स्वाधीनता का उपासक, दमन व स्वेच्छाचारिता का काल ‘विजय सिंह पथिक’

vijay singh pathik

लेखक – आर्य सागर

अतीत का स्वर्णिम वैदिक काल हो या पराधीनता का मुगलों व अंग्रेजराज हो,समय- समय पर भारत माता वीर – वीरांगनाओं का प्रसव करती रही है। इसकी कोख कभी बांझ नहीं हुई अर्थात भारत माता की वीर पुत्रियों की कोख से वीर संताने जन्म लेती रही है।ऐसी ही एक माता ‘कंवल (कमल) कौर’ की कोख से 27 फरवरी 1882 को हमारे क्रांति नायक,राष्ट्र पथिक, राजस्थान केसरी ,भूप सिंह गुर्जर जो कालांतर में विजय सिंह पथिक के नाम से सुविख्यात हुए, उनका जन्म हुआ। विजय सिंह पथिक का जन्म संयुक्त प्रांत उत्तर प्रदेश के गंगा- यमुना के बीच के सर्वाधिक बड़े जनपद बुलंदशहर के गुर्जर राठी गोत्रीय गांव गुठावली में पिता हमीर सिंह के घर में हुआ। में थोड़ा परिचय विजय सिंह पथिक के कुल का भी देना आवश्यक समझता हूं जिसमें विजय सिंह पथिक का जन्म हुआ पथिक जैसा असाधारण व्यक्तित्व साधारण परिवार में जन्म ले ही कैसे सकता हैं । ईश्वर सभी की मनोकामना पूरी करता है। एक कहावत भी है ‘दादा पोते के रूप में जीवित होता है’ ऐसे ही विजय सिंह पथिक का जन्म अपने दादा के स्वाधीनता के अधूरे सपने को पूरा करने के लिए ही मानो उनका जन्म हुआ था। पथिक जी का अपने लिए जीने का कोई उद्देश्य ही नहीं था। दरअसल विजय सिंह पथिक के दादा इन्द्र सिंह गुर्जर 1857 के स्वाधीनता संग्राम में बलिदान हो गए थे, पास की ही एक रियासत पर अंग्रेजों की गोलाबारी में । बताया जाता है उस रियासत कतिपय मामलों के प्रबंध की जिम्मेदारी इन्द्र सिंह गुर्जर पर भी थी। विजय सिंह पथिक क्रांतिकारियों के उस परिवार से आते हैं जिसकी तीन पीढ़ी ही स्वाधीनता संग्राम के होम में आहूत हो गई । वीरता व बलिदानों का ऐसा आख्यान काल्पनिक उपन्यासों में तो बहुतायत में मिल जाएगा लेकिन इतिहास में बहुत कम मिलता है।

पथिक जी बाल्यावस्था में ही माता-पिता के स्नेह से वंचित हो गए। उनकी प्राथमिक शिक्षा गांव के ही पास एक प्राइमरी स्कूल में हुई । अपनी शिक्षा दीक्षा व जन्म को लेकर पथिक जी ने अपने विरचित विविधता पुर्ण गद्य व पद्य प्रधान साहित्य ,अपने द्वारा संपादित आधा दर्जन से अधिक अखबारों में कभी कोई उल्लेख नहीं किया । यह उनकी निष्काम महान मनोवृति का ही परिचायक है वैसे भी क्रांतिकारियों को अपने आत्म प्रचार से घृणा ही होती है। एक क्रांतिकारी व एक जीवन मुक्त योगी की मनोदशा में कुछ खास अंतर नहीं होता, यह इसका परिचायक है। जन्म के विषय में पथिक जी ने केवल इतना ही लिख भर छोड़ा है कि उनका जन्म होली से अगले दिन हुआ था । वहीं उनकी शिक्षा दीक्षा के संबंध में एक साक्ष्य इस बात से मिलता है प्रसिद्ध इतिहासकार साहित्यकार जो बुलंदशहर के ही ‘चादोक’ गांव के निवासी थे आचार्य चतुरसेन जिन्होंने वैशाली की नगरवधू, भारत में इस्लाम, गोली जैसे असंख्य उपन्यास इतिहास के ग्रंथ लिखे वह उनके सहपाठी थे । आर्य समाज के विद्वान आचार्य चतुरसेन जी की शिक्षा दीक्षा गुरुकुल महाविद्यालय सिकंदराबाद में हुई थी ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है प्राथमिक शिक्षा के बाद पथिक जी की आगे की शिक्षा संभवतः गुरुकुल सिकंदराबाद में ही पूरी हुई हो यद्यपि यह अनुसंधान का विषय है। यहां उल्लेखनीय होगा 1901 में स्थापित गुरुकुल सिकंदराबाद मंडी श्याम नगर में उस समय क्रांतिकारियों का जमघट रहता था आर्य समाज के अनेकों प्रचारक उपदेश यहां निवासरत थे इस गुरुकुल में पढ़ें विद्यार्थियों ने नेपाल में जाकर नेपाल की राजशाही के विरुद्ध पंडित शुक्राज के नेतृत्व में क्रांति भी की थी उन सभी को फांसी हुई थी। अपनी शिक्षा दीक्षा के पश्चात पथिक जी इंदौर अपनी बहन के पास आ गए वहां बताया जाता है उनके बहनोई राजकीय सेवा में सेवारत थे।

आज इतिहास इस बात का साक्षी है इंदौर शहर को ही यह गौरव प्राप्त हुआ जहां हमारे क्रांति नायक विजय सिंह पथिक स्वाधीनता के पथ पर आरुढ हुए। भूप सिंह राठी को विजय सिंह पथिक बनाने वाला यही शहर था। एक घटना इसका निमित्त बनी । बनारस में जन्मे और प्रसिद्ध बंगाली क्रांतिकारी सचिंद्रनाथ सान्याल से उनकी इन्दौर में मुलाकात हुई ।क्रांतिकारियों के नायक सचिंद्रनाथ सान्याल की पारखी नजर ने भूप सिंह राठी से पहली मुलाकात में ही उनकी ओजस्विता तेजस्विता को भांप लिया। सत्येंद्र नाथ सान्याल कोई आम क्रांतिकारी नहीं थे उनका लिखा गया ग्रंथ ‘बंदी जीवन’ क्रांतिकारियों की गीता कहलाती है।

भूप सिंह राठी की सान्याल जी से मुलाकात के पश्चात उनकी मुलाकात अन्य महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस से हुई जिन्हें पंजाब में सशस्त्र क्रांति की जिम्मेदारी दी गई वहीं भूप सिंह राठी जी को राजस्थान में सशस्त्र क्रांति की जिम्मेदारी दी गई।

उन दिनों राजस्थान में अंग्रेज फौजियों की तोड़ेदार बंदूको के स्थान पर उन्हें राइफल दी गई तोड़ेदार बंदूको को रियासत में खुली बिक्री के लिए उपलब्ध कराया गया वहीं भूप सिंह उर्फ विजय सिंह पथिक व भाई बाल मुकुंद जिन्हें दिल्ली बम कांड में 8 मई 1915 दिल्ली जेल में फांसी दी गई एक महान क्रांतिकारी थे ।दोनों ने तोड़ेदार बंदूको का संग्रह किया ।बताया जाता है 30000 से अधिक बंदूकें इकट्ठी की गई।

राजस्थान में अपने काम को अंजाम देकर पथिक जी ने रासबिहारी बोस के साथ मिलकर गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग की रेल पर बम से दिल्ली दरबार के दौरान हमला किया जिसमें वह बच गया। पश्चात में गदर पार्टी के लाहौर कांड, दिल्ली बम कांड को लेकर क्रांतिकारियों की चारों ओर धर पकड़ शुरू हो गई जिसमें 100 से अधिक क्रांतिकारियों को फांसी दी गई। ऐसे में भूप सिंह गुर्जर ने अचूक रणनीति के तहत अपना नाम ,वेस भूषा व भाषा तीनों को ही बदल दिया दाढ़ी मूछ नहीं रखने वाले पथिक जी राजपूतने के सरदारों की तरह बड़ी-बड़ी दाढी रखने लगे वह सर पर पगड़ी व राजस्थानी मारवाड़ी बोलने लगे।
1915 में जेल से फरार होने के बाद भूप सिंह गुर्जर महीनों तक राजस्थान के गांवों की खाक छानते रहे। उन्होंने अपनी दाढ़ी और सिर के बाल बढ़ाकर साधु का वेश धारण कर लिया और अपना नाम बदलकर विजय सिंह पथिक रख लिया। कांकरोली, भाना, मोही गांवों के बाद ओछड़ी गाँव को अपना ठिकाना बनाया। यहां 1915 में उन्होंने हरिभाई किंकर के साथ मिलकर ‘विद्या प्रचारणी सभा’ की स्थापना की। इस सभा के माध्यम से पथिक नौजवानों को पढ़ाते और उनमें देशभक्ति की भावना पैदा करते।विद्या प्रचारणी सभा के वार्षिक अधिवेशन में पथिक जी ने आर्य समाज के प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय प्रचारक संन्यासी स्वामी सत्यदेव परिव्राजक व पंजाब केसरी लाला लाजपत राय को मेवाड़ बुलाया था। उनका व्याख्यान आयोजित कराया था।

पथिक जी एक दर्जन से अधिक हिंदी अंग्रेजी बांग्ला संस्कृत सहित अन्य देसी भाषा व बोलियो के जानकार थे ।उनके समकालीन उनके मित्र प्रसिद्ध साहित्यकार पत्रकार राज्यसभा सदस्य बनारसी दास चतुर्वेदी लिखते हैं कि इतिहास व राजनीति विषय पर पथिक जी जैसा पंडित मैंने आज तक नहीं देखा। पथिक जी की अद्वितीय विद्वता के संबंध में ऐसी ही सम्मति में उनके बिजोलिया आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले उनके मानिक्यलाल वर्मा जी की रही। माणिक वर्मा जी भारतीय संविधान सभा के सदस्य आजादी के पश्चात टोंक व चित्तौड़गढ़ से सांसद रहे आधुनिक राजस्थान के गठन से इसके मुख्यमंत्री भी रहे।

पथिक जीपत्रकारिता की उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी लेकिन पत्रकारों के कुलपिता कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी पथिक जी के पत्रकारिता कौशल ज्ञान के कायल थे। पथिक जी एक अध्ययनशील बहुपठित विचारक थे। पथिक जी के क्रांति पर लेख उनके पत्र प्रताप में अक्सर प्रकाशित होते थे। पथिक जी दोहरे लेख लिखते थे एक-एक राष्ट्रीय आंदोलन तो दूसरा लेख देशी रियासतों की स्थिति को लेकर होता था । लेखो की भाषा इतनी राजनीतिक विचार उत्तेजक लेकिन सरल सदैव होती थी कि पाठक वर्ग में खलबली मच जाती थी। अंग्रेज प्रतिशोध में बावले हो उठते थे। राजस्थान की अनेक रियासतों ने घबराकर पथिक जी के अखबारों को उनकी सीमा में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्रताप में पथिक जी के क्रांतिकारी लेख उनके छद्म नाम से प्रकाशित होते थे ऐसे में अंग्रेज मूल लेखक तक नहीं पहुंच पाते थे लेकिन अखबार की हजारों प्रतियो को जगह-जगह छापा मारकर जप्त जरूर किया जाता था।

पथिक जी ने अपने जीवन में तरुण राजस्थान, राजस्थान संदेश, नवीन राजस्थान संदेश, नव संदेश, राजस्थान केसरी सहित एक दर्जन से अधिक समाचार पत्रों का संपादन किया अंग्रेज उनकी प्रेस पर छापे मारते तो पथिक जी किसी दूसरे स्थान पर नया अखबार शुरू कर देते।

1920 के आसपास पथिक जी ने यह अनुभव किया साम्राज्यवाद व सामंतवाद दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू है। सशक्त क्रांतिकारी योजना को अंजाम देते हुए अपने राजस्थान प्रवास में पथिक जी ने यह अनुभव किया की 1857 के स्वाधीनता संग्राम सशस्त्र विद्रोह की असफलता का एक कारण यह भी था इसमें राजस्थान की प्रजा ने हिस्सा नहीं लिया था राजस्थान की रियासतों के राजा सामंत अंग्रेजों के साथ मिले हुए थे। स्वाधीनता संग्राम को सहायता तो दूर राजपूताने के अनेक राजाओं ने अंग्रेजों के साथ अपनी सेना भेजी थी विद्रोह को कुचलने के लिए वीर सावरकर ने इस विषय पर बहुत कुछ लिखा है। दूरदर्शी पथिक जी इस कमजोरी को भाप गए।

उन दिनों राजपूताने के राजाओं की स्वामी भक्ति भारत के प्रति न होकर अंग्रेजों के प्रति थी इस संबंध में अनेक इतिहासकारों ने लिखा है वीर सावरकर ने भी अपनी पुस्तक में लिखा है ।वही आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ने भी इस पर बहुत प्रकाश डाला है। उनका बलिदान भी अजमेर में हुआ था यह भी एक संयोग है ।पथिक जी का बलिदान भी अंत में अजमेर में ही हुआ।

पथिक जी ने राजपूताने की प्रजा की लोकतांत्रिक चेतना को जागृत किया उन्होंने राजपूताने के सामंतवादी प्रजा पर जुल्म करने वाले सामंतों ठिकानेदारों जागीरदारों के विरुद्ध एक अहिंसक क्रांति का सुत्रपात किया ।पथिक जी क्रांतिकारियों के उस वर्ग से आते हैं जो शस्त्र व शास्त्र दोनों में निपुण थे। एक तरफ पथिक जी जहां बंदूक से क्रांतिकारी करने में माहिर थे वही वह कलम के भी धनी थे ।पथिक जी महान पत्रकार होने के साथ-साथ महान लेखक साहित्यिक प्रतिभा के भी धनी थे ।इसका परिचय हमें उनके द्वारा लिखित साहित्य से मिलता है ।उनकी मृत्यु के प्रांत उनके साहित्यिक कार्यों का संपादन उनकी वीरांगना पत्नी माता ‘जानकी’ ने कराया था मथुरा के एक प्रकाशन हाउस से। जैसा नाम वैसा ही इस देवी का आचरण था। इस देवी के त्याग तप पर कभी अन्य लेख में लिखा जाएगा। बस इतना मात्र कहुंगा यह देवी क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की पत्नी वीरांगना दुर्गा भाभी की तरह प्रचारित नहीं हो पाई, जिसने लाहौर सांडर्स वध कांड में भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को अपने घर पर शरण दी थी कोलकाता में उनके छुपने में मदद की थी।

पथिक जी ने अपनी नई क्रांति का सूत्रपात उदयपुर रियासत के बिजोलिया ठिकाने से किया ।उदयपुर के राजा फतेह सिंह व उसके जागीरदार वहां की स्थानीय आदिवासी प्रजा व किसानों पर जुल्म करते थे 80 से अधिक प्रकार के कर अंग्रेजों के निर्देश पर उस गरीब प्रजा पर लगाए गए थे। कोई राजा कितना क्रूर हो सकता है इसकी सीमा मेवाड़ अजमेर आदि के राजाओं ने पार कर दी थी। 17वीं शताब्दी में जोधपुर के राजा अभय सिंह के निर्देश पर खेजड़ी गांव के बिश्नोई समाज के 350 से अधिक लोगों का सामूहिक नरसंहार अभय सिंह के सैनिकों ने कर दिया था। बात केवल इतनी सी थी अभय सिंह के नवनिर्मित महल के लिए लकड़ी चाहिए थी और बिश्नोई समाज पेड़ों की पूजा करता है उनका संरक्षण करता है गांव के लोग पेड़ों को काटने का विरोध करने लगे। राजपूताना की ऐसी असंख्य घटनाओं से आए दिन त्रस्त होता था जबकि इन राजाओं की पूर्वज राजा बहुत ही दयालु प्रजा वत्सल रहे उल्लेखनीय होगा पथिक जी ने जहां क्रांति की वह इलाका उदयपुर की रियासत की अधीनता है और 15वीं शताब्दी में इस रियासत के एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी की रक्षा एक वीर गुजरी माता पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर की थी तब जाकर राणा सांगा का वंश चल पाया लेकिन किसको क्या पता था राणा सांगा के वंशज ही आगे चलकर महाराणा प्रताप के नाम को धूमिल करके प्रजा को दुख देने लगेंगे । खैर हम अपने विषय पर आते हैं पथिक जी ने वहां लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया नतीजा सामंतों के प्रति मारवाड़ में एक नई क्रांति का सूत्रपात हुआ यह देख अंग्रेज बौखला गए क्योंकि अंग्रेजों को राजपूताने से भारी राजस्व की वसूली होती थी अंग्रेजों ने पथिक जी पर मेवाड़ व अजमेर में अनेक राजद्रोह के फर्जी मुकदमे लगाए लेकिन पथिक जी उनमें निर्दोष साबित हुए अंत में अंग्रेजों के इशारे पर उदयपुर के महाराणा फतेह सिंह ने अपने न्यायालय में पथिक जी को प्रजा को भड़काने के आरोप में 5 साल का कठोर कारावास दिया। अंग्रेजों ने उनके विषय में प्रचारित किया- *यह एक डाकू है जो संयुक्त प्रांत से आया है और राजस्थान में गड़बड़ मचा रहा है । शेर को पिंजरे में बंद कर उसके मुंह पर थूकना इसी को कहते हैं*।

पथिक जी को अनेक वर्षों तक यात्ना दी गई ।इस संबंध में उनके मित्र बनारसी दास चतुर्वेदी ने लिखा -“मेरी जब पथिक जी से भेंट हुई तो बड़े दुख की बात है उनके शरीर में खून नहीं है उनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा है ,दिसंबर 1923 में उन्होंने ऐसा लिखा था”।

यहां उल्लेखनीय होगा पथिक जी द्वारा संचालित बिजोलिया किसान आंदोलन आज भी विश्व का ऐसा अनूठा आंदोलन है जो 44 वर्ष तक चला यहां तक की इंग्लैंड के विरुद्ध आयरलैंड का आंदोलन ,खुद इंग्लैंड की किसान क्रांति और फ्रांस का आंदोलन भी इतना लंबा नहीं चला वहीं कांग्रेस द्वारा प्रायोजित असहयोग व सविनय अवज्ञा आंदोलन तो कुछ महीने में ही चलकर बंद हो गए। बिजोलिया किसान आंदोलन केवल किसान आंदोलन नहीं था अपितु यह सीधे-सीधे भारत की आजादी का आंदोलन था ।1857 की क्रांति पर जो कलंक राजपूताने की वीर भूमि पर लगा हुआ था। उस कलंक को इस आंदोलन ने धो दिया था। पूरे राजपूताने में स्वाधीनता की चिंगारी भड़क उठी ।पथिक जी ने जो कार्य वहां प्रजा वर्ग में किया उसका लाभ लोह पुरुष सरदार पटेल को मिला। कुछ इतिहासकार कहते हैं यदि पथिक जी राजपूताने की धरती पर क्रांति का शंखनाद ना करते तो राजपूताने की 15 से अधिक रियासतों के राजा देश की आजादी के पश्चात अपनी स्वतंत्रता के पक्ष में थे ना ही उनकी इच्छा भारत विलय में थी ना ही पाकिस्तान विलय में। वह पथिक जी ही थे जिनके कारण राज्य पुनर्गठन आयोग को आधुनिक राजस्थान राज्य के गठन में केवल 7 वर्ष लग गए यदि पथिक जी का सहयोग ना मिलता तो यह काम आसान नहीं था।वर्तमान राजस्थान राज्य जो बेहद संवेदनशील सीमावर्ती राज्य है होने के कारण इसका गठन नहीं हो पाता।

भारत की देशी रियासतों के संघ के उपाध्यक्ष के तौर पर पथिक जी ने इस क्षेत्र में भी बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया। इस विषय में बहुत कम अध्ययनशील लोगों को जानकारी है ।पथिक जी ने अपनी उपलब्धियां को कभी भी प्रचारित नहीं किया।

1928 में पथिक जी ने ‘व्हाट आर इंडियन स्टेट’ पुस्तक देसी रियासतों पर लिखी इस पुस्तक का दुर्भाग्य से आज प्रिंट संस्करण उपलब्ध नहीं है। लेख के लेखक का यह प्रयास है इस पुस्तक को या इसकी पांडुलिपि को हासिल किया जाए।

बिजोलिया सत्ताग्रह से पथिक जी की धूम पूरे देश में मच गई ।यहां तक की महात्मा गांधी उनके सत्याग्रह संचालन प्रबंधन, जोशीली भाषण कला कर्मठता के कायल थे। पथिक जी का महात्मा गांधी के साथ अनेक वर्षों तक पत्र व्यवहार हुआ अनेक अवसरों पर भेंट हुई। महात्मा गांधी के आग्रह पर पथिक जी ने वर्धा गुजरात में भी सहकारिता के विषय में लोगों को जागरूक किया। वहां से एक अखबार भी निकाला कुछ दिन में ही पथिक जी का कांग्रेस की राजनीतिक विचारधारा से मोह भंग हो गया कांग्रेस को आर्थिक सहायता देने वाले पूंजीवादी उद्योगपति घराने बजाज व बिरला से भी पथिक जी के कुछ विषय को लेकर मतभेद हुए ।पथिक जी को यह आशंका थी वह एक दुरदृष्टा थे की– स्वाधीनता के उपरांत यदि हमने व्यवस्था परिवर्तन नहीं किया तो कहीं यह उद्योगपति सेठ औद्योगिक घराने सामंतवादी राजाओं व अंग्रेजों का स्थान ना ले ले पथिक जी की यह आशंका आज कितनी सत्य सिद्ध हुई है यह इस लेख का लेखक आप पाठकों के ऊपर छोड़ता है।इतना ही नहीं भारत के स्वाधीनता संग्राम के नेता समाज सुधारक देश को पहली बार लोक अदालतों का विचार देने वाले गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद के शुद्धि आन्दोलन कार्यों से चिढ़कर जिहादी मुसलमान अब्दुल रशीद ने उनकी हत्या कर दी तो महात्मा गांधी ने अंग्रेजी सरकार से हत्यारे की माफी के लिए पत्र व्यवहार किया जैसे ही पथिक जी को यह पता चला तो पथिक जी ने पत्र लिखकर गांधी जी के इस कृत्य का विरोध किया ।खुद गांधी जी को पत्र लिखकर पथिक जी को सफाई देनी पड़ी कि उन्होंने सरकार के साथ इस संबंध में कोई पत्राचार नहीं किया है लेकिन अपने ‘यंग इंडिया’ अखबार में हिंदू जनता से यह अपील किया विशेष तौर पर आर्य समाजियों से कि वह इस हत्यारे मुस्लिम युवक को माफ कर अहिंसा का परिचय दें ।यह 1926 की घटना है। इसके पश्चात पथिक जी ने राजस्थान आकर अपने अधूरे कार्य को अंजाम दिया इतना ही नहीं काकोरी कांड के कैदियों पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ठाकुर रोशन सिंह अशफाक उल्ला खान आदि को छुड़ाने के लिए भी पथिक जी ने एक व्यापक बौद्धिक अभियान चलाया था ।पथिक जी एक मानवतावादी क्रांतिकारी थे क्रांति में बलिदान होने वाले अनाथ परिवारों का भी वह ख्याल रखते थे उनके लिए तथा संभव आर्थिक सहायता का भी वह प्रबंध करते थे । पथिक जी को समर्पित ‘क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक स्मृति ग्रंथ’ में अनेकों लेख पथिक जी के इस मानवतावादी दर्शन पर प्रकाश डालते हैं।

पाठक जी का जीवन इतना सादा था जैसा अपनी लेखनी से लिखा ऐसा ही तप त्याग सादगी संयम का जीवन उन्होंने जिया उदाहरण के लिए पथिक जी की निम्न प्रसिद्ध रचना।

यश वैभव सुख की चाह नहीं।
परवाह नहीं जीवन ना रहे।।
यही इच्छा है यह है जग में ।
स्वेच्छाचार दमन न रहे।।

उपरोक्त पंक्तियां पथिक जी के जीवन पर ही सार्थक होती हैं। पथिक जी को ‘राजस्थान सेवा संघ’ की ओर से जो 1928 आते-आते भंग हो गया द्वारा ₹10 मासिक खर्च के लिए मिलते थे पथिक जी महज ₹6 महीने पर ही अपना जीवन व्यतीत करते थे ।बाजरे की रोटी प्याज के साथ खाकर वह गुजारा करते थे ।शेष चार रुपए जो बचते थे उन्हें प्रेस आदि के सार्वजनिक कार्य पर खर्च कर देते थे।

अजमेर अजमेर शहीद देश के अन्य हिस्सों के प्रतिभावान छात्रों की मदद पथिक जी करते थे जो धनाभाव में शिक्षा अर्जित नहीं कर पाते थे ।अनेक छात्र-छात्राएं जिनकी मदद पथिक जी ने की कालांतर में वह वकालत, शिक्षा पत्रकारिता व राजनीति में उच्च शिखर पर गए।

पथिक जी सौभाग्य से क्रांतिकारीयो के उस वर्ग से आते थे जिन्होंने आजादी का सूरज देखा लेकिन पथिक जैसे निष्काम कर्म योगी मां भारती के महान सपूत के साथ देश की स्वाधीनता के पश्चात न केवल भारत सरकार बल्कि नवगठित राजस्थान सरकार जिसे आधुनिक स्वरूप पथिक जी के कारण ही प्रकाश में आ पाया और पथिक जी को राजस्थान का दत्तक पुत्र होने का सौभाग्य मिला लेकिन अहो !दुर्भाग्य राजस्थान की सरकार ने अपने इस दत्तक पुत्र के साथ सौतेला ही व्यवहार किया पथिक जी ने उपेक्षा का दंश सहा।पथिक जी का आजादी के पश्चात 7 वर्ष का जीवन उनकी मृत्यु पर्यंत बेहद ही कष्टदायक अभाव में गुजरा लेकिन पथिक जी ने अपने आत्म स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं किया। चालक अवसरवादी लोगों की कभी कमी नहीं रही है कुछ इतिहासकार बताते हैं आजादी के पश्चात अनेक लोगों ने अपने आप को पथिक जी का शिष्य भक्त बता कर बहुत से लाभ सरकारों से अर्जित किये। विडंबना यह है जैसा की इस लेख के लेखक ने अनुभव किया है आज भी पथिक जी के नाम पर बने अनेक संगठन पथिक जी के वैचारिक दर्शन विचारधारा के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं उनकी ऐसी क्या कमजोरी क्या मजबूरी है यह तो वह ही बता सकते हैं।। मैं धन्यवाद देता राजस्थान विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रमुख डॉ रमेश कुमार जैन ,डॉक्टर विष्णु पंकज का जिन्होंने बहुत कुछ पथिक जी पर लिखा है पथिक जी का स्मृति अभिनंदन ग्रंथ भी इन दो महापुरुषों के परिश्रम से ही अनेक दशक पहले प्रकाशित हो सका। सरकार की ओर से अजमेर में ही एक श्रमजीवी महाविद्यालय का नाम उनके नाम पर किया गया और बाकी कुछ ना किया गया या केवल 1991 -92 में उनके नाम से एक डाक टिकट जारी भारत सरकार ने किया। इस लेख के लेखक का इस संबंध में राजस्थान सरकार व अन्य संबंधित सरकारों से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी लेने का प्रयास रहेगा कि पथिक जी की सम्मान में सरकारों द्वारा क्या-क्या कार्य किए गए हैं उदाहरण के लिए कितनी शैक्षणिक संस्थानों कॉलेज विश्वविद्यालय खेल संस्थाओं स्टेडियम या विभागों में योजनाओं का नामकरण पथिक जी के नाम पर है या उनकी प्रतिमा आदि स्थापित की गई है। पथिक जी के स्मृति अभिनंदन ग्रंथ में पथिक जी के विविध कार्यों पर उनके राजनीतिक वैचारिक शिष्यों ने प्रकाश डाला है अनेक संस्मरण साझा किए गए हैं उनकी स्मृति को समर्पित अनेकों स्मृति लेख लिखे गये हैं ।अंत में पथिक जी के आजादी के पश्चात के उपेक्षित जीवन पर उनकी ही लिखी पंक्तियां पथिक जी पर ही दुर्भाग्य से सार्थक होती हैं । जिन्हें पथिक जी ने अन्य क्रांतिकारियों की उपेक्षा पर लिखा था। जो निम्न है।

न भूल जाना खुशी के दिन।
तुम वतन परस्तो के वे फसाने।।
कि जिनके बदले हुए मुयस्सर है।
ये जश्न महफिलें और तराने।।

अंत में 28 मई, 1954 में मां भारती के इस अमर सपूत शस्त्र व शास्त्र धुरंधर कलम व बंदूक के धनी शौर्य वीरता धीरता के पथ के पथिक जिसने क्रांति के इस पथ को ही अपने चरणों से पावन कर उसे शाश्वत काल के लिए सुगंधित कर दिया,अजमेर में ही चिर निद्रा में लीन हो गया।

शहीद विजय सिंह पथिक जी के 144 वें जन्म दिवस पर इस महावीर को मेरा शत-शत नमन! अपनी लेखनी से लेखनी व सशस्त्र क्रांति के धनी इस महान विभूति को मेरी छोटी सी कर्मांजलि।

स्वाधीनता के पावन पथ के पूज्य पथिक की शेष गाथा अन्य लेखों में लिखी जाएगी। तब तक के लिए आप सभी को सादर नमस्ते।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता ग्रेटर नोएडा

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
ikimisli giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
ntvsporbet giriş
fikstürbet giriş
rekorbet giriş
fikstürbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
rekorbet giriş
betpipo giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpipo giriş
ikimisli giriş
nesinecasino giriş
kareasbet giriş
kareasbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
fikstürbet giriş
fikstürbet giriş
safirbet giriş
fikstürbet giriş
rekorbet giriş
betper giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
kareasbet giriş
kareasbet giriş
betbigo giriş
betbigo giriş
betnano giriş
betbigo giriş
betbigo giriş
kareasbet giriş
betbigo giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
oslobet giriş
oslobet giriş
stonebahis giriş
stonebahis giriş
safirbet giriş
oslobet giriş
grandpashabet giriş
milosbet giriş
safirbet giriş
kareasbet giriş
betnano giriş
almanbahis giriş
deneme bonusu
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpipo giriş
stonebahis giriş
parmabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
superbetin giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
superbetin giriş
betwild giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betpark giriş
vaycasino
safirbet giriş
vaycasino
safirbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
rekorbet giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betasus giriş
betnano giriş
betasus giriş