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*क्या पृथ्वी पर जीवन महज संयोग है*?

लेखक आर्य सागर खारी

96 अरब प्रकाश वर्ष की भौतिक सीमा तक देखें गये अवलोकन योग्य ब्रह्मांड में वर्ष 2020 तक 4000 हजार के लगभग ग्रह खोजें जा चुकें हैं लेकिन इन सब में जीवन योग्य एकमात्र इकलौता ग्रह हमारी पृथ्वी ही हैं।

पृथ्वी पर जीवन के फलने फूलने का प्राथमिक कारण माना जाता है इस पर उपलब्ध तरल रुप में जल। पृथ्वी पर जीवन की कार्य – कारण श्रंखला बेहद रोचक है। पृथ्वी पर जल जीवन का पर्याय है तो इसके पीछे परम आप्त ईश्वर की अनगिनत व्यवस्थाएं हैं।

सर्ग के आदि में हमारे सौर परिवार में जीवन की पात्रता हासिल करने की प्रतिस्पर्धा में पृथ्वी के दो प्रतिस्पर्धी ग्रह थे जो मामूली अंतर से यह मुकाबला हार गये।जीवन का मुकाबला हारने वाला एक मंगल तो दुसरा ग्रह शुक्र है। सूर्य से दुरी के आधार पर पृथ्वी दिक में जहां आज अपनी कक्षा में जीवन का नृत्य जिस क्षेत्र में कर रही है जैवखगोलिकी की भाषा में उसे ‘गोल्डीलॉक्स क्षेत्र’ कहा जाता है।

हमारी पृथ्वी यदि इस गोल्डीलॉक्स क्षेत्र से बाहर की ओर स्थित होती मंगल ग्रह के साथ नजदीकियां बढ़ाती अर्थात वर्तमान में इसकी जो सूर्य से दूरी है उसे दुना कर दिया जाए तो पृथ्वी बर्फ का गोला बन जाती । आज सूर्य से इसे जो उष्मीय ऊर्जा मिलती है वह घटकर एक चौथाई रह जाती। ठीक इसी परिमाण में सूर्य से इसकी दूरी घट जाए तो यह आग का गोला बन जाती।

आज अंतरिक्ष में यह जिस स्थान पर भ्रमणशील है वह स्थिति ही इस पर जीवन के फलने फूलने में सहयोगी है। बात पृथ्वी के आकार की करे यदि यह एक चंद्रमा के आकार की होती तो ना यह अपने 500 मील ऊंचे वायुमंडल को संभाल पाती ना ही पानी को। पृथ्वी का वायुमंडल ही इसके तापमान को संतुलित रखता है पृथ्वी की सिंचाई के लिए जलवाष्प वर्षा की खेप पृथ्वी के विविध भूभागों पर वायुमंडल के कारण ही पहुंच पाती हैं।वायुमंडल का महासागरों के साथ गहरा संबंध है। एक शोध के अनुसार प्रति दिन 30 किलोमीटर प्रति सेकंड के हिसाब से 2 करोड़ आकाश के पिंड उल्काएं पृथ्वी की ओर उन्मुख होते हैं जो वायुमंडल के घर्षण के कारण नष्ट हो जाते हैं यदि वायुमंडल ना होता तो यह उल्काएं पृथ्वी को चूर-चूर कर देती।
यदि पृथ्वी का आकार दुगना हो जाए तो इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति दुगनी हो जाएगी जिसका नतीजा यह होगा इसके वायुमंडल की ऊंचाई घट जाएगी… इसी क्रम में यदि इसका आकार सूरज जितना हो जाए तो इस पर स्थित प्रत्येक वस्तु का भार 150 गुना अचानक बढ़ जाएगा इसके वायुमंडल की ऊंचाई 500 मील से घटकर केवल 4 मील रह जाएगी जिसका नतीजा यह होगा इस पृथ्वी पर एक 1 किलो का प्राणी भी 150 किलो का होगा मनुष्य का आकार घट कर गिलहरी जैसा हो जाएगा। यह सभी आकलन गणित व भौतिक शास्त्र के नियमों से सिद्ध हैं महज कल्पना नहीं है।

पृथ्वी यदि अपनी धूरी पर 23 अंश पर झुकी होकर गति न करती तो इस पर विविध प्रकार के जीव जंतु वृक्ष वनस्पति होते ही नही। इसके निरंतर घूमते रहने के कारण इसका निवास योग्य क्षेत्रफल दुगना हो गया है।

यह तो इसका आकर आदि बाहरी स्वरूप है जो जीवन में सहयोगी है बात इसके गर्भ केंद्र की करें तो वह आज भी मानव की भौतिक पहुंच से दूर है पृथ्वी की सतह से इसके गर्भ केंद्र आंतरिक कोर की दूरी लगभग 6000 किलोमीटर है मनुष्य केवल 12 किलोमीटर तक ड्रिल कर पाया है इसके गर्भ में 1220 किलोमीटर व्यास की लोहे व निकिल धातु की एक ठोस गेंद है जो निरंतर घूम रही है एक चुंबक की तरह बर्ताव करती है जिसका तापमान 5000 से लेकर 6000 डिग्री सेल्सियस है।
पृथ्वी की आंतरिक कोर के बारे में जितनी भी सूचना आज तक मिली है वह केवल भूकंपों के माध्यम से ही मिलती है।

सर्ग के आदि में जब विधाता आदिदैवत जगत को जिसमें ग्रह उपग्रह तारे नक्षत्र आदि शामिल है रच रहा था तो उसे दौरान यह पृथ्वी अनेक परीक्षाओं से होकर गुजरी है इस पर जीवन की उत्पत्ति महज संयोग आकस्मिक नहीं है न हीं पृथ्वी की रचना आकस्मिक हो गई परम बुद्धिमान सत्ता का इसका कौशल इसमें छुपा हुआ है। एक दिन में भी यह नहीं बनी जैसा बाइबिल की मान्यता में उल्लेख मिलता है। करोड़ों वर्ष इसको बनने में लग गए अर्थात भौतिक शास्त्र के नियमों से परे जाकर ईश्वर ने सृष्टि को नहीं रचा है ईश्वर को भी इस सृष्टि को बनाने में समय लगा है उसने भी पदार्थ व ऊर्जा का प्रयोग इसे बनाने में किया है पदार्थ व ऊर्जा की भी परमात्मा से अलग स्वतंत्र सत्ता है जिसे अजा कहा जाता हैं। वेद दर्शन उपनिषद में इस मान्यता के संबंध में अनेकों प्रमाण उपलब्ध है।

वेदों के व्याखान भारतीय विज्ञान व अध्यात्म परंपरा के ग्रंथ उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथो श्रौत सुत्र आदि में सृष्टि व इसके पदार्थों की उपेक्षा नहीं की गई अपितु प्रमुखता से प्रभावशील गहन गंभीर रहस्यमयी आलंकारिक भाषा में इसका व्यापक उल्लेख मिलता है। ऋषियों का यह चिंतन रहा है ब्रह्म को समझने में सृष्टि व शरीर सर्वाधिक सहयोगी है, सृष्टि रचना को समझ कर ही इसके सृजनहार को समझा जा सकता है।

उपनिषद दर्शन आदि में आस्था व विश्वास का कोई स्थान नहीं है इनमें प्रत्येक बात तर्क और प्रमाण के आधार पर रखी गई है। पृथ्वी विकास के इतने चरणों से होकर गुजरी है जीवन की पात्रता अर्जित करने में न जाने इसने कितनी तपस्या की है हम और आप समझ नहीं सकते। खगोल भौतिकी शास्त्री व भूगर्भ शास्त्री ही इसे समझ सकते हैं प्राचीन उपनिषद दर्शन आदि के ऋषियों ने इसे समझा है। किसी चिंतक ने ठीक ही कहा है- वैज्ञानिकों की आस्तिकता ही आस्तिकता होती है शेष अंधविश्वास है और वेदों पर आधारित भारतीय दर्शन उपनिषद आदि ग्रंथ वैज्ञानिक आस्तिकता के आधारभूत स्तंभ है।

लेखक आर्य सागर खारी

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