वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान व सत्य विद्या के ग्रन्थ हैं

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संसार में जितनी भी ज्ञान की पुस्तकें हैं वह सब मनुष्यों ने ही लिखी व प्रकाशित की हैं। ज्ञान के आदि स्रोत पर विचार करें तो ज्ञात होता है कि सृष्टि की उत्पत्ति व मानव उत्पत्ति के साथ आरम्भ में ही मनुष्यों को वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ था। जो लोग नास्तिक व अर्ध नास्तिक हैं वह तो कल्पना करते हैं कि सृष्टि स्वयं उत्पन्न हुई, मनुष्य भी स्वयं ही उत्पन्न हुए और उन मनुष्यों ने अपनी जिज्ञासा वृत्ति, आवश्यकताओं व निरन्तर अभ्यास से ज्ञान को बढ़ाया है। वैदिक मत व दृष्टिकोण इसके सर्वथा विपरीत है। वैदिक मत ईश्वर व जीवात्मा सहित प्रकृत्ति को अनादि, नित्य तथा अविनाशी सत्ता को मानते हैं। किसी भी पदार्थ का अभाव से स्वमेव उत्पन्न होना असम्भव होता है। यह वैज्ञानिक सिद्धान्त है। कोई नया पदार्थ किसी पूर्व पदार्थ के द्वारा किसी निमित्त कारण व चेतन सत्ता द्वारा ही बनाया जा सकता है। यह भी सर्वमान्य सिद्धान्त है कि किसी भी अस्तित्ववान पदार्थ का सर्वथा नाश अर्थात् अभाव नहीं किया जा सकता। इसी कारण से ईश्वर को स्वयंभू कहा जाता है। वह व उसकी सत्ता किसी की उत्पन्न की हुई नहीं है वह स्वमेव अनादि काल से है, अविनाशी है और अनन्तकाल अर्थात् सदैव अपने सत्यस्वरूप, जो अजन्मा व मृत्यु को प्राप्त नहीं होता, उसी स्वरूप में रहेगा। संसार में विद्यमान इस अनादि व अमर सत्ता का ज्ञान वेदों के द्वारा सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों को परमात्मा ने कराया था। इस संबंध में लोग अनेक प्रकार की शंकायें करते हैं। ऋषि दयानन्द वेदों के ऋषि व उच्च कोटि के विद्वान थे। उन्होंने वेदोत्पत्ति सहित सृष्टि की उत्पत्ति आदि अनेक विषयों पर गहन चिन्तन मनन किया था तथा उसके उत्तर वैदिक साहित्य एवं अपने विवेक से प्राप्त किये थे। अपने वेदोत्पत्ति विषयक विचारों को उन्होंने सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास में प्रस्तुत किया है। वेदों से ही ईश्वर को जाना जाता है। ऋषि दयानन्द ईश्वर को इस सृष्टि का उत्पत्तिकर्ता, पालनकर्ता तथा इसका प्रलयकर्ता मानते हैं।

ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि परमेश्वर निराकार है। प्रश्न होता है कि यदि परमेश्वर निराकार है तो वह वेद विद्या का उपदेश विना मुख से वर्णोच्चारण किए कैसे कर सका होगा क्योंकि वर्णों के उच्चारण में ताल्वादि स्थान, जिह्वा का प्रयत्न अवश्य होना आवश्यक है। इस प्रश्न व शंका का समाधान करते हुए ऋषि दयानन्द कहते हैं कि परमेश्वर के सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक होने से जीवों को अपनी व्याप्ति से वेदविद्या के उपदेश करने में कुछ भी मुखादि की अपेक्षा व आवश्यकता नहीं है। क्योंकि मुख व जिह्वा से वर्णोच्चारण अपने से भिन्न को बोध कराने के लिये किया जाता है, कुछ अपने लिये नहीं। क्योंकि मुख जिह्वा का व्यापार करे बिना ही मन में अनेक व्यवहारों का विचार और शब्दोच्चारण होता रहता है। वह लिखते हैं कि कानों को अंगुलियों से मंूद कर देखो, सुनो कि विना मुख जिह्वा ताल्वादि स्थानों के कैसे-कैसे शब्द हो रहे हैं। वैसे परमात्मा ने जीवों को अपने अन्तर्यामीस्वरूप से उपदेश किया है। किन्तु केवल दूसरे को समझाने के लिये उच्चारण करने की आवश्यकता होती है। जब परमेश्वर निराकार व सर्वव्यापक है तो अपनी अखिल वेदविद्या का उपदेश जीवस्थ (जीवों के भीतर व बाहर विद्यमान स्वरूप) स्वरूप से जीवात्मा में प्रकाशित कर देता है। फिर वह मनुष्य अपने मुख से उच्चारण करके दूसरों को सुनाता हे। इसलिए ईश्वर में यह दोष नहीं आता कि वह मनुष्यों व जीवात्माओं को बिना शरीर व मुखादि के वेद विद्या का उपदेश नहीं कर सकता।

वेद विद्या की उत्पत्ति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि किन मनुष्यों के आत्मा में कब वेदों का प्रकाश किया गया वा वेदों का ज्ञान दिया गया था? सृष्टि के आदिकाल में रचा गया ग्रन्थ शतपथ ब्राह्मण इस प्रश्न पर प्रकाश डालता हुआ बताता है कि ‘अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात्सामवेदः।।’ अर्थात् प्रथम सृष्टि की आदि में परमात्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा नाम के ऋषियों की आत्मा में एक-एक वेद का प्रकाश किया। ऋषि दयानन्द ने मनुस्मृति ग्रन्थ का प्रमाण देते हुए उसका एक श्लोक ‘अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म् सनातनम्। दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम्।।’ प्रस्तुत किया है। इस श्लोक के अनुसार परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न करके अग्नि आदि चार महर्षियों के द्वारा चारों वेद पांचवें ऋषि ब्रह्मा को प्राप्त कराये और उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान सुनकर ग्रहण किया। मनुस्मृति के इस वचन पर एक शंका की गई कि अग्नि आदि इन चार ऋषियों को ही परमात्मा ने वेदों का प्रकाश किया, अन्य सब मनुष्यों में नहीं किया, क्यों? इससे लगता है कि ईश्वर पक्षपात करता है। इसका उत्तर देते हुए ऋषि दयानन्द बताते हैं कि अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ऋषि ही सब जीवों से अधिक पवित्रात्मा थे। अन्य उन के सदृश नहीं थे। इसलिये पवित्र वेद विद्या का प्रकाश उन्हीं की आत्माओं में किया।

परमात्मा के विषय में एक शंका व जिज्ञासा यह भी की जाती है कि परमात्मा ने किसी देश की भाषा में वेदों का प्रकाश न करके संस्कृत में क्यों किया? इसका समाधान करने वाला उत्तर देते हुए ऋषि दयानन्द ने कहा है कि जो परमात्मा किसी देश-भाषा में वेदों का प्रकाश करता तो ईश्वर पक्षपाती हो जाता। क्योंकि जिस देश की भाषा में प्रकाश करता उनको सुगमता और विदेशियों को कठिनता वेदों के पढ़ने पढ़ाने की होती। इसलिये संस्कृत ही में प्रकाश किया है जो किसी देश की भाषा नहीं और वेदभाषा ही अन्य सब भाषाओं की उत्पत्ति का कारण है। उस संस्कृत में निष्पक्ष ईश्वर ने वेदों का प्रकाश किया। जैसे ईश्वर की पृथिवी आदि सृष्टि सब देश और देशवालों के लिये एक सी और सब शिल्पविद्या का कारण है। वैसे ही परमेश्वर की विद्या की भाषा भी एक सी होनी चाहिये जिससे सब देशवालों को पढ़ने पढ़ाने में तुल्य परिश्रम करना पडे। इससे ईश्वर पक्षपाती नहीं होता। यह भी ज्ञातव्य है कि सब भाषाओं का कारण भी संस्कृत भाषा है।

वेद विषयक एक शंका यह की जाती है यह बात कैसे प्रमाणित हो कि वेद ईश्वरकृत हैं अन्यकृत नहीं? इसका उत्तर है कि जैसा ईश्वर पवित्र, सर्वविद्यावित्, शुद्धगुणकर्मस्वभाव, न्यायकारी, दयालु आदि गुणवाला है वैसे जिस पुस्तक में ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव के अनुकूल कथन हो वह ईश्वरकृत, अन्य नहीं। और जिस में सृष्टिक्रम प्रत्यक्षादि प्रमाण आप्तों के और पवित्रात्माओं के व्यवहार से विरुद्ध कथन न हो वह ईश्वरोक्त होता है। जैसा ईश्वर का निर्भ्रम ज्ञान होता है वैसा जिस पुस्तक में भ्रान्तिरहित ज्ञान का प्रतिपादन हो, वह ईश्वरोक्त होता है। जैसा परमेश्वर है और जैसा सृष्टिक्रम रखा है, वैसा ही ईश्वर, सृष्टि, कार्य, कारण और जीव का प्रतिपादन जिस में होवे वह परमेश्वरोक्त पुस्तक होता है और जो प्रत्यक्षादि प्रमाण विषयों से अविरुद्ध शुद्धात्मा के स्वभाव से विरुद्ध न हो, इस प्रकार के वेद हैं। अन्य बाइबल, कुरान आदि पुस्तकें नहीं।

वेदों के विषय में यह भी शंका की जा सकती है कि वेद की ईश्वर से होने की आवश्यकता कुछ भी नहीं है क्यांेकि मनुष्य लोग क्रमशः ज्ञान बढ़ाते जाकर पश्चात् पुस्तक भी बना लेंगे। इसका उत्तर ऋषि दयानन्द देते हैं कि बिना ईश्वर द्वारा वेदों का ज्ञान दिये मनुष्य अपने प्रयत्नों से वेद जैसा ज्ञान का पुस्तक कभी नहीं बना सकते। ऐसा इसलिये कि विना कारण के कार्योत्पत्ति का होना असम्भव है। जैसे जंगली मनुष्य सृष्टि को देखकर भी विद्वान् नहीं होते ओर जब उन को कोई शिक्षक मिल जाय तो विद्वान् हो जाते हैं। और अब भी किसी से पढ़े विना कोई भी विद्वान् नहीं होता। इस प्रकार जो परमात्मा उन आदि सृष्टि के ऋषियों को वेदविद्या न पढ़ाता और वे अन्य को न पढ़ाते तो सब लोग अविद्वान् ही रह जाते। जैसे किसी के बालक को जन्म से एकान्त देश, अविद्वानों वा पशुओं के संग में रख देवे तो वह जैसा संग है वैसा ही हो जायेगा। इसका दृष्टान्त जंगली मनुष्य भील आदि हैं।

इस प्रसंग में ऋषि दयानन्द ने एक महत्वपूर्ण बात यह भी बताई है कि जब तक आर्यावर्त देश से शिक्षा विदेशों में नहीं गई थी तब तक मिश्र, यूनान और यूरोप देश आदिस्थ मनुष्यों में कुछ भी विद्या नहीं हुई थी और इंग्लैण्ड के कुलुम्बस आदि पुरुष अमेरिका मे जब तक नहीं गये थे तब तक वे अमेरिकावासी भी सहस्रों, लाखों क्रोड़ों वर्षों से मूर्ख अर्थात् विद्याहीन थे। पुनः सुशिक्षा के पाने से विद्वान् हो गये हैं। वैसे ही परमात्मा से सृष्टि की आदि में विद्या शिक्षा की प्राप्ति से उत्तरोत्तर काल में विद्वान होते आये हैं। योगदर्शन का एक सूत्र ‘स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्।।’ है। इससे विदित होता है कि जैसे वर्तमान समय में हम लोग अध्यापकों से पढ़ कर ही विद्वान होते हैं वैसे परमेश्वर ही सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न हुए अग्नि आदि ऋषियों का गुरु अर्थात् पढ़ानेवाला है। क्योंकि जैसे जीव सुषुप्ति और प्रलय में ज्ञानरहित हो जाते हैं वैसा परमेश्वर नहीं होता। उसका ज्ञान नित्य है। इसलिए यह निश्चित जानना चाहिये कि विना निमित्त (परमेश्वर) से नैमित्तिक अर्थ सिद्ध कभी नहीं होता।

एक शंका यह भी होती है कि वेद संस्कृत भाषा में प्रकाशित हुए और वे अग्नि आदि ऋषि लोग उस संस्कृत भाषा को नहीं जानते थे फिर वेदों का अर्थ उन्होंने कैसे जाना? इसका समाधान करते हुए ऋषि दयानन्द कहते हैं कि परमेश्वर ने उन ऋषियों को वेदों के अर्थ जनाये। और धर्मात्मा योगी महर्षि लोग जब-जब जिस-जिस वेद के मन्त्र के अर्थ को जानने की इच्छा करके ध्यानावस्थित हो परमेश्वर के स्वरूप में समाधिस्थ हुए तब-तब परमात्मा ने अभीष्ट मन्त्रों के अर्थ जनाये। जब बहुत से ऋषियों के आत्माओं में वेदार्थ का प्रकाश हुआ तब ऋषि मुनियों ने वह अर्थ और ऋषि मुनियों के इतिहासपूर्वक ग्रन्थ बनाये। उनका नाम ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्म जो वेद उसका व्याख्यान ग्रन्थ होने से ब्राह्मण नाम हुआ हुआ। ‘ऋषयो मन्त्रदृष्टयः मन्त्रान् सम्प्रादुः।’ इस प्रमाण के अनुसार जिस-जिस मन्त्रार्थ का दर्शन जिस-जिस ऋषि को हुआ और प्रथम ही जिस के पहले उस मन्त्र का अर्थ किसी ने प्रकाशित नहीं किया था, प्रकाशित किया और दूसरों को पढ़ाया भी, इसलिये अद्यावधि उस-उस मन्त्र के साथ ऋषि का नाम स्मरणार्थ लिखा आता है। जो कोई ऋषियों को मन्त्रकर्ता बतलावें उन को मिथ्यावादी समझें। वे तो मन्त्रों के अर्थ प्रकाशक हैं। ऋषि दयानन्द ने यह भी स्पष्ट किया है कि वेद ऋक्, यजु, साम और अथर्व मन्त्र संहिताओं का नाम है अन्य का नहीं। हमें यह भी विदित होना चाहिये कि वेदों का ज्ञान ईश्वर का नित्य ज्ञान है। ऐसा इसलिये कि परमेश्वर के नित्य होने से उस के ज्ञानादि गुण भी नित्य हैं। जो नित्य पदार्थ हैं (ईश्वर, जीव और प्रकृति) उन के गुण, कर्म, स्वभाव नित्य होते हैं और अनित्य द्रव्यों के अनित्य होते हैं।

एक शंका यह भी कि जाती है कि ईश्वर ने उन ऋषियों को ज्ञान दिया होगा और उस ज्ञान से लोगों ने वेद बना लिये होंगे? ऐसा होना सम्भव नहीं है। इसका समाधान ऋषि ने यह किया है कि ज्ञान ज्ञेय के विना नहीं होता। गायत्री आदि छन्द षड्जादि और उदात्ताऽनुदात्तादि स्वर के ज्ञानपूर्वक गायत्री आदि छन्दों के निर्माण करने में सर्वज्ञ ईश्वर के विना किसी का सामथ्र्य नहीं है कि इस प्रकार का सर्वज्ञानयुक्त शास्त्र बना सकें। हां! वेद को पढ़ने के पश्चात् व्याकरण, निरुक्त और छन्द आदि ग्रन्थ ऋषि मुनियों ने विद्याओं के प्रकाश के लिये किये हैं। जो परमात्मा वेदों का प्रकाश न करे तो कोई कुछ भी न बना सके। इसलिये वेद परमेश्वरोक्त हैं। इन्हीं के अनुसार सब लोगों को चलना चाहिये और जो कोई किसी से पूछे कि तुम्हारा क्या मत है तो यही उत्तर देना कि हमारा मत वेद अर्थात् जो कुछ वेदों में कहा है हम उस को मानते है।

ऋषि दयानन्द के वचनों व इस विषयक सभी शंकाओं के समाधान से यह स्पष्ट हो जाता है कि वेद ईश्वर से ही उत्पन्न हुए हैं। वेद सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर का ऋषियों को दिया हुआ नित्य-ज्ञान अर्थात् सदा रहने वाला ज्ञान है। वेद ज्ञान से ही मनुष्य जीवन का कल्याण होता है। मनुष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होते हैं। विना वेद ज्ञान के मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष जिसमें ईश्वर का साक्षात्कार भी सम्मिलित है, प्राप्त व सिद्ध नहीं हो सकते। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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