स्वामी भीष्म जी महाराज का जीवन परिचय

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सदा सुख शांति फैले मेरे भगवान दुनिया में। बनावे फिर से हम अपने वतन की शान दुनिया में। व्रतधारी, सदाचारी बने नर नार भारत में। वेद विद्या पढ़े सीखे ज्ञान विज्ञान दुनिया में। बहे दुध की नदियां मेरे इस देश भारत में। पशु, पक्षी गऊ माता ना हो कुर्बान दुनिया में। एशिया सर्व यूरोप में फहरावे ओ३म् का झंडा। वेद की शिक्षा के हित भाई करै सब दान दुनिया में। सकल विश्व के नर नारी रहे आजाद होकर के, कहै “भीष्म” घर -२ हो वेद व्याख्यान दुनिया में।।

“स्वामी भीष्म जी” आपकी गणना आर्य समाज व आधुनिक भारत के निर्माताओं में होती है। स्वामी जी ने भारत के पुर्नउत्थान तथा सामाजिक ,धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक पुर्नजागरण में अद्वितीय योगदान दिया है। आर्य समाज में ८० से ज्यादा भजन मंडलियां तैयार कर स्वतंत्र रुप से वेद प्रचार के लिए भेजी। जिन्होने हरियाणा समेत उत्तर भारत के अमूमन राज्यों में ख़्याती प्राप्त की है।

जन्म

सन् १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के ठीक दो वर्ष बाद इस महान क्रांतिकारी जन्म हुआ। इनका जन्म सम्वत् १९१५ विक्रमी, मास चैत्र, कृष्ण पंचमी, दिन रविवार अर्थात मार्च १८५९ में हरियाणा के कुरूक्षेत्र जिले के तेवड़ा नामक गांव में हूआ। ये एक निर्धन परिवार था। इनके पिता जी श्री बारु राम था जो की कट्टर सनातनी थे। स्वामी भीष्म जी का बचपन का नाम लाल सिंह था। स्वामी जी के पिता जी शिव के उपासक थे। समाज में प्रचलित रीति रिवाजों एवं मूर्ती पूजा में उनका अटूट श्रद्धा थी।

स्वामी भीष्म जी की माता जी का नाम पार्वती देवी था। जो की एक विनम्र, सुशील, तथा धार्मिक विचारों की आदर्श भारतीय नारी थी। इनकी माता इन्हें स्वामी दयानंद की तरह हष्ट पुष्ट पहलवान आजीवन ब्रह्मचारी और सन्यासी बनाना चाहती थी। साथ ही वह रुढीवादी ब्राह्मत्व के प्रभाव को पूर्णयता समाप्त करने के लिए अपने पुत्र को तर्क विद्या एवं शास्त्रों की विद्या से परिपूर्ण एक प्रकांड पंडित बनाना चाहती थी। माता के अथक प्रयत्न व उनके प्रभाव के कारण ही स्वामी भीष्म यह सब बन पाये थे। बच्चों में प्राय: जो आदते होती है। जैसे कुश्ती लड़ना, कबड्डी खेलना, दौड़ना, व्यायाम करना भजन, गाने संगीत सुनना इत्यादि ये सब स्वामी भीष्म में भी थी। गाने भजन व संगीत सुनने की में इनकी विशेष रुची थी।

शिक्षा

स्वामी जी ने प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव के पंडित चन्दनराम से प्राप्त की। कुछ समय इन्होने साधु पाठशाला हरिद्वार में भी शिक्षा ग्रहण की। तदन्तर इन्होने वेदांत की अनेक पुस्तको का स्वाध्याय किया और साथ ही गाने बजाने का अभ्यास भी। ग्यारह वर्ष की आयु से ही भजन गाने लग गए थे। इनकी आवाज शुरू से ही सुरीली थी। धीरे धीरे ये उच्च कोटी के गायक बन गए। स्वामी जी में देश भक्ति की भावना कुट कुट कर भरी हूई थी। सन् १८७८ ई० में ये क्रांतिकारियों से प्रभावित हो कर कानपुर जाकर ६२ न० पलटन में भर्ती हो गए थे। पौने दो वर्ष तक फौज में नौकरी करने के बाद वे बंदुक लेकर फरार हो गए एवं क्रांतिकारियों के साथ मिल गए।

सन्यास ग्रहण

स्वामी भीष्म जी सन् १८८१ ई० में सन्यासी योगीराज जी के पास बल्ली गोहाणा पहूंचे। इन्होने योगीराज से प्रार्थना की कि वे इन्हें अपना शिष्य बनाकर इनका जीवन सफल बनाएं। परंतु सन्यासी योगीराज ने इनकी यौवन अवस्था बलिष्ठ शरीर एवं पहलवानी के कारनामों को जानकर यह संदेह हो गया था कि शायद ये सदाचारी ना रह सकें। अत: सन्यासी योगीराज ने इन्हें सन्यास देने से मना कर दिया। स्वामी भीष्म जी ने बार बार उनसे निवेदन किया परंतु वे मना करते रहे। एक दिन स्वामी भीष्म ने योगीराज जी से कहा मैने दृढ़ निश्चय किया है कि मैं सन्यासी ही बनूंगा। आप जो इसके लिए शर्त रखे मुझे मंजूर है। तब स्वामी योगीराज ने कहा आप अपनी इन्द्री में छेदन कर ले तो मैं आपको सन्यास दे सकता हूं। स्वामी भीष्म जी ने यह शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली। परिणाम स्वरुप इन्होने इंद्री निग्रह की कड़ी शर्त पूरी करके सन्यास ग्रहण किया और इनका नाम आत्म प्रकाश रखा। लेकिन आगे चलकर ये सन्यासी “भीष्म ब्रह्मचारी” के नाम से विख्यात हूए।

आर्य समाज में प्रवेश

सन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी जी इकतारा लेकर भजन गाते थे। सन् १८८६ में रोहतक का एक लड़का ज्ञानी राम सत्यार्थ प्रकाश लेकर आया। बोला स्वामी जी इसको पढ़ा दो। स्वामी जी ने उस लड़के को साफ मना कर दिया। क्योंकि स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश को हाथ लगाना भी पाप समझते थे। दूसरे दिन वह दो आदमियों को लेकर आ पहूंचा ओर कहा कि आप कहा करते हैं कि कमल का फुल जल में ही रहता है, लेकिन उसके उपर जल का कोई असर नही होता, इसी प्रकार आपके सत्यार्थ प्रकाश का प्रभाव नही पड़ेगा। उनके काफी आग्रह करने के बाद स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ाना आरम्भ किया
उसको पढ़ाने के चक्कर में स्वामी जी ही पढ़े गए। और खुद स्वामी जी आर्य समाज के रंग में रंगे गए।

लेखन कार्य

वस्तुत: स्वामी भीष्म जी ने भजन मंडलियों द्वारा सामाजिक व धार्मिक क्रांति एवं स्वतंत्रता आंदोलन के स्वरों को समाज में गुंजित किया और राष्ट्रिय चेतना जागृत की। स्वामी जी ने क्रांतिकारी एवं राष्ट्रीयता से सम्बधिंत विषयों पर पुस्तकें लिखी है जिनमें हजारो ही कविताएं एवं भजन संकलित हैं। कुछ प्रमुख पुस्तकें निम्नलिखित हैं :- स्वतंत्र भारत, नौजवानो को आह्वान, क्रांति का बिगुल, क्रांति का गोला, भयंकर तूफान, शहीदों के जीवन, भीष्म के तारे, भीष्म की गर्ज, भीष्म की दहाड़, भीष्म की तड़फ, भीष्म की धुम, भीष्म की तोप, विश्व प्रकाश अप्रकाशिक भीष्म भजन भंडार भाग १व २ तथा इनकी एक पुस्तक “”प्रमाण”” जो कि शास्त्रार्थ पर है। ये पुस्तक श्री जगदेव सिंह सिद्धांति जी ने अपनी सम्राट् प्रेस में छापी थी।

क्रांतिकारियों से मिलनसार

सन् १९२० से सन् १९३४ तक स्वामी भीष्म जी करैहड़ा गांव से समीप, गाजियाबाद उत्तर प्रदेश जंगल में कुटिया बना कर रहे। यहां इनसे भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, अश्फाक उल्लां खां लाल बहादुर शास्त्री, तथा चौधरी चरण सिंह आदि क्रांतिकारी यहां आकर सहयोग प्राप्त करते थे। और भविष्मयी योजनाएं बनाते थे। ये कुटिया क्रांतिकारियों का अड्डा बन गई थी। १० सितम्बर १९२२ को स्वामी भीष्म जी ने अमृतसर में सिक्खों के धर्म युद्ध में भाग लिया, इन्होने गुरु का बाग घायल सिक्खों को सहायता एवं सांत्वना दी।

सन् १९३६ में स्वामी जी ने घरौंडा करनाल में भीष्म भवन बनाया और उसी दिन तिरंगा फहरा दिया। यह झंडा अंग्रेज अधिकारियों, पुलिस आदि के विरोध के बावजूद आजादी आने तक शान से फहराता रहा।

सन् १९३८ में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में दिल्ली में एक अखिल भारतीय नौजवान सम्मेलन हूआ। उस सम्मेलन में स्वामी जी ने मंच से एक क्रांतिकारी कविता सुनाई। तब नेता जी ने स्वामी जी से कहा कि वे इस कविता की अंतिम पंक्ति “जवानी सफल हो सेना के तैयार से” को सार्थक कर दिखाएंगें। नेता जी के इसी दृढ़ संकल्प का परिणाम था द्वितीय महायुद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज का गठन तथा भारत को स्वतंत्र करने के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। भारत आजाद हो गया लेकिन जिसका इंतजार पुरे आर्यावर्त यानी भारत को था उस वीर बहादुर बोस की याद में स्वामी जी ने भजन गाकर सुनाया था। जो आज भी बेहद लोकप्रिय है।

देश स्वतंत्र आज है- मां के सर पर ताज है।
भारतीयों का राज है- पर आने वाला आया ना ।। टेक ।।

पानी की तरह खून बहाया बाग के सच्चे माली ने।
भारत को आजाद किया है उस प्यारे बंगाली ने।
पापों का घट फोड़ गया, मां का बंधन तोड़ गया।
ना जाने किस ओड़ गया जो आकर दर्श दिखाया ना।।1।।

चालीस करोड़ भाईयों के दुख को उसने अपना दुख समझा।
आजादी के लाने को ही महावीर ने सुख समझा।।
तज के घर को बार गया-सात समुन्दर पार गया,
भारत का भार उतार गया-पर आजादी सुख पाया ना।2।

कस्तूरी की शुद्धि सुगन्धि छुपती नहीं छुपाने से।
इसी तरह से चश्मे वाला भी रूकता ना आने से।
शान वतन की बोस था, ब्रह्मचारी निर्दोष था,
होके गया रूपोष था-जो मरने से घबराया ना।।3।।

नर नारी बेचैन वतन के करें वसु को याद सभी।
कहाँ छुपे हो आ जाओ अब हो गये हैं आजाद सभी।।
कोई कहे कि मर गया हमें स्वतंत्र कर गया।
भीष्म सुनकर डर गया-जब किसी ने पता बताया ना।।4।।

इतने करूणा भरे शब्द सुनकर श्रोताओं के आंसू निकल आते थे।

अंधविश्वास मिटाया

एक बार स्वामी जी उत्तर प्रदेश के किसी गांव में गए हुए थे। पंडित चन्द्रभानु भी स्वामी जी के साथ थे। गांव में नौगजे सैयद का खौफ था। प्रचार में स्वामी जी ने भुत प्रेत का खंडन किया तो एक आदमी रोने लगा। वह एक मुस्लिम कुंजड़ा था। उसने एक आमों का बाग ले रखा था। वो बोला महात्मा जी हमारे बाग में नोगजे सैयद आते हैं। पेड़ तोड़ जाते हैं। आम तोड़ कर ले जाते हैं। हम वहां रात को सो नहीं सकते। स्वामी जी बोले – हमे दिखाओ। अगली रात को स्वामी जी के साथ पांच व्यक्ति गए। जेली गंडास ले ली। बाग के पास छिपकर बैठ गए। रात के ठीक १२ बजे चांद निकला। ३ नो गजे सैयद आए। उनके पाजामें बहुत लम्बे थे। कुर्ता मनुष्य जैसा। स्वामी जी ने कहा इनके पाजामें व कुर्ते में इतना फर्क क्यों हैं। स्वामी व इनके साथियों ने उन पर हमला बोल दिया। एक एक जेली में तीनो नो गजे गीर गए। हाथ जोड़कर बोले हम निकट गांव के नट हैं। पैरों में लम्बे बांस बांधकर लट्ठे का थान पैरो पर लपेट लेते हैं। हमारे पास पैसे नहीं थे। एक सप्ताह पूर्व इनसे २० सेर आम उधार लेने आए थे। इन्होने मना कर दिया। अगले दिन हमने इनको आकर डराया की हमारे दादा जी कहते हैं की इस बाग में नो गजे सैयद रहते हैं। अगली रोज हम भेष बदलकर आए ओर आम तोड़कर ले गए। हम अचारी आम आस पास के गांव में बेच देते हैं। हमे छोड़ दो। स्वामी जी बोले गांव में चलो। लोगो का भ्रम मिटाना है। इन कुंजड़ो की भरपाई कर देना। उनके हाथ बांधकर गांव में लाया गया। पंचायत ने उन पर जुर्माना लगाया। तब स्वामी जी ने कहा भूत बीते समय काल का वक्त है। भूत प्रेत से बचना चाहते हो तो आर्य बनो। ताकि पाखंड से पीछा छुटे।

स्वामी जी के शिष्य

स्वामी भीष्म जी ने ८५ सफल आर्य भजनोपदेशक तैयार किये। स्वामी जी के शिष्यों की सूची बहुत लम्बी है। लेकिन इनमे से प्रमुख हैं :- पंडित हरिदत्त जी, पंडित ज्योतिस्वरुप मानपुरा, स्वामी रामेश्वरानंद जी, पंडित चन्द्रभानु आर्योपदेशक, महाशय परमानंद आर्य, चौधरी नत्था सिंह, स्वामी रुद्रवेश जी, रामस्वरुप आजाद, पंडित ताराचंद वैदिक तोप,रतीराम,स्वामी विद्यानंद, स्वामी ब्रह्मानंद, मनीराम बागड़ी, रामचन्द्र जी विक्कल, ज्ञानी जैल सिंह, इत्यादि स्वामी भीष्म जी के प्रसिद्ध शिष्य रहे हैं।

सम्मान प्राप्ति, देह त्याग

स्वामी भीष्म जी की सेवाओं को देखते हूए २१ मई १९८१ को हरियाणा सरकार ने स्वामी जी महाराज का नागरीक अभिनन्दन कुरूक्षेत्र की भूमी पर किया। जिसमे तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री श्री ज्ञानी जैल सिंह ने स्वामी भीष्म जी महाराज को एक कर्मठ देश भक्त उच्च कोटी का समाज सेवक बताते हूए उनकी सेवाओं को याद किया।

८ जनवरी सन् १९८४ दिन रविवार को भीष्म भवन घरौंडा में स्वामी जी महाराज का शरीरांत हूआ। इस प्रकार देश का एक महान क्रांतिकारी सन्यासी अपना कार्य कर विदा हूआ। वस्तुतः स्वामी भीष्म जी ने अपने नि: स्वार्थ सेवा, त्याग, भावना से जो परोपकार के लिए जीवन बिताया है। उनका ये समाज सदैव ऋणी रहेगा। मेरा स्वामी जी को शत शत नमन। वैदिक धर्म की जय।

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