड़ने के कार्यों में लगे रहते हैं। इन लोगों के ऐसे गंभीर प्रयासों से ही राष्ट्र का निर्माण होता है ।
आज के तथाकथित लोकतंत्र ने पिता को अपनी अयोग्यतम संतान को समाज व राष्ट्र को देने के लिए प्रेरित किया है । हर पिता अपने ऐसे पुत्र को जो गंभीर , समझदार , विवेकशील , न्यायशील व शांत स्वभाव का होता है, आईएएस अधिकारी या किसी अच्छी बिजनेस की लाइन में भेजने के लिए प्रोत्साहित करता है । जबकि अपनी ऐसी किसी भी संतान को जो घर में उत्पात करता हो , पड़ोसियों से झगड़ता हो , समाज में अस्तव्यस्तता फैलाता हो , समाज व राष्ट्र को देने के लिए कहता है कि यह राजनीति के लिए उचित रहेगा । इस प्रकार राजनीति उस सारे कूड़े कबाड़ का भांडारागार बन गई है जो किसी के भी योग्य नहीं होता । बात स्पष्ट है कि जो घर में लोकतंत्र का समर्थक नहीं , पड़ोस में व समाज में उपद्रव और उग्रवाद फैलाता है , उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह लोकतंत्र के प्रति निष्ठावान रहकर राष्ट्र निर्माण में सहयोगी होगा ?
यदि हम आज भी समाज के लिए और राष्ट्र सेवा के लिए अपनी सुयोग्यतम संतान को या किसी भी परिजन को देने की भारत की प्राचीन प्रणाली को अपना लें तो समाज की सारी अस्त-व्यस्त व्यवस्था सुव्यवस्थित हो सकती है । जब तक हम पार्टियों के मृगजाल में फंसे रहेंगे और इनमें जा – जाकर देश को लूटने के लिए पद प्राप्ति की प्रदूषित मानसिकता का शिकार बने रहेंगे , तब तक समाज में शांति व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकती और न् ही देश सही दिशा में आगे बढ़ते हुए विकास कर पाएगा।
कभी मायावती ने कहा था कि —
तिलक , तराजू और तलवार
इनको मारो जूते चार ।
और अब नारा होना चाहिए कि —
पार्टी संगठन का लूटाचार ,
इनको मारो जूते चार ।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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