images (57)

✍🏻 लेखक – स्वामी दर्शनानन्द जी
प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’
🔥ओ३म् व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ (यजु० १९-३०)
◼️सत्य को कब जान पाता है? – इस वेदमन्त्र में परमात्मा जीवों को इस बात का उपदेश करते हैं कि जब जीव सत्य को जानने के लिए व्रत धारण करता है अर्थात् दृढ़ निश्चय से पूरा करने का व्रत करता है और सत्य-असत्य की खोज में निरंतर लगा रहता है, तब उसमें सत्य के जानने का अधिकार अर्थात् योग्यता उत्पन्न होती है, और जब उस योग्यता द्वारा गुरु से दीक्षा लेकर उसके अनुसार आचरण करता है तो दक्षता अर्थात् उत्तम सुख और संसार में सन्मान को प्राप्त करता है। जब इस प्रकार संसार में सत्य की प्राप्ति से मान व उत्तम सुख एवं शान्ति की प्राप्ति होती है तो उसको देखकर दूसरे व्यक्तियों को सत्य में श्रद्धा उत्पन्न होती है और वह स्वयं भी सत्य पर अटल विश्वास करते हुए उसके अनुसार आचरण करने वाला बनता है। जब तक परमात्मा के इस आदेश का पालन न किया जाय, तब तक कोई सत्य में श्रद्धा नहीं करवा सकता।
◼️लक्ष्य-सिद्धि के लिए चार आश्रम – परमात्मा के इस नियम से चार आश्रम बनाए गए हैं। जब मनुष्य परमात्मा के जानने के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम के व्रत को धारण करके उसमें वेदों का निरंतर स्वाध्याय (पठन-पाठन) करता है और उसके अनुसार प्रत्येक वेदांग को भली प्रकार समझकर वेदार्थ द्वारा पदार्थों के जानने के लिए पुरुषार्थ करता है तो उसको परमात्मा के जानने की विधि, अभ्यास एवं वैराग्य से मन को एकाग्र करके समाधि द्वारा परमात्मा को जानने की क्षमता प्राप्त हो जाती है; और तब समाधि की विधि को जानकर क्रमवार गृहस्थ आश्रम को धारकर कर्मों को करता चला जाता है।
◼️जब मन व इंद्रियों का वशीकरण होता है – जब कर्म करने से दुःख की प्राप्ति होती है तो वह संसार के पदार्थों को दुःख का साधन समझकर उनसे पृथक् होने के लिए वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करके धीरे-धीरे अपनी इंद्रियों को वश में करने का यत्न करता है। जब इस प्रकार से आचरण करने पर मन व इन्द्रियों का वशीकरण करने में सफलता प्राप्त हो जाती है, तब वह संसार के विषयों से अलग होकर केवल परमात्मा से प्रेम करता है और उसकी उपासना से आनन्द-प्राप्ति देखकर जगत् के सकल व्यवहार को तजकर ईश्वर के प्रेम में मग्न हो जाता है।
◼️प्रकृति किनको खींचती है – इस प्रकार के संन्यासियों का दर्शन करके लोगों में परमात्मा के प्रति श्रद्धा व प्रेम पैदा होता है। जो जन परमात्मा की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्य-रूपी व्रत को भी धारण नहीं करते, वे किस प्रकार गृहस्थ आश्रम में आकर ईश्वर को जानने का अधिकार प्राप्त कर सकते हैं? ऐसे ही लोग ईश्वर के जानने का अधिकार न होने से मूर्ति-पूजन आदि अविद्या के कामों में लग जाते हैं। जिन लोगों ने न तो ब्रह्मचर्य आश्रम में ही वेद-अध्ययन किया है और न ही उनको गृहस्थ आश्रम में पञ्च-यज्ञादि नित्य कर्मों के करने का अभ्यास है, वे लोग किस प्रकार से परमात्मा को जान सकते हैं। उनको परमेश्वर में कैसे श्रद्धा, प्रेम व भक्ति-भाव उत्पन्न हो सकता है! ऐसे ही लोग अर्थार्थी तथा वाममार्गी बन जाते हैं, क्योंकि इंद्रियों के वशीकरण न कर सकने से उनको मन को वश में करने का अवसर नहीं मिलता। मन उनको प्रतिक्षण प्रकृति के पदार्थों की ओर ही प्रवृत्त करता अथवा खींचता है। वे अपना समस्त जीवन इसकी दासता में व्यतीत कर देते हैं।
◼️जिन्हें सुख-दुःख के साधनों का यथार्थ ज्ञान नहीं – वे स्वयं को चाहे अत्यंत योग्य व बुद्धिमान् समझते हैं, परंतु वास्तव में मूर्ख हैं, क्योंकि उनको सुख-दुःख के साधनों का यथार्थ ज्ञान नहीं। वे अविद्या के कारण दुःख देने वाली वस्तुओं को सुख का साधन समझते हैं और सुख देने वाले परमात्मा की सत्ता से सर्वथा विमुख हैं अथवा उनको उसमें तनिक भी श्रद्धा नहीं।
◼️वेदज्ञान द्वारा ही ईश्वर का ज्ञान – परमात्मा का ज्ञान, परमात्मा के दिये गए सद्ज्ञान वेद के द्वारा ही संभव है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति सूर्य को दीपक के प्रकाश से नहीं देख सकता, सूर्य की किरणें ही सूर्य को दिखला सकती हैं, इसी प्रकार कोई मनुष्य मनुष्यकृत ग्रंथ अथवा मानवीय शक्ति से परमात्मा को नहीं जान सकता, न ही परमात्मा को जाने बिना सुख और शांति को प्राप्त कर सकता है। मुक्ति का साधन केवल परमात्मा का ज्ञान है। वही सारे संसार में शांति का उपाय है। उसको जानने के लिए परमात्मा ने वर्ण-आश्रम के पड़ावों से निकलते हुए अपने ध्येयधाम तक पहुँचने का उपदेश दिया है। जो लोग परमात्मा के बतलाए मार्ग के विपरीत चलते हैं, वे प्रकृति की उपासना की अंधी गुफा में गिरकर आत्मिक शांति से दूर जा पड़ते हैं। परमात्मा कृपा करें तो बहुत-कुछ प्राप्त हो सकता है।
ओ३म् शांति! शांति! शांति!
[यह वेदोपदेश आज से ९७ वर्ष पूर्व मासिक आर्य मैगजीन में प्रकाशित हुआ था। तब स्वामी दर्शनानन्द जी अभी कृपाराम शर्मा के नाम से वैदिक नाद गुंजा रहे थे। लगभग एक शताब्दी के पश्चात् इसे प्रथम बार ही हिंदी में अनूदित करके प्रकाशित किया जा रहा है।]
✍🏻 लेखक – स्वामी दर्शनानन्द जी
प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pusulabet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betparibu giriş
betlike giriş
parmabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
parmabet giriş
betlike giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
klasbahis giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
parmabet giriş