ओ३म् “ईश्वर का अस्तित्व प्रमणों से सिद्ध है वह सबका रक्षक एवं पालनकर्ता है”

images (38)

============
ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास में वर्णित वचनों के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व विषयक विचारों को हम इस लेख में प्रस्तुत कर रहें। ऐसे विचार संसार के किसी साहित्य में उपलब्ध नहीं होते। सभी मनुष्यों के जीवन में यह अत्यन्त लाभप्रद एवं ज्ञानवर्धक हैं। सब मनुष्यों को इन विचारों से लाभ उठाना चाहिये। ऋषि दयानन्द कहते हैं कि ईश्वर वह है जो सब दिव्य गुण, कर्म, स्वभाव, विद्यायुक्त और जिस मे पृथिवी सूर्यादि लोक स्थित हैं और जो आकाश के समान व्यापक सब देवों का देव परमेश्वर है उस को जो मनुष्य न जानते न मानते और उस का ध्यान नहीं करते वे नास्तिक मन्दमति सदा दुःखसागर में डूबे ही रहते हैं। इसलिये सर्वदा उस ईश्वर को जानकर सब मनुष्य सुखी होते हैं। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि वेद में ईश्वर अनेक हैं। ऋषि दयानन्द अपने अध्ययन व विवेक के अनुसार अनेक ईश्वर होने की बात को इस रूप में स्वीकार नहीं करते। वह कहते हैं कि चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा जिस से अनक ईश्वर सिद्ध हों किन्तु यह तो लिखा है कि ईश्वर एक है। उन्होंने देवताओं के विषय में समाज में फैले एक भ्रम को प्रश्न के रूप में उपस्थित कर उत्तर दिया है कि वेदों में जो अनेक देवता लिखे हैं उस का वह अभिप्राय नहीं है जैसा लोग सोचते व समझते हंै। वह बताते हैं कि देवता दिव्य गुणों से युक्त होने के कारण कहलाते हैं जैसी कि पृथिवी (पृथिवी भी तेंतीस देवताओं में एक देवता है।), परन्तु इस पृथिवी को कहीं ईश्वर वा उपासनीय नहीं माना है। देखो! इसका प्रमाण वेदवचन कि ‘जिस में सब देवता स्थित हैं, वह जानने और उपासना करने योग्य ईश्वर है।’ यह उनकी भूल है जो देवता शब्द से ईश्वर का ग्रहण करते हैं। परमेश्वर देवों का देव होने से महादेव इसीलिये कहाता है कि वही सब जगत् का उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्ता, न्यायाधीश, अधिष्ठाता है।

जो तेंतीस देवता होने विषयक वेदों में कथन है, इसकी व्याख्या शतपथ में की है कि तेंतीस देव अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य, और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु हैं। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूम्र्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय और जीवात्मा ये ग्यारह रुद्र इसलिये कहाते हैं कि जब शरीर को छोड़ते हैं तब निकट संबंधियों को रोदन कराने वाले होते हैं। संवत्सर के बारह महीने बारह आदित्य इसलिये हैं कि ये सब की आयु को लेते जाते हैं। बिजली का नाम इन्द्र इस हेतु से है कि यह परम ऐश्वर्य का हेतु है। यज्ञ को प्रजापति कहने का कारण यह है कि जिस से वायु, वृष्टि जल, ओषधी की शुद्धि, विद्वानों का सत्कार और नाना प्रकार की शिल्पविद्या से प्रजा का पालन होता है। ये तेंतीस गुणों के योग से देव कहाते हैं। इन का स्वामी और सब से बड़ा होने से परमात्मा चैंतीसवां उपास्यदेव शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ के चैदहवें काण्ड में स्पष्ट लिखा है। इसी प्रकार अन्यत्र भी लिखा है। जो ये भ्रान्त मनुष्य इन शास्त्रों को देखते तो वेदों में अनेक ईश्वर मानने रूप भ्रमजाल में गिरकर क्यों बहकते?

ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश के सप्तम् समुल्लास में ऋग्वेद और यजुर्वेद के पांच मन्त्रों को उद्धृत किया है। उनके हिन्दी में अर्थ भी दिये हैं। यह अर्थ वेदांगों के अनुसार सत्य एवं यथार्थ हैं। वेदभाष्य में भी इन मन्त्रों के अर्थों को देखा जा सकता है। ऋषि दयानन्द वेदों के पांच मन्त्रों का अर्थ करते हुए लिखते हैं, हे मनुष्य! जो कुछ इस संसार में जगत् है उस सब में व्याप्त होकर जो नियन्ता है वह ईश्वर कहाता है। उस से डर कर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग। तीसरे मन्त्र की व्याख्या में वह लिखते हैं कि ईश्वर सब को उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! मैं ईश्वर सब के पूर्व विद्यमान सब जगत् का स्वामी अर्थात् पति हूं। मैं सनातन जगत्कारण (जगत् का निमित्त कारण) और सब धनों का विजय करनेवाला और दाता हूं। मुझ ही को सब जीव जैसे पिता को सन्तान पुकारते हैं वैसे पुकारें। मैं सब को सुख देनेहारे जगत् के लिये नाना प्रकार के भोजनों का विभाग पालन के लिये करता हूं। (चैथे मन्त्र का अर्थ)। मैं परमैश्वर्यवान् सूर्य के सदृश सब जगत् का प्रकाशक हूं। कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूं। मैं ही जगत् रूप धन का निर्माता हूं। सब जगत् की उत्पत्ति करने वाला मुझ ही को जानो। हे जीवों! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझ से मांगों और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत होओ। इसके बाद पांचवें मन्त्र का अर्थ करते हुए ऋषि कहते हैं कि हे मनुष्यों! मैं सत्यभाषणरूप स्तुति करनेवाले मनुष्य को सनातन ज्ञानादि धन को देता हूं। मैं ब्रह्म अर्थात् वेद का प्रकाश करनेहारा और मुझ को वह वेद यथावत् कहता है, उस से सब के ज्ञान को मैं बढ़ाता, मैं सत्पुरुषों का प्रेरक, यज्ञ करनेहारे को फल प्रदाता और इस विश्व में जो कुछ है उस सब कार्य का बनाने और धारण करनेवाला हूं। इसलिये तुम लोग मुझ को छोड़ किसी दूसरे (तीसरी व चैथी अज्ञान-जनित सत्ता) को मेरे स्थान में मत पूजो, मत मानो और मत जानो।

यजुर्वेद के एक प्रसिद्ध मन्त्र ‘हिरण्यगर्भः समवत्र्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्’ को उद्धृत कर उसके अर्थ पर प्रकाश डालते हुए ऋषि दयानन्द बताते हैं कि हे मनुष्यो! जो सृष्टि के पूर्व सब सूर्यादि तेजवाले लोकों का उत्पत्ति स्थान, आधार और जो कुछ उत्पन्न हुआ था, है ओर होगा उसका स्वामी था, है और होगा। वह पृथिवी से लेके सूर्यलोक पर्यन्त सृष्टि को बना के धारण कर रहा है। उस सुखस्वरूप परमात्मा ही की भक्ति जैसे हम (वैदिक विद्वान, ऋषि, मुनि व योगी) करें वैसे तुम लोग भी किया करो।

इसके बाद ऋषि ने ईश्वर विषयक कुछ शंकाओं का निवारण किया है। वह प्रश्न प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि आप ईश्वर-ईश्वर कहते हो परन्तु इसकी सिद्धि किस प्रकार करते हो? इसका उत्तर उन्होंने यह दिया है कि सब प्रत्यक्षादि प्रमाणों से वह ईश्वर के अस्तित्व व उसके गुण, कर्म व स्वभाव की सिद्धि करते हैं। प्रश्नकर्ता कहता है कि ईश्वर में प्रत्यक्षादि प्रमाण कभी नहीं घट सकते। इसका उत्तर ऋषि दयानन्द ने यह दिया है कि जो श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण और मन का शब्द, स्पर्श रूप, रस, गन्ध, सुख, दुःख, सत्यासत्य विषयों के साथ सम्बन्ध होने से ज्ञान उत्पन्न होता है उसको प्रत्यक्ष करते हैं परन्तु वह निभ्र्रम हो। अब विचारना चाहिये कि इन्द्रियों और मन से गुणों का प्रत्यक्ष होता है गुणी का नहीं। जैसे चारों त्वचा आदि इन्द्रियों से स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का ज्ञान होने से गुणी जो पृथिवी उस का आत्मायुक्त मन से प्रत्यक्ष किया जाता है वैसे इस प्रत्यक्ष सृष्टि में रचना विशेष आदि ज्ञानादि गुणों के प्रत्यक्ष होने से (आत्मायुक्त मन से ही) परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष है। ऋषि दयानन्द के यह शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इस पर यदि ध्यान देंगे और इसे समझ लेंगे तो मनुष्य ईश्वर का प्रत्यक्ष व साक्षात् कर सकता है। ज्ञानादि गुणों से उन गुणों के गुणी व सत्ता पृथिवी, आत्मा व परमात्मा आदि का प्रत्यक्ष होता है। पाठकों को ऋषि के इन शब्दों पर विशेष ध्यान देने सहित विचार व चिन्तन मनन करना चाहिये।

ऋषि आगे लिखते हैं कि और जब आत्मा मन और मन इन्द्रियों को किसी विषय में लगाता वा चोरी आदि बुरी वा परोपकार आदि अच्छी बात के करने का जिस क्षण में आरम्भ करता है, उस समय जीव की इच्छा, ज्ञानादि उसी इच्छित विषय पर झुक जाते हैं। उसी क्षण में आत्मा के भीतर से बुरे काम करने में भय, शंका और लज्जा तथा अच्छे कामों के करने में अभय, निःशंकता और आनन्दोत्साह उठता है। वह जीवात्मा की ओर से नहीं किन्तु परमात्मा की ओर से होता है। और जब जीवात्मा शुद्ध होकर परमात्मा का विचार करने में तत्पर रहता है उस को उसी समय दोनों प्रत्यक्ष होते हैं। जब परमेश्वर का प्रत्यक्ष होता है तो अनुमानादि से परमेश्वर के ज्ञान होने में क्या सन्देह है? क्योंकि (सृष्टि व इतर अपौरुषेय) कार्य को देख के कारण (निमित्त कारण ईश्वर, जीवात्मा, उपादान कारण प्रकृति आदि) का अनुमान होता है।

परमात्मा व्यापक है या किसी देश-विशेष में रहता है? इसका उत्तर देते हुए ऋषि दयानन्द ने बताया है कि परमात्मा व्यापक (सर्वव्यापक) है। क्योंकि जो वह एक देश व स्थान विशेष में रहता यथा वैकुण्ठ, चैथे या सातवें आसमान आदि में, तो सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वनियन्ता, सब का स्रष्टा, सब का धर्ता और प्रलयकर्ता नही हो सकता था। अप्राप्त देश में कर्ता की क्रिया का होना असम्भव होता है।

ऋषि दयानन्द परमात्मा को दयालु और न्यायकारी दोनों मानते हैं। इस पर की जाने वाली शंकाओं का उत्तर देते हुए वह कहते हैं कि न्याय और दया का नाममात्र ही भेद है क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से होता है। दण्ड देने का प्रयोजन यह है कि मनुष्य अपराध करने से छूट कर दुःखों को प्राप्त न हो, वही दया कहाती है। जो पराये दुःखों का छुड़ाना और जैसा अर्थ दया और न्याय का अज्ञानी व भ्रान्त लोग करते हैं वह ठीक नहीं क्योंकि जिस ने जैसा व जितना बुरा कर्म किया हो, उस को उतना व वैसा ही दण्ड देना चाहिये। उसी का नाम न्याय है। और जो अपराधी को दण्ड न दिया जाय तो दया का नाश हो जाय। क्योंकि एक अपराधी डाकू को छोड़ देने से सहस्रों धर्मात्मा पुरुषों को दुःख देना है। जब एक अपराधी के छोड़ने से सहस्रों मनुष्यों को दुःख प्राप्त होता है वह दया किस प्रकार हो सकती है। दया वही है कि उस डाकू वा हिंसक प्रवृत्ति के मनुष्य को कारागार में रखकर पाप करने से बचाना। डाकू पर और उस डाकू को मार देने से अन्य सहस्रों मनुष्यों पर दया प्रकाशित होती है। ऋषि दयानन्द जी के यह विचार की आज की परिस्थितियों सर्वथा सत्य, प्रासंगिक एवं प्रामाणिक हैं।

ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में यह अत्युत्तम उपदेश अति विस्तृत है। इसमें ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना आदि अनेक विषयों को भी सम्मिलित किया गया है। पाठकों को सत्यार्थप्रकाश पढ़कर ईश्वर व इससे जुड़े विषयों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना चाहिये और अपने जीवन को सफल बनाना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

kuponbet giriş
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano
ikimisli giriş
istanbulbahis giriş
betnano
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
meritbet
galabet giriş
galabet giriş
pashagaming giriş
grandpashabet giriş
betnano
ultrabet giriş
jojobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
bahislion giriş
betkolik giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano
almanbahis giriş
betmarino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano
betnano
grandpashabet giriş
casibom
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
betgar giriş
bahislion giriş
meritbet giriş
betplay giriş
meritbet giriş