balochistan

आजकल बलूचिस्तान बहुत चर्चा में है। इस समय जब बलूचिस्तान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है और वह पाकिस्तान से स्वतंत्रता चाहता है तो उसके इतिहास को जानने की जिज्ञासा होना भी स्वाभाविक है। लोगों की इस बात में रुचि बढ़ती जा रही है कि अंततः बलूचिस्तान का अतीत क्या है ? सोशल मीडिया पर इस संबंध में जितनी भर भी पोस्टस देखी जा रही हैं, उन सभी में उन निराशाजनक तथ्यों को दोहराने का प्रयास किया जा रहा है जो हमारे देश के वैदिक अतीत के साथ विश्वासघात करने वाले इतिहासकारों या लेखकों द्वारा स्थापित कर दिए गए हैं। इसके उस गौरवशाली इतिहास को नहीं बताया जा रहा है, जब यह भारत के आर्यावर्त या जंबूद्वीप का एक भाग हुआ करता था।

हमें यह तथ्य ध्यान रखना चाहिए कि यदि बलूचिस्तान के इतिहास के साथ गद्दारी की गई है तो वह मुस्लिम इतिहास लेखकों द्वारा की गई है। बलूचिस्तान प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यह आर्य राजाओं या सम्राटों के अधीन रहा है और भारत के वैदिक दर्शन और चिंतन को प्रमुखता से प्रचारित प्रसारित करने का दीर्घकाल तक कार्य करता रहा है। हमारा आपका यदि थोड़ी सा भी भारतीय इतिहास और इतिहास की परंपराओं में विश्वास है तो वर्तमान काल में इतिहास संबंधी स्रोतों के माध्यम से जिस प्रकार भारतीय इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने का काम निरंतर जारी है, उस पर हमें नए दृष्टिकोण और नई सोच के साथ अपना मत स्थापित करना चाहिए।

हमें विकिपीडिया बताता है कि “प्रागैतिहासिक बलूचिस्तान का इतिहास पुरापाषाण काल से ही है।” इस संबंध में हमें ध्यान रखना चाहिए कि ‘ पुरापाषाण’ नाम का कोई काल नहीं है। वैदिक दृष्टिकोण से आप देखेंगे तो सृष्टि के प्रारंभ से आज तक कालों का विभाजन पुरापाषाण काल या उत्तर पाषाण काल आदि के नाम से कहीं नहीं किया गया है। हमारे यहां मन्वंतर, युग आदि की व्यवस्था है। उस पर हमको चिंतन मंथन करना चाहिए और उसके दृष्टिकोण से इतिहास और इतिहास की परंपराओं का समीक्षण करना चाहिए। मानव जाति के ज्ञात इतिहास के प्रत्येक युग में हमने ज्ञान विज्ञान के कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इस बात के दृष्टिगत इतिहासकारों की इन कपोल कल्पनाओं पर विश्वास नहीं करना चाहिए कि एक युग ऐसा था जब मनुष्य के पास अग्नि का ज्ञान नहीं था, या औजार बनाने का ज्ञान नहीं था या अमुक – अमुक कमियां उसके ज्ञान में थीं ?

इसके विपरीत हमें यह मानना चाहिए कि सृष्टि के प्रारंभ से ही मनुष्यों को ज्ञान – विज्ञान की गंभीरतम जानकारी थी । इसलिए किसी काल में मनुष्य के पास औजार नहीं थे या उसका अग्नि से परिचय नहीं था या उसके बौद्धिक विवेक की सीमाएं बहुत सीमित थीं आदि आदि पर अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करनी चाहिए। समझना चाहिए कि जिस मानव जाति को परमपिता परमेश्वर ने सृष्टि के प्रारंभ में वेद जैसा ग्रंथ दिया जो ज्ञान विज्ञान का भंडार है, उस मानव जाति को इस प्रकार की अवैज्ञानिक पद्धतियों में विभाजित करना मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

ऐसी परिस्थितियों में हमें बलूचिस्तान के बारे में समझना चाहिए कि यह कभी आर्यावर्त और जंबूदीप का ही एक भाग रहा है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र का कोई अन्य नाम हो सकता है। उस पर अनुसंधान होना चाहिए।
हमें बताया जाता है कि “बलूचिस्तान में लगभग 7000 ईसा पूर्व की प्राचीन मानव बस्तियों के प्रमाण मिले हैं।” इस तथ्य को हमें इस दृष्टिकोण से समझना चाहिए कि इस समय भारत का वैदिक सृष्टि संवत एक अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार 126 वां चल रहा है। यदि मानव मानव जाति का इतिहास इतना पुराना है तो हम बलूचिस्तान के इतिहास को पिछले मात्र 7000 वर्ष के इतिहास में समेट कर नहीं देख सकते। विशेष रूप से तब जब यह मानव सृष्टि की निर्माण स्थली अर्थात भारत देश के सबसे अधिक निकट रहा हो या उसका एक भाग रहा हो। निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि ऐसी परिस्थितियों में यहां पर भी मानव जाति के लोगों ने इतने दीर्घकाल में अनेक प्रकार के कीर्तिमान स्थापित किए होंगे। उनके उन सारे प्रयासों, कीर्तिमानों और इतिहास बनाने के महत्वपूर्ण कार्यों को उपेक्षित कर आप केवल पिछले 7000 वर्ष में इस क्षेत्र के इतिहास को समेट कर नहीं देख सकते। जिन मूर्खों ने मानव सृष्टि को पिछले 5000 से 10000 वर्ष के कालखंड में समेटने का अतार्किक कार्य किया है, उनकी दृष्टि से बलूचिस्तान का इतिहास पिछले 7000 वर्ष में समेटने का काम केवल इसलिए किया गया है कि इस पर भारत की दावेदारी किसी प्रकार की न बनने पाए।

भारत की सभ्यता संस्कृति के तथ्यों के साथ खिलवाड़ करने वाले मूर्ख इतिहासकारों ने ग्रीक को बहुत कुछ अधिक बढ़ा- चढ़ाकर प्रस्तुत करने का काम किया है। इसके पीछे केवल एक धारणा है कि प्राचीन काल में केवल एक भारत ही मानव जाति के ‘पिता’ के रूप में दिखाई नहीं देना चाहिए । इसके विपरीत सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए। इस मानसिकता के फलस्वरुप ग्रीक को भी एक प्राचीन सभ्यता के रूप में अर्थात मानव जाति के एक और पिता के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया है। ऐसे लोगों की मान्यता है कि “ग्रीक ऐतिहासिक अभिलेखों में इस क्षेत्र के अस्पष्ट संकेत लगभग 650 ईसा पूर्व में पाए गए थे।”

इस प्रकार के तथ्यों को समझने, पढ़ने और देखने से हमारी बुद्धि चकरा जाती है । विमर्श को कुछ इस प्रकार से स्थापित किया जाता है कि हम जो कुछ लिखा होता है उसी के साथ अपनी बुद्धि को समन्वित करते चले जाते हैं। हमारी बुद्धि धोखा खा जाती है। दृष्टि धोखा खा जाती है और हम वही सोचने व बोलने लगते हैं जो हमें सोचने व बोलने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस संदर्भ में हमें ध्यान रखना चाहिए कि ग्रीक से पहले भारत है न कि भारत से पहले ग्रीक। दोनों एक साथ फलने – फूलने वाली सभ्यताएं भी नहीं हैं । ग्रीक ने भारत से बहुत कुछ सीखकर यदि बाद में अपने आप को थोड़ा बहुत विकसित कर लिया तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि वह भारत के बराबर की समृद्ध सभ्यता बन गई या वह भारत को टक्कर देने वाली सभ्यता में कभी सम्मिलित रही है?
बलूचिस्तान के बारे में हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह बलोच शब्द मुसलमानों द्वारा दिया गया शब्द है। इससे पहले के लोगों को बलोच नहीं कहा जाता था। स्पष्ट हुआ कि प्राचीन काल में जब यहां के लोग आर्य संस्कृति में विश्वास रखते थे, तब वह सिंध प्रांत के ही अधीन रहते थे।

हम भारतवासियों को उस समय के बारे में विचार करना चाहिए जब सिंध प्रान्त के लोग इस विस्तृत प्रांत में एक भारतीय के रूप में विचरण करते थे। उसके बाद के उस काल पर भी हमें विचार करना चाहिए जब यहां पर इस्लाम को मानने वाले लोगों के आक्रमण हुए और उन्होंने विभिन्न प्रकार के संकटों से जूझते हुए अपने धर्म और अपनी संस्कृति को बचाने का हर संभव प्रयास किया। परंतु काल के थपेड़े खाते-खाते वह अपने गौरवशाली वैदिक अतीत से काट दिए गए। आज के बलोच लोग इस बात के लिए धन्यवाद के पात्र हैं कि वह अपने वैदिक अतीत को जानने के प्रति उत्सुकता रखते हैं। भारत को भी उन्हें अपना समर्थन देना चाहिए और इस दृष्टिकोण से देना चाहिए कि हमारा आपका इतिहास सांझा है। इतिहास की परंपराएं सांझी हैं ।तभी एक स्वतंत्र बलूचिस्तान भारत समर्थक राष्ट्र के रूप में भारत के लिए हितकारी हो सकता है। अन्यथा वही गलती हम कर सकते हैं जो हमने बांग्लादेश को स्थापित करके की थी, जिसे कुछ देर पश्चात ही पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर भारत के विरोध में गाना बजाना आरंभ कर दिया। पाकिस्तान तो टूटना चाहिए परंतु उसके टूटने के बाद बलूचिस्तान सदा भारत के समर्थन में खड़ा रहे, इसके लिए उसके राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास में भी व्यापक परिवर्तन करने की आवश्यकता है। उसे यह बताना आवश्यक है कि वह पाकिस्तान का तो कभी भाग नहीं रहा, परंतु भारत का भाग इतनी गहराई से रहा है कि उसके भारत से संबंधों की अविच्छिन्न श्रृंखला पर यदि काम किया जाए तो वह दोनों देशों के लिए काम आ सकती है।
आज की परिस्थितियों में बलूचिस्तान को अपना सही इतिहास पढ़ना होगा, तभी वह और भारत मिलकर विश्व के लिए कुछ अच्छा कर पाएंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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