31 अक्टूबर: जन्मतिथि *सरदार पटेल की अद्भुत प्रशासनिक पटुता*

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(डॉ. रामसिया सिंह पटेल- विनायक फीचर्स)
सरदार वल्लभ भाई पटेल कुशल राजनीतिज्ञ तो थे ही, उनमें अद्भुत प्रशासनिक पटुता भी थी। जुलाई 1947 से भारत की अन्तरिम सरकार मेें वे देशी राज्यों के मंत्री के रूप में कार्यरत रहे। स्वतंत्र भारत में सरदार पटेल ने भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री के रूप में अपनी सेवाएं देते हुए दृढ़ प्रशासनिक कौशल का परिचय दिया। निम्नांकित उदाहरणों से इस तथ्य की पुष्टि होती है-
वाइसराय के अधिकारों को चुनौती और दोस्ती-
भारत के अंतिम वायसराय और स्वतंत्र भारत के गवर्नर जनरल लार्ड लुई माउंटबेटन से, जब ‘माउंटबेटन और भारत का विभाजन’ नामक विश्वविख्यात पुस्तक के लेखक डौमिनीक लापियर तथा लैरी कॉलिन्स ने एक साक्षात्कार के दौरान टिप्पणी की कि ‘आपके (माउंटबेटन के) अधिकारों को चुनौती देने वाले पहले नेता पटेल थे, तब लार्ड माउंटबेटन ने कहा था-‘मैं जानता था कि वह (पटेल) लड़ाकू किस्म के हैं।….पटेल उम्र में नेहरू से काफी बड़े थे, और जानते थे कि उन्हें बहुत दिन नहीं जीना है। सत्ता पाने की जल्दी उनको नेहरू से ज्यादा थी। मैं यह समझता था लेकिन हम बहुत अच्छे दोस्त बन गये थे। मैं उनको सचमुच चाहता था।’
बदली परिस्थितियों के अनुरूप ढ़लने की क्षमता-
भारत के विभाजन के पश्चात् भारत द्वारा स्टर्लिंग की एक बड़ी रकम पाकिस्तान को दी जानी थी। कश्मीर संबंधी पाकिस्तान के प्रतिकूल रवैये के कारण भारत ने उक्त रकम देना अस्वीकार कर दिया। लार्ड माउंटबेटन ने सरदार पटेल को मनाना चाहा, पर वे यह कहते हुए नहीं माने कि ‘मैं दूसरों को नहीं मना सकता। वह नहीं देंगे कभी नहीं।’ इस पर लार्ड माउंटबेटन ने भारत सरकार से उक्त रकम पाकिस्तान को दिलवाने के लिये गांधी जी का इस्तेमाल किया। लार्ड माउंटबेटन ने इसे स्वीकार करते हुए कहा- ‘इसके लिए मुझको गांधी जी से अनशन करवाकर पटेल से जबर्दस्ती दस्तख्त करवाने पड़े थे।’ इस तरह सरदार पटेल ने कुशल प्रशासक की तरह अपने आपको बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार ढ़ाल लिया।
स्वाधीन भारत मेें प्रशासन तंत्र की स्थापना-
विभाजन कौंसिल की तरह प्रशासनिक तैयारियों के लिए भी एक केबिनेट समिति लार्ड माउंटबेटन द्वारा बनाई गई थी, जिसके सदस्य सरदार पटेल भी थे। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के दो-दो प्रतिनिधि तथा लार्ड माउंटबेटन अध्यक्ष-इस तरह से पांच सदस्यों की यह समिति बनाई गई थी। इसमें कांग्रेस से सरदार पटेल तथा डॉ.राजेन्द्र प्रसाद चुने गये और मुस्लिम लीग से लियाकत अली खां और अब्दुल निश्तर चुने गये थे। इस समिति के सदस्य के रूप में सरदार पटेल ने समुचित प्रशासनिक तंत्र की स्थापना के लिए मूल्यवान सहयोग दिया। विभाजन समिति की अंतिम बैठक 26 जून 1947 को हुई, जो अत्यधिक कटुतापूर्ण थी। लियाकत अली की मांग थी कि दिल्ली के छह सरकारी प्रेसों मेंं से एक कराची को दे दिया जाये। लियाकत अली की इस मांग पर सरदार पटेल अत्यधिक क्रोधित हो गये। सरदार पटेल का कहना था कि सारे प्रेस भारत सरकार के कामकाज में ही व्यस्त थे, अत: एक को भी खाली नहीं किया जा सकता। अन्त में माउंटबेटन के आग्रह पर सरदार पटेल अस्थायी तौर पर एक प्रेस पाकिस्तान को देने पर सहमत हुए किंतु इसी शर्त पर कि वह प्रेस दिल्ली से बाहर नहीं ले जायी जायेगी।
देशी रिसायतों की विषम समस्या को सुलझाना-
सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रशासनिक पटुता को दृष्टिगत रखते हुए ही उन्हें देशी रिसायतों की समस्याओं को सुलझाने के लिए रिसायत विभाग सौंपा गया था। यह कार्य अत्यधिक कठिन और जोखिम भरा था। भारत की 562 देशी रियासतों को बिना किसी खूनखराबे के भारतीय संघ में शामिल होने के लिए राजी करना और अखण्ड भारत का अधिष्ठाता होने का गौरव प्राप्त करना सरदार पटेल की प्रशासनिक पटुता का ही बेमिसाल उदाहरण है। वाइसराय लार्ड माउंटबेटन ने अपनी रिपोर्ट नं. 10, दिनांक 28 जून 1947 में अंकित किया है-‘नेहरू को इस नये रियासत विभाग का भार नहीं मिला इसकी मुझे खुशी है। नहीं तो सब कुछ खत्म हो जाता। पटेल यथार्थवादी और समझदार हैं और निश्तर के साथ-साथ इस विभाग की जिम्मेदारी ले रहे हैं। वी.पी. मेनन सचिव होंगे, यह इससे भी बेहतर बात है। इस तरह शायद हम लोग रियासतों से संबंध एकदम तोड़ देने और उसके कुप्रभावों से बच सकें। (माउंटबेटन और भारत का विभाजन, पृ. 137) यह विश्वविश्रुत तथ्य है कि देशी रियासतों को स्वंत्रत भारत का अविभाज्य अंग बनाना लौह पुरूष भारत रत्न सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे अपराजेय योद्घा के ही बूते की बात थी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के उद्गार अविस्मरणीय हैं-‘उनकी दूरदर्शिता, उनकी सबको राजी करने और संगठित करने की अद्भुत शक्ति, स्थिति को ठीक समझने की योग्यता और दृढ़तापूर्वक संकल्प करने की शक्ति ने इस देश के इतने बड़े भू-भाग को एक संघीय विधान और एक केन्द्रीय शासन की छत्रछाया के नीचे ला दिया है जैसा इसके लंबे और शुभाशुभ घटनापूर्ण इतिहास मेें कभी नहीं हुआ है।’
श्री सम्पूर्णानन्द टिप्पणी करते हुए लिखते हैं- ‘पटेल वाचाल नहीं है, कर्मठ हैं। पाखंडी नहीं है, स्पष्टवक्ता हैं। घूम फिरकर काम नहीं करते, सीधे चलते हैं और सीधी लकड़ी घुमाते हैं। ऐसी विभूति युगों में मिलती है, ऐसा शासक सदियों में मिलता है। ऐसा महापुरूष अपनी छाया को भी महापुरूष बना देता है। ऐसा विशिष्ट प्राणी जो छू देता है, वही सोना बन जाता है।’ कविवर मोहनलाल वियोगी के उद्गार दृष्टव्य है-‘आज का महान भारत, पटेल जी का भारत है। राजाओं को रास्ते से हटाकर उन्होंने भारत को समूल नष्ट होने से बचा लिया।’
भारत के बिस्मार्क तथा लौहपुरूष-
सरदार पटेल को भारत के एकीकरण के गुरूतर दायित्व के निर्वहन में हैदराबाद के अतिरिक्त कहीं भी सेना का प्रयोग नहीं करना पड़ा। हैदराबाद में भी नाममात्र को ही सेना का प्रयोग किया गया। कहीं भी रक्तपात नहीं हुआ। हैदराबाद में हताहतों की नाममात्र की ही संख्या थी। सरदार पटेल के प्रशासनिक चातुर्य का ही यह सफल परिणाम रहा। सरदार पटेल कम बोलते थे। उनमें वज्र की सी दृढ़ता थी। वे लौहपुरूष और ‘भारत के विस्मार्क’ भी कहे गये हैं, परंतु उनके क्रियाकलाप तो जर्मनी के बिस्मार्क की तुलना में कई गुना अधिक जटिल और दुरूह थे।
इस संक्राति की विषमपूर्ण बेला में अगर सरदार पटेल न होते तो भारत स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् पच्चीसों टुकड़ों में बंट गया होता और हमारी स्वाधीनता ही अर्थहीन हो जाती। सरदार पटेल ने कुछ राजाओं को कई राज्यों के संघ मेें सम्मिलित होने के लिए राजी किया। राजाओं को राजप्रमुख का पद देकर, कहीं उन्हेंं मनाकर, कहीं भय दिखाकर, कहीं अपने प्रभाव के बल से तो कहीं मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध कराकर रिसायतों की समस्या अपनी प्रशासनिक पटुता के बल पर हल कर ली। हैदराबाद और जूनागढ़ जैसी रियासतों को भी अंतत: सरदार पटेल के सम्मुख झुकना पड़ा।
कश्मीर की रक्षा के लिए बल प्रयोग-
कश्मीर की रक्षा के लिए सुदृढ़ कदम उठाकर सरदार पटेल ने अदम्य साहस और शक्ति का परिचय दिया। पाकिस्तान के विरूद्घ कश्मीर की रक्षा के लिए सरदार पटेल द्वारा ही सैनिक कार्यवाही का निर्णय लिया गया था। बख्शी गुलाम मोहम्मद ने तत्कालीन विषम परिस्थितियों का चित्रण करते हुए लिखा है- ‘लार्ड माउंटबेटन इस मीटिंग के सभापति थे। जो लोग मीटिंग में हाजिर थे, उनके नाम इस प्रकार थे- पंडित जवाहर लाल नेहरू, प्रतिरक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह, प्रमुख सेनापति जनरल बुशर, स्थल सेना के सेनापति जनरल रसेल और मैं (बख्शी गुलाम मोहम्मद)। हमारे बीच राज्य की सैनिक स्थिति तथा तेज गति से सैनिक सहायता भेजने की संभावना और पद्घति पर चर्चा हो रही थी। जनरल बुशर ने दृढ़ता से कहा कि मेरे पास उपलब्ध साधन-सामग्री इतनी कम है कि राज्य (कश्मीर) की सैनिक सहायता संभव नहीं होगी। लार्ड माउंटबेटन ने जानबूझकर इस कदम के विषय में अविश्वास प्रकट किया। पंडितजी ने उत्कट अधीरता और गहरी चिंता व्यक्त की। सरदार सुनते रहे, एक शब्द भी नहीं बोले। वे शांति, संतुलन और समता की जीवन्त मूर्ति बने रहे। मीटिंग में निराशा और लाचारी का जो गंभीर वातावरण फैला था, उसके सामने सरदार पटेल का मौन अद्भुत विपर्यास प्रस्तुत करता था। एकाएक सरदार अपनी कुर्सी पर हिले और तुरंत ही उनकी कठोर और दृढ़ आवाज ने सबका ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा- ‘सेनापतियों, सुन लीजिए। साधन सामग्री हो या साधन-सामग्री न हो, परंतु किसी भी कीमत पर कश्मीर की रक्षा करनी होगी, भले ही उसका परिणाम जो भी आये। आपको यह कार्य करना ही होगा और सरकार सारी सहायता आपको देगी। यह काम होना ही चाहिए और होना ही चाहिए। आप लोग जो भी करना चाहें करें, परंतु हर हालत में करें।’ सेनापति आपत्ति उठाना चाहते होंगे, परंतु सरदार चुपचाप उठे और बोले- ‘कल सुबह सैनिकों और युद्घ सामग्री को विमानों से ले जाने की व्यवस्था तैयार रहेगी।…इस प्रकार भारी कठिनाईयों के बावजूद कश्मीर की रक्षा सरदार की निर्णायक शक्ति और दृढ़ संकल्प का परिणाम थी।’
कांपते दिलों को साहस प्रदाता-
सरदार पटेल के संबंध में श्री जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा है-‘वे एक ऐसी शक्ति के स्त्रोत थे, जो कांपते दिलों को साहस प्रदान करते थे।’
नेहरू जी सरदार पटेल के संबंध में कहते थे- ‘आप तो मंत्रिमंडल के सबसे सुदृढ़ स्तंभ हैं।’ लार्ड माउंटबेटन का कथन था- ‘ मैं नहीं मानता कि देश में एक भी ऐसा आदमी होगा, जो आपके दृढ़ निश्चय कर लेने पर आपके विरूद्घ खड़ा हो सके। इसलिए जो समर्थन आप जवाहरलाल नेहरू को दे सकते हैं, उसका सर्वोच्च अंतर्राष्ट्रीय महत्व है।’
धर्मनिरपेक्षता की नीति के पोषक-
सरदार पटेल का प्रशासन धर्मनिरपेक्षता से ओतप्रोत था। हिन्दुओं के समान मुसलमान भी उन पर विश्वास करते थे। वे एक महान राष्ट्रवादी थे। इस नाते राष्ट्र के अहित में किसी के द्वारा उठाये गये कदम को वे बर्दाश्त नहीं करते थे चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान। इसी परिप्रेक्षय मेें उनके प्रशासन को आंका जाना चाहिए।
समस्याओं को लटकाने में विश्वास नहीं
यदि सरदार पटेल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री होते तो संभवत: अपनी प्रशासनिक पटुता और राजनीतिक कौशल से कश्मीर समस्या को जड़ से ही समाप्त कर देते। जिसे प्रधानमंत्री नेेहरू ने संयुक्त राष्ट्रसंघ को सौंप कर कश्मीर को ऊंट के गले में बिल्ली की तरह लटकाकर इस समस्या को भारत का स्थायी सिरदर्द बना दिया।
दूरगामी परिणाम वाले मूलभूत निर्णय-
सरदार पटेल की प्रशासनिक पटुता के संबंध में श्री वी.शंकर ने ठीक ही लिखा है कि- ‘सरदार पटेल ने संविधान की रचना में, जम्मू और कश्मीर राज्य तथा हैदराबाद राज्य की समस्या को दृढ़ निश्चय तथा उद्देश्यपूर्ण दृष्टि से हल करने में तथा अन्य अनेक प्रश्नों को हल करने में (जिसके फलस्वरूप देश में एकता, व्यवस्था और स्थिरता स्थापित हुई-तथा संयुक्त और एकीकृत भारत में लोकतांत्रिक शासन पद्घति स्थापित करने में) जो भाग लिया, उसका वर्णन विस्तार से करना संभव नही है। ‘अक्सर सरदार का यह योगदान निर्णायक होता था, कि चर्चाओं की अराजकता में से पुन: व्यवस्था को जमा देते थे, वे स्थिति को उसके उचित परिप्रेक्ष्य तथा व्यावहारिक स्वरूप में रख देते थे। अक्सर कुछ ही शब्दों में वे दलीलों की बौछार को खामोश कर देते थे। अपने इतिहास में भारत को इतनी अधिक कठिन समस्याएंं हल नहीं करनी पड़ीं और किसी भी समय भारत की सरकार को इतनी संख्या में दूरगामी परिणाम वाले मूलभूत निर्णय नहीं करने पड़े, जितने उसे उन तीन वर्षों में करने पड़े, जो सरदार पटेल ने स्वाधीनता के बाद किये थे। इतनी महान सिद्घि, इतने थोड़े समय में संभव हो सकी, इसका श्रेय बड़ी हद तक सरदार पटेल की अनोखी कार्य पद्घति को है।’ (विनायक फीचर्स)

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