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आज का चिंतन

*आदित्यमुनि और दार्शनेय लोकेश से आर्य जनता सावधान*

डॉ. ज्वलन्त कुमार शास्त्री
मो. 7303474301
ऋषि दयानंद की वास्तविक और प्रामाणिक जन्मतिथि वि. सं. 1881 फाल्गुन बदि 10 शनिवार तदनुसार 12 फरवरी 1825 ई. है। स्वामी दयानंद की कल्पित जन्म कुंडली जियालाल जैनी ने 1890 से लेकर 1894 तक प्रसारित की थी। जिसके अनुसार स्वामी जी की जन्मतिथि 2 सितंबर 1824 ई.थी। बाद में एक दूसरी काल्पनिक जन्मकुंडली श्रीकृष्ण शर्मा ने 1964 ई में प्रकाशित की। मिथ्यावादी और गप्पबाज श्री कृष्ण शर्मा का खंडन प्रो. दयाल भाई आर्य ने ऋषि दयानंद की प्रारंभिक जीवनी में तथा डॉ ज्वलन्त कुमार शास्त्री ने ऋषि दयानंद की प्रामाणिक जन्मतिथि में किया है। आदित्यपाल सिंह 18 वर्षों तक जियालाल जैनी की जन्मकुंडली को प्रामाणिक मानते रहे। जब ज्वलंत शास्त्री के तर्कों और प्रमाणों का खंडन नहीं कर सके तब नई पैतरेबाजी शुरू करके श्री कृष्ण शर्मा द्वारा प्रचारित एक दूसरी कल्पित जन्मकुंडली एवं उनकी पुस्तकों का सहारा लेकर ऋषि दयानंद की जन्मतिथि के विषय में आर्य जनता में भ्रम फैलाने लग गए। आदित्यमुनि द्वारा ऋषि की मिथ्या जन्मतिथि भाद्रपद शुक्ला नवमी कार्तिकीय संवत् 1881 तदनुसार 20 सितंबर 1825 ई. का व्हाट्सएप के माध्यम से धुआंधार प्रचार करते देख मैंने उन्हें शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। बड़े मुश्किल से वे तैयार हुए। फलत: 30 और 31 मार्च 2022 ई. को परोपकारिणी सभा के माध्यम से मेरा उनसे शास्त्रार्थ तय हुआ। संयोजक आचार्य सत्यजित् ने अपनी मुनिवृत्ति के कारण इसे संवाद नाम दिया। 30 मार्च को प्रथम सत्र में शास्त्रार्थ हुआ और दूसरे सत्र में ही आदित्यमुनि जी निरुत्तर हो गए। फलत: शास्त्रार्थ के संचालक माननीय डॉ. वेदपाल जी तथा पूर्व न्यायमूर्ति श्री सज्जन सिंह कोठारी ने शास्त्रार्थ समाप्ति की घोषणा कर दी। उस शास्त्रार्थ का पूर्ण विवरण सितंबर 2022 ई. के परोपकारी के विशेष अंक में 52 पृष्ठों में छापा गया है। अतः ऋषि जन्मतिथि के अन्वेषक और जिज्ञासु उस शास्त्रार्थ के प्रकाशित विवरण को देखकर स्वयं नीर क्षीर विवेक कर लें तथा शास्त्रार्थ में उपस्थित विशिष्ट महानुभावों – न्यायमूर्ति सज्जन सिंह कोठारी, डॉ.वेदपाल, आचार्या सूर्या देवी चतुर्वेदा, स्वामी आर्यवेश, श्री अशोक आर्य उदयपुर तथा ब्रह्मचारी राजेंद्र फरीदाबाद से संपर्क कर शास्त्रार्थ के परिणाम को जान लें।
आदित्यमुनि जी जब निरुत्तर हो गए तब उन्होंने कहा कि दार्शनेय लोकेश जी को मेरी जगह बैठाकर अग्रिम कार्यवाही की जाए। शास्त्रार्थ के संचालकों का कहना था कि संवाद आदित्य मुनि और ज्वलंत शास्त्री में निश्चित हुआ है। अतः शास्त्रार्थ तो इन दोनों में ही होगा। लोकेश जी यदि इस संवाद में भाग लेना चाहें तब उसके लिए अलग से व्यवस्था करनी होगी। अतः लोकेश जी को उचित है कि इस विषय पर वह शास्त्रार्थ करना चाहें तो स्वीकृति दें और शास्त्रार्थ के नियमों का निश्चय करके आगे बढ़ा जाए।शास्त्रार्थ न करके सोशल मीडिया पर एक पक्षीय बातें बार बार लिखना किसी विद्वान् को शोभा नहीं देता। अतः दार्शनेय लोकेश जी को मेरा खुला चैलेंज है जब चाहें मुझसे शास्त्रार्थ कर लें।
ज्ञातव्य है कि ऋषि की जन्मतिथि फाल्गुन कृष्ण दशमी 1881 वि. स. तदनुसार 12 फरवरी 1825 ई. का निश्चयन 1956 से लेकर 1960 ई. तक वर्षों विचार विमर्श के अनन्तर सार्वदेशिक धर्मार्य सभा के विद्वानों ने किया था। 2 अप्रैल 1967 ई. को सार्वदेशिक सभा की अंतरंग सभा ने धर्मार्य सभा के निर्णय की पुष्टि की। तब से आर्य जगत् प्रतिवर्ष फाल्गुन बदि दशमी को ऋषि जयंती मनाता है। आर्य समाज के जिला सभा से लेकर प्रतिनिधि सभाओं तथा अन्य आर्य प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित कैलेंडर में फाल्गुन बदि 10 को ही ऋषि की जयंती तिथि प्रकाशित की जाती है। तदनुसार इस वर्ष विक्रम संवत् 2080 में फाल्गुन बदि दशमी 05 मार्च 2024 ई को है। प्रतिपक्षियों से निवेदन है कि शास्त्रार्थ की तिथि और नियम पर मुझसे चर्चा करें अन्यथा सोशल मीडिया पर किए जा रहे एकपक्षीय प्रलाप का मैं कोई संज्ञान नहीं लूंगा।

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