प्रयागराज, तीर्थराज और त्रिवेणी संगम की वास्तविकता, भाग – 2

triveni-Sangam-2

महाकुंभ पर ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को चुनौती

सनातन जीवन की एक शैली है । जिसे अपनाकर मनुष्य अपने परमध्येय अर्थात मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। हम बहुत सौभाग्यशाली हैं कि हम उन ऋषि पूर्वजों की संतानें हैं जिन्होंने हमारे जीवन का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति रखा है। इसी मोक्ष की प्राप्ति के लिए मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति इस साधना करनी होती है। वैदिक वांग्मय में अध्यात्म का जितना उच्च कोटि का महत्वपूर्ण विवरण उपलब्ध है,उतना संसार के किसी भी अन्य साहित्य में नहीं मिलता। उपनिषदों में ऋषियों ,महर्षियों ने केवल इसी विषय को विविध प्रक्रियाओं के रूप में प्रस्तुत किया है । इसी विषय को लेकर महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन की रचना की है। योग दर्शन को अध्यात्म के उच्चतम शिखर को प्राप्त करने के लिए एकमात्र निश्रेणी(सीढी,नशेनी) कहना उचित होगा। ‌

योग दर्शन में प्रत्येक व्यक्ति को सुख तथा आनंद कैसे प्राप्त हो सकता है , इसे अनेक रूपों और अवस्थाओं में प्रस्तुत किया गया है। बहुत स्पष्ट किया जाता है कि लौकिक साधनों से अर्थात जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु आदि प्रकृति जन्य सांसारिक साधनों से प्राप्त सुख में बार-बार दु:ख की आवृत्ति होती रहती है। इन भौतिक साधनों के संसर्ग और संपर्क से कभी भी द्वंद्भाव समाप्त नहीं होता। द्वंद्वभाव का अभाव ही परमानंद की उपलब्धि है और वह परमानंद उसी से प्राप्त हो सकता है जो स्वयं द्वंद्व से दूर हो। इसी को ऋषियों ने विक्षेप का संक्षेप होते-होते सर्वथा निक्षेप हो जाना कहा है। इसी अवस्था को योग की अवस्था कहा जाता है। यह किसी तीर्थ से या किसी त्रिवेणी से स्नान करने के उपरांत प्राप्त नहीं होती। यह हमारे आंतरिक जगत की वस्तु है। जो अंतर में ही आत्मा की आत्मा बनकर रहने वाले परमात्मा के सानिध्य से ही प्राप्त होनी संभव है। इसके लिए जगत को भरमाना या जगत में भटकती रहना उचित नहीं है। इस पर आज के समाज को अवश्य ही चिंतन करना चाहिए ।

सांसारिक वस्तुओं में मिलने वाले सुख में स्थायित्व नहीं है । जैसे शरीर की क्षुधा को शांत करने के लिए भोजन लिया जाता है और उससे कुछ समय के लिए शरीर को सुख प्राप्त होता है, लेकिन कुछ कालोपरांत फिर भूख लगती है। तब फिर हम खाते हैं। इसका तात्पर्य हुआ कि भोजन खाने के बाद थोड़े से समय के लिए सुख मिला, क्षुधा निवृत्ति हुई , परन्तु भूख फिर भी निश्चित रूप से आएगी । ऐसे ही प्रकृति अथवा उससे बने हुए पदार्थ का अग्नि, जल, वायु आदि का सुख थोड़े समय के लिए मिलता है। उसके बाद दु:ख आएगा।वास्तविक सुख अथवा आनंद ( मोक्ष )की प्राप्ति तो केवल परमात्मा के सानिध्य में ही प्राप्त हो सकती है। क्योंकि परमात्मा स्वयं आनंद स्वरूप है और जो जिसके पास होता है वह वही तो दे सकता है। यदि व्यक्ति आनंद चाहता है तो उसको आनंदस्वरूप के पास जाना होगा। उसकी शरण लेनी होगी। उसकी कृपा का पात्र बनना होगा। ईश्वर प्रणिधान और ईश्वर के समक्ष समर्पण शुद्ध भाव से करना होगा।

इसके लिए योग दर्शन में इस बात का भी विधान किया गया है कि पांच प्रकार के क्लेश (अस्मिता ,अविद्या, राग , द्वेष और अभिनिवेश) तथा कर्म आदि से अपरामृष्ठ (अछूत पुरुष) विशेष को परमात्मा कहा जाता है । परमात्मा मोक्ष सुखदाता,सर्वज्ञ,सर्वशक्तिमान, महत्परिमाण,सत्यसंकल्प, शुद्ध बुद्ध तथा आनंदस्वरूप है , जबकि जीवात्मा अल्पज्ञ, अल्प शक्तिमान, अणुपरिमाण,मिथ्या ज्ञान ,राग, द्वेष ,प्रमाद आदि से पूर्ण एवं सुख-दुख से ग्रस्त है। अतः स्पष्ट हुआ कि क्लेश आदि जीवात्मधर्मो से सर्वथा अछूत ,अलिप्त,(अपरामृष्ट) रहने के कारण अत्यंत विशिष्ट तत्व ईश्वर है। ‌ तैत्तिरीय उपनिषद (3-6) में आया है कि “आनंदो वै ब्रह्मा ” अर्थात जिसमें आनंद ही आनंद है, निश्चित रूप से वही ब्रह्म है। इस आनंद का अर्थ यहां मोक्ष समझना आवश्यक है। क्योंकि मोक्ष परमानंद है,तो आनंद अथवा मोक्ष केवल ईश्वर ही दिला सकता है।

इसी उपनिषद में (2–7) आया है कि “रसो वै स:” वह निश्चित रूप से सभी रसों का रस है। उसमें से ही सब रस अर्थात आनंद प्राप्त होता है। उसी को पाकर और पीकर जीवात्मा आनंदमय होता है। इसके अलावा “रसं ह्वोवायं लब्ध्वानंदी भवति” कहां गया है। अर्थात ऐसे रस के उपलब्ध होने पर ही आनंद होता है। ऋग्वेद (7-11-1) में आया है कि “ऋते त्वदमृता मादयंते” अर्थात ईश्वर को प्राप्त किए बिना जीवात्मा आनंद को प्राप्त नहीं कर सकता। यजुर्वेद( 31 -18) “त्वमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्य पंथा विद्यतेअयनाय” ईश्वर के मार्ग के अतिरिक्त उसको प्राप्त करने का अन्य कोई पथ नहीं है।
कुंभ हो अथवा महाकुंभ हो अथवा समाधि हो,इनमें से कौन सा ऐसा साधन है जो ब्रह्म से साक्षात्कार करा सकता है ? परमात्मा के परमधाम, परम आनंद, मोक्ष को प्राप्त करा सकता है ! इस पर आज के पौराणिक साधु संन्यासियों को समाज का मार्गदर्शन वैदिक दृष्टिकोण से करना चाहिए। वैसे भी महाकुंभ जैसी परंपरा का शुभारंभ इसीलिए किया गया था कि इसमें किसी भी प्रकार के वेद विरुद्ध आचरण, परंपरा अथवा प्रक्रिया पर चिंतन हो और जो सत्य के अनुकूल हो, उसे समाज के लिए एक मान्य नियम के रूप में अपनाने के लिए दिया जाए।

दु:ख की बात है कि हमारे पौराणिक साधु सन्यासी इस ओर ध्यान नहीं देते । वे परंपराओं को ही सनातन मान रहे हैं। आर्य समाज के लोग इसीलिए इनको अज्ञानी और अविद्या से युक्त कहते हैं । तब इनको आर्यों से, आर्य समाजियों से विशेष द्वेष होता है। क्योंकि इनको अपनी दुकान बंद होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। ये मोक्ष नहीं दे रहे लोगों को , अपितु लोगों को भ्रमित सोच दे रहे हैं। ये लोगों को बहका कर धन ऐंठ रहे हैं। जिनका महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी महाराज ने अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में घोर विरोध किया है। आर्य समाज के वैदिक विद्वान कहते हैं कि ब्रह्म की समस्त क्रियाओं का लक्ष्य ब्रह्म का साक्षात्कार ही तो है और जहां ब्रह्म से सानिध्य एवं साक्षात्कार हुआ वहीं व्यक्ति आनंद से आप्लावित हो जाता है। व्यक्ति का यह उद्देश्य केवल और केवल योग से ही संभव है । महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन में चार अध्याय प्रथम समाधि पाद दूसरा साधन पाद ,तीसरा विभूति पाद, चौथा कैवल्यपाद‌ लिखा है।

कैसी विडंबना है कि पौराणिक साधु इनके विपरीत जाकर केवल गंगाजल के दर्शन करने मात्र से ही मोक्ष प्राप्त करने की बात कर रहे हैं। जबकि कैवल्य, मोक्ष रूप परमानंद की प्राप्ति योग का सर्वोच्च लक्ष्य है। मैं अपने पौराणिक साधुओं से पूछना चाहता हूं कि क्या गंगाजल में स्नान करने से ब्रह्म का सानिध्य एवं साक्षात्कार हो जाता है? क्या बिना समाधि के, बिना योग में जाए, बिना वैराग्य के, बिना तत्वज्ञान के, बिना अविद्या को दूर किये तथा बिना क्लेशों को समाप्त किये, ईश्वर के साथ योग संभव है ,मुक्ति संभव है ? इन पौराणिक संतों से यह भी पूछा जाए कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान ,समाधि, आठ जो योग के अंग हैं, इनके बिना चित्त की शुद्धि होकर प्रकृति और पुरुष (साधारण जीवात्मा पुरुष और परमपुरुष परमात्मा) का विवेक प्राप्त हो जाएगा क्या ? जबकि इसको प्राप्त करने के लिए विवेकख्याति बहुत आवश्यक है। इसका उत्तर केवल आर्य समाज के पास है ।केवल आर्य समाज ही यह कहता है कि सत्य ,अहिंसा आदि पांच यम और शौच ,संतोष आदि पांच नियमों के अनुष्ठान से ही चित्त की चंचलता दूर होती है। विविध प्रकार के सुखों की प्राप्ति भी होती है। जिसमें मोक्ष भी शामिल है। जल से केवल मल धोए जाते हैं। शरीर की स्वच्छता की जाती है। उससे चित्त की चंचलता दूर नहीं होती। चित्त की चंचलता के दूर हो जाने पर ही वह धारणा के योग्य हो जाता है। उसके पश्चात इंद्रियों की बहिर्मुखी प्रवृत्ति का निरोध हो जाने पर वे अंतर्मुखी हो जाती हैं। जिससे मनुष्य जितेन्द्रियता को प्राप्त हो जाता है। जो प्रत्याहार की स्थिति है। इसके बाद अंतर्मुखी वृत्ति होने पर धारणा, ध्यान और समाधि आती है। जिस समय चित्त किसी एक स्थान पर टिकता है, वह धारणा है और इस पर चित एक समय विशेष तक एकाग्र होता रहे वह ध्यान है। यह योग की सातवीं सीढ़ी (निश्रेणी) है। इसके बाद समाधि है।

समाधि भी दो प्रकार की अर्थात सबीज समाधि, निर्बीज समाधि अर्थात संप्रज्ञात समाधि असंप्रज्ञातसमाधि। ‌ इसी विषय पर व्यासभाष्य, तत्ववैशारदी, योगवार्तिक आदि संस्कृत में अनेक टिकाएं लिखी गई हैं। लेकिन इन पौराणिक संतों ने तो इन पुस्तकों के नाम भी नहीं सुने होंगे। इतने उच्च कोटि के ज्ञान की बात कैसे ये कर सकते हैं! इनसे कैसे तत्वज्ञ होने की अपेक्षा की जा सकती है ?

भटकना है नहीं जग में,
रे मनवा चल शरण उसकी।
कुछ तो सोच ले पगले,
मिली क्यों देह मानव की।।

करता क्यों तू नादानी,
समय को व्यर्थ में खोता।
समाधि छोड़कर अपनी,
लगाता नदियों में गोता।।

– देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
ग्रेटर नोएडा
‌चलभाष ‌‌ ‌ 9811838317,7827681439

Comment:

İmajbet giriş
İmajbet giriş
Safirbet giriş
Safirbet giriş
İmajbet giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
betpark giriş
Hitbet giriş
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
hitbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
casibom
casibom
casibom giriş
casibom giriş
casibom
casibom
hititbet giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
yakabet giriş
bahisfair giriş
bahisfair
betnano giriş
betorder giriş
betorder giriş
timebet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
timebet giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
hititbet giriş
betorder giriş
betorder giriş
vaycasino
vaycasino
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
kolaybet giriş
betpark
betpark
vaycasino
vaycasino
betgaranti
casibom
casibom
casibom
casibom
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
casibom giriş
betplay giriş
betplay giriş
roketbet giriş
casibom giriş
casibom giriş
betorder giriş
betorder giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
fixbet giriş
fixbet giriş
fixbet giriş
fixbet giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
casibom güncel giriş
casibom giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino