हमारी वैदिक इतिहास परंपरा में हिंसा निषेध और गाय

वेद ने मनुष्य से अन्य प्राणियों के प्रति मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे-अर्थात प्रत्येक प्राणी को अपना मित्र समझो, ऐसा व्यवहार करने का निर्देश दिया है। इसलिए अपने मित्रों के बीच रहकर कोई अनपेक्षित और अवांछित प्रतियोगिता वेद ने आयोजित नही की, अपितु सबको अपने अपने मर्यादा पथ में जीवन जीने के लिए स्वतंत्र छोड़ा। एक मनुष्य की योनि ऐसी है कि जो कर्मयोनि भी है और भोगयोनि भी है इसलिए अपने मर्यादा पथ में रहकर अन्य जीवों के साथ मित्रवत व्यवहार करना मनुष्य का सबसे प्रमुख कार्य है। अत: वेद ने मनुष्य से अपेक्षा की कि सबसे अधिक तुझे ही मर्यादाओं का पालन करना है। इसीलिए वेद ने मनुष्य से कहा है-न स्रेधन्तं रमिर्नशत (सा. 4/43/2) कि यदि तू हिंसक बनेगा तो तू मोक्षधन कभी प्राप्त नही कर सकेगा।

मा हिंसी तन्वा-अर्थात अपने शरीर से कभी भी हिंसा मत करो। यजुर्वेद का यह भी निर्देश है कि पशून पाहि अर्थात हे मनुष्य तू क्योंकि सबसे श्रेष्ठ है, अत: सभी प्राणियों की, पशुओं की रक्षा कर। ऐसे में गाय की हिंसा की तो बात ही छोड़िए, अन्य पशुओं की भी रक्षा करने की बात वेद करता है।

वैदिक व्यवस्था को कलंकित करने और वेदों को ग्वालों के गीत कहकर, अपयश का पात्र बनाकर चलने वाले भारत के तथाकथित विद्वानों ने गाय का मांस खाने की आज्ञा वेदों में होनी बतायी है। ऐसी धारणा वास्तव में इन शत्रु विद्वानों की शत्रु भावना तथा इन्हें भारतीय संस्कृति और संस्कृत के व्याकरण का ज्ञान न होने के कारण बतायी गयी है। वास्तव में वेदों ने ही गाय का इतना महिमामंडन किया है कि गाय को गोमाता कहने या मानने का विचार ही लोगों को वेद के गाय के प्रति श्रद्घाभाव से मिला है। अथर्ववेद (सा. 4/21/5) में कहा गया है कि-गावो भगो गाव इन्द्रो मे-अर्थात गायें ही भाग्य और गायें ही मेरा ऐश्वर्य हंै। इससे अगले मंत्र में अथर्ववेद में आया है भद्रम गृहं कृणुभ भद्रवाचो ब्रहद्वो वय उच्यते सभासु अर्थात मधुर बोली वाली गायें घर को कल्याणमय बना देती हैं। सभाओं में गायों की बहुत कीर्ति कही जाती है। इसीलिए (ऋग्वेद 2/35/7) में कहा गया है कि स्व आ दमे सुदुधा पस्य धेनु: अर्थात अपने घर में ही उत्तम दूध देने वाली गौ हो।

ऐसी गाय घर में होनी इसलिए आवश्यक है कि उसके होने से दुर्बल भी हष्ट पुष्ट और श्रीहीन भी सुश्रीक, सुंदर, शोभायमान हो जाते हैं इसीलिए घरों में गोयालन को अच्छा माना जाता था। गाय को मनुष्य अपना धन मानता था और प्राचीन काल में गायें विनिमय का माध्यम भी थीं। इसलिए गाय को धन मानने की परंपरा भारत के देहात में आज तक भी है। ऐसा धन, जो मोक्ष प्राप्ति में सहायक हो, क्योंकि इस धन से ही हमें सात्विकता मिलती है, कांति मिलती है, और आत्मिक आनंद मिलता है, इसलिए भारत का प्रत्येक नागरिक प्राचीन काल में गोपति या गोपालक बनने में अपना बड़प्पन मानता था। आज तक भी गोपाल नाम हमारे यहां रखा जाता है। गाय का घी, मूत्र, गोबर दूध, दही सभी बड़ा उपयोगी होता है। आज के विज्ञान ने भी यह सिद्घ कर दिया है कि गोमूत्र का नित्य सेवन करने से कई कैंसर जैसी घातक बीमारियां हमें लग ही नही सकतीं। इस तथ्य को हमारे ऋषियों ने प्राचीन काल में समझ लिया था। इसीलिए वेद ने हमें गाय के प्रति असीम श्रद्घाभाव रखने का उपदेश दिया है।

ऋग्वेद (01/101/15) में कहा गया है कि गाय का नाम दिति वधिष्ट-अर्थात अघ्न्या गाय को कभी मत मार। इसी मंत्र में गाय को अवध्या इसलिए कहा गया है कि यह रूद्रदेवों की माता, वसुदेवों की कन्या आदित्य देवों की बहन और अमृतस्य नाभि-अमृत्व का केन्द्र है। 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक तप करने वाला वसु, 36 वर्ष तक इसी प्रकार साधना करने वाला रूद्र तथा 48 वर्ष तक तप करने वाला आदित्य कहा जाता है। सुसंस्कृत समाज के ये ही तीन वर्ग हैं।

निघण्टु में गौ शब्द के विभिन्न अर्थ किये गये हैं। इनमें से प्रथम वाणी-अंतरात्मा की पुकार, दूसरा मातृभूमि और तीसरा गौ नाम का पशु है। अंतरात्मा की आवाज के अनुसार कार्य करने पर मनुष्य की दिनानुदिन उन्नति होती रहती है। तब गौ-हमारी अंतर्रात्मा हमारे लिए माता के समान हितकारिणी बन जाती है। आत्मा की शासक अग्नियों (वृत्तियों) से प्रकट होने के कारण यह पुत्री के समान पवित्र है। मर्यादा पालने के लिए बहन के समान साहस बढ़ाती है, अत: इस गौ की आत्मा की पुकार की तू कभी हिंसा मत कर।

हमारा यह शरीर मु_ी भर मिट्टी से बना है, और अंत में मातृभूमि की इसी मिट्टी में मिल जाएगा। इसलिए हम पर मातृभूमि का यह ऋण है। इसी संबंध के कारण हमें वेद (अथर्व. 12/1/12) ने निर्देश दिया है :-

माता भूमि: पुत्रोअहम् पृथिव्या:।

अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूं। यह मातृभूमि भी हमें बहुत कुछ देती है, इसलिए इसके प्रति भी सदा निष्ठावान रहना हमारा कर्त्तव्य है।

गौ के भीतर भी माता और मातृभूमि के समान ही असाधारण गुण होते हैं, जिनसे हमारी बुद्घि तीव्र होती है और शरीर हष्ट पुष्ट स्वस्थ रहता है। उसी के दिये हुए बछड़ों से हम खेती करते हैं और उसी की गोबर से हमें खाद मिलती है।

इस प्रकार गाय हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का आधार है। इसलिए उसके प्रति भी हमें अहन्तव्य रहने का आदेश दिया गया है। अथर्ववेद (1/4/16) में तो गाय का वध करने वालों को त्वा सीसेन विध्याओ-अर्थात शीशे की गोली से बींधने की बात कही गयी है। जबकि ऋग्वेद में आरे मोहनमुत पुरूषघ्नम्। अर्थात पुरूष को हानि पहुंचाने वालों से भी पहले गौ के मारने वाले को नष्ट करने की बात कही गयी है।

अथर्व (9/4/20) गाव सन्तु प्रजा: सन्तु अथाअस्तु तनूबलम्। अर्थात घर में गायें हों, बच्चे हों और शरीर में बल हो, ऐसी प्रार्थना की गयी है।

जबकि शतपथ ब्राह्मण में (7/5/2/34) में कहा गया है-सहस्रो वा एष शतधार उत्स यदगौ:। अर्थात भूमि पर टिकी हुई जितनी जीवन संबंधी कल्पनाएं हैं उनमें सबसे अधिक सुंदर सत्य, सरस, और उपयोगी यह गौ है। इसमें गाय को अघ्न्या बताया गया है। सहस्र-अनंत और असीम है। जो शतधार-सैकड़ों धाराओं वाला है। कोलंबस ने सन 1492 में जब अमेरिका की खोज की तो वहां कोई गाय नही थी, केवल जंगली भैंसें थीं। जिनका दूध निकालना लोग नही जानते थे, मांस और चमड़े के लिए उन्हें मारते थे। कोलंबस जब दूसरी बार वहां गया तो वह अपने साथ चालीस गायें और दो सांड लेता गया ताकि वहां गाय का अमृतमयी दूध मिलता रहे।

सन 1525 में गाय वहां से मैक्सिको पहुंची। 1609 में जेम्स टाउन गयी, 1640 में गायें 40 से बढ़कर तीस हजार हो गयीं। 1840 में डेढ़ करोड़ हो गयीं। 1900 में चार करोड़, 1930 में छह करोड़ साढ़े छियासठ लाख और 1935 में सात करोड़ 18 हजार 458 हो गयीं। अमेरिका में सन 1935 में 94 प्रतिशत किसानों के पास गायें थीं, प्रत्येक के पास 10 से 50 तक उन गायों की संख्या थी।

गर्ग संहिता के गोलोक खण्ड में भगवद-ब्रह्म-संवाद में उद्योग प्रश्न वर्णन नाम के चौथे अध्याय में बताया गया है कि जो लोग सदा घेरों में गौओं का पालन करते हैं, रात दिन गायों से ही अपनी आजीविका चलाते हैं, उनको गोपाल कहा जाता है। जो सहायक ग्वालों के साथ नौ लाख गायों का पालन करे वह नंद और जो 5 लाख गायों को पाले वह उपनंद कहलाता है। जो दस लाख गौओं का पालन करे उसे वृषभानु कहा जाता है और जिसके घर में एक करोड़ गायों का संरक्षण हो उसे नंदराज कहते हैं। जिसके घर में 50 लाख गायें पाली जाएं उसे वृषभानुवर कहा जाता है। इस प्रकार ये सारी उपाधियां जहां व्यक्ति की आर्थिक संपन्नता की प्रतीक है, वहीं इस बात को भी स्पष्ट करती हैं कि प्राचीन काल में गायें हमारी अर्थव्यवस्था का आधार किस प्रकार थीं। साथ ही यह भी कि आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्तियों के भीतर गो भक्ति कितनी मिलती थी? इस प्रकार की गोभक्ति के मिलने का एक कारण यह भी था कि गोभक्ति को राष्ट्रभक्ति से जोड़कर देखा जाता था। गायें ही मातृभूमि की रक्षार्थ अरिदल विनाशकारी क्षत्रियों का, मेधाबल संपन्न ब्राह्मण वर्ग का, कर्त्तव्यनिष्ठ वैश्य वर्ग का तथा सेवाबल से युक्त शूद्र वर्ग का निर्माण करती थीं।

मेगास्थनीज ने अपने भारत भ्रमण को अपनी पुस्तक ‘इण्डिका’ में लिखा है। वह लिखते हैं कि चंद्रगुप्त के समय में भारत की जनसंख्या 19 करोड़ थी और गायों की संख्या 36 करोड़ थी। (आज सवा अरब की आबादी के लिए दो करोड़ हंै) अकबर के समय भारत की जनसंख्या बीस करोड़ थी और गायों की संख्या 28 करोड़ थी। 1940 में जनसंख्या 40 करोड़ थी और गायों की संख्या पौने पांच करोड़ जिनमें से डेढ़ करोड़ युद्घ के समय में ही मारी गयीं।

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 1920 में चार करोड़ 36 लाख 60 हजार गायें थीं। वे 1940 में 3 करोड़ 94 लाख 60 हजार रह गयीं। अपनी संस्कृति के प्रति हेयभावना रखने के कारण तथा गाय को संप्रदाय (मजहब) से जोड़कर देखने के कारण गोभक्ति को भारत में कुछ लोगों की रूढ़िवादिता माना गया है। जबकि ऐसा नही है।

गाय के प्रति मुहम्मद साहब की पत्नी आयशा ने कहा कि फरमाया रसूल अल्लाह ने गाय का दूध शिफा है और घी दवा तथा उसका मांस रोग है। अर्थात मांस खाना रोगों को बुलाना है, इसलिए बात साफ है कि गोवध वहां भी निषिद्घ है। इसी बात को मुल्ला मोहम्मद बाकर हुसैनी का कहना है कि गाय को मारने वाला, फलदार दरख्त को काटने वाला और शराब पीने वाला कभी नही बख्शा जाएगा।

जनाब मुजफ्फर हुसैन जी ने एक किताब लिखी है ‘इसलाम और शाकाहार’ उसमें उन्होंने प्रमाणों से सिद्घ किया कि इस्लाम में भी गोवध की मनाही है। भारत की प्राचीन काल से ही जीवन जीने की नीति रही है कि आत्मवत सर्वभूतेषु य: पश्यति स पश्यति-अर्थात जो सब प्राणियों को अपने समान जानता है, वही ज्ञानी है, बात साफ है कि जब आप सबको अपने समान ही जानोगे या मानोगे तो फिर किसी की हिंसा करने का प्रश्न ही कहां रह गया? नीतिकार ने स्पष्ट किया है कि आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् अर्थात जो व्यवहार या कार्य या बात आपको अपने लिए अच्छी नही लगे उसे दूसरों के साथ भी मत करो। अब जब हम अपनी मृत्यु हिंसा से नही चाहते हैं तो हमें दूसरों के साथ भी हिंसात्मक व्यवहार नही करना चाहिए। इसी बात को यजुर्वेद (12/32) ने मा हिंसी तन्वा प्रजा: कहकर हमें निर्देशित किया है कि प्रजाओं को अर्थात किसी भी प्राणी को अपने शरीर से मत मार। यह निर्देश वेद का हिंसा निषेध है।

ऋग्वेद (1/161/7) के निश्चर्मणो गामरिणीत धीतिभि: मंत्र का अर्थ सायणाच्चार्य ने गौ का चमड़ा उचेड़ो किया है। जिससे गोहत्या का आदेश देने का कलंक वेद के माथे लगाने का कुछ लोगों को अवसर मिल गया है। अब जिस गौ को वेद अघ्न्या कह रहा है, उसे ही यहां मारने की बात कहे तो तार्किक सा नही लगता। वास्तव में जैसा कि हमारे द्वारा पूर्व में ही कहा गया है कि गौ का एक अर्थ वाणी भी है, तो यहां इस मंत्र में हमें यही अर्थ निकलना होगा। जिससे निश्चर्मणो गामरिणीत धीतिभि: का अर्थ होगा वाणी को चर्म्म रहित करके बोलो। गौ का एक अर्थ बाल भी है, तो बात साफ हुई कि वेद यहां बाल की खाल उतारने की बात कह रहा है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betnano
Hititbet Giriş
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betgaranti giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
xslot giriş
xslot giriş
sahabet
sahabet
hititbet
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano