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इतिहास के पन्नों से

द्वारका धाम का वर्तमान स्वरूप

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

भगवान श्री कृष्ण ने बसाई द्वारका

द्वारकाधीश मंदिर में भगवान कृष्ण की एक काले संगमरमर की मूर्ति है। धार्मिक स्थलों के अलावा श्री द्वारकाधीश मंदिर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। गोमती नदी के तट पर बसा यह पौराणिक नगर द्वारका भगवान श्री कृष्ण का निवास स्थान था। जब श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा कंस का वध किया, तो उसके ससुर जरासंध क्रोध से पागल हो गए। जरासंध ने 17 बार भगवान कृष्ण की राजधानी मथुरा पर आक्रमण किया और अपने दामाद कंस की मृत्यु का बदला लेने की कोशिश की। जरासंध के बार बार आक्रमण करने से लोगों का जीवन, व्यापार और खेती बर्बाद हो रही थी। लोगों का जीवन बचाने और बार बार के नुकसान से बचने के श्री कृष्ण ने लड़ाई के मैदान को छोड़ दिया और रणछोड़जी नाम भी विख्यात हुए।

गुजरात के जामनगर जिले में स्थित द्वारका भारत के 4 धाम में से एक धाम होने के साथ ही सात मोक्षदायी तथा अति पवित्र नगरों अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, काञ्चीपुरम, अवन्तिका (उज्जैन), द्वारिकापुरी में से एक है। अरब सागर के किनारे बसी द्वारका समुद्री चक्रवात तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण अब तक छः बार समुद्र में डूब चुकी है। द्वारका को भारत के सबसे पवित्र स्थलों – चार धामों, जिनमें बद्रीनाथ, पुरी और रामेश्वरम शामिल हैं – के साथ जोड़ा गया है। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण इस शहर का निर्माण करने के लिए उत्तर प्रदेश के ब्रज से यहां पहुंचे थे। अब इस शहर को गोल्डन सिटी के नाम से भी जाना जाता है।

18 लोगों के साथ आए थे कृष्ण

कहा जाता है कि कृष्ण यहां कुल 18 लोगों के साथ आए थे। यहां उन्होंने द्वारिका को बसाया और पूरे 36 साल तक राज किया। इसकी स्थापना 2500 साल पहले भगवान कृष्ण के पोते वज्रनाभ ने की थी। इस मंदिर पर 16वीं और 19वीं शताब्दी पर मंदिर पर हमले किए गए थे। जिसके निशान आज भी हैं। मंदिर एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है, जहां तक पहुंचने के लिए 50 से अधिक सीढ़ियां हैं, इसकी भारी मूर्तिकला वाली दीवारें गर्भगृह को मुख्य कृष्ण मूर्ति से जोड़ती हैं।

द्वारका छह बार समुद्र में डूबी

ऐसा कहा जाता है कि द्वारका छह बार समुद्र में डूबी थी और अब जो हम देखते हैं वह उसका सातवां अवतार है। इस मंदिर की अपने आप में एक दिलचस्प कथा है। मंदिर की मूल संरचना को 1472 में महमूद बेगड़ा ने नष्ट कर दिया था, और बाद में 15वीं-16वीं शताब्दी में इसका पुनर्निर्माण किया गया।

द्वारकाधीश का जगत मंदिर

द्वारकाधीश का मंदिर को जगत मंदिर भी कहा जाता है। इस 5 मजिल ऊँचे भव्य मंदिर की सुन्दरता देखकर और मंदिर के शिखर पर लहराती मनमोहक विशाल ध्वजा को देखकर पलके भी नहीं झपका पाएंगे। मंदिर के शिखर की यह बहुरंगी 84 फुट लम्बी ध्वजा प्रतिदीन पांच बार बदली जाती है। द्वारकाधीश को अर्पण करने के लिए तुलसीदल (मंजरी) की माला और माखन मिश्री का प्रसाद श्रद्धानुसार ले सकते है। मंदिर में 2 द्वार है मोक्ष द्वार और स्वर्ग द्वार। स्वर्ग द्वार से मंदिर के भीतर प्रवेश किया जाता है। गर्भगृह में विराजित लोक-पालक, ब्रह्मांड नायक, राजाधिराज श्री द्वारकाधीश के दिव्य दर्शन होंगे। आप इनके श्यामवर्णीय, चतुर्भुज, अपने 4 हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किये, कई माणिक रत्नों के आभूषण से सुसज्जित, सुन्दर वेशभूषा से सजे रूप को निहारने का अवसार मिलता है।दर्शन करने के बाद मोक्ष द्वार से बाहर की ओर निकल कर गोमती नदी के दर्शन मिलते हैं।

  जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण की प्रतिमा का खास श्रृंगार होता है। उन्हें जरी और कढ़ाई के मखमली पोशाक पहनाई जाती है और कीमती गहनों से सजाया जाता है। जिसके बाद पूजा-अर्चना की जाती है और भगवान कृष्ण को भोग लगाया जाता है।

 रणछोड़जी के मन्दिर के सामने एक बहुत लम्बा-चौड़ा 100 फुट ऊंचा जगमोहन है। इसकी  पांच मंजिलें है और इसमें 60 खम्बे है। रणछोड़जी के दर्शन के बाद मन्दिर की परिक्रमा की जाती है। मन्दिर की दीवार दोहरी है। दो दावारों के बीच इतनी जगह है कि आदमी समा सके। यही परिक्रमा का रास्ता है। 

दही हांडी का उत्सव

द्वारका में जन्माष्टमी केवल पूजा के बारे में नहीं है बल्कि दही हांडी जन्माष्टमी उत्सव के लिए भी प्रसिद्ध है। इस दिन युवाओं को टीमों में विभाजित किया जाता है जो “दही हांडी’ खेल में शामिल होते हैं। बता दें, दही हांडी जन्माष्टमी उत्सव का एक प्रमुख अनुष्ठान है जो युवा भगवान कृष्ण के जीवन और कार्यों को दर्शाता है।

गोमती घाट और मंदिरों के दर्शन

गोमती नदी के किनारे नौ घाट है। जहाँ सरकारी घाट के पास एक निष्पाप कुण्ड है, यहाँ आप गोमती नदी का दर्शन और स्नान कर लीजिये। यहाँ सावलिया जी मंदिर, गोबरधननाथ मंदिर, महाप्रभु बैठक और वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मन्दिर है। आखिर में संगम घाट आता है, यहां गोमती नदी का समुद्र से संगम होता है। इस संगम घाट पर नारायणजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।

सुदामा सेतु

यह एक जगह है जहाँ आप एक सुंदर सूर्योदय और एक आश्चर्यजनक सूर्यास्त लगभग एक ही स्थान पर देख सकते हैं। सूर्योदय के लिए, सुदामा सेतु पर खड़े होने से बेहतर कोई जगह नहीं है – गोमती नदी के दो किनारों से जुड़ने वाला केबल पुल। यह अपेक्षाकृत नया पुल रिलायंस समूह द्वारा बनाया गया है। पुल, सूर्योदय, और समुद्र के साथ गोमती का मिलन बिंदु – सभी बस आश्चर्यजनक लगते हैं क्योंकि सुबह की किरणें उन पर पड़ती हैं। पुल के पार, नदी को बैठने के लिए साफ-सुथरी बेंचों के साथ एक पैदल मार्ग के साथ लाइन किया गया है। घाटों पर लोग डुबकी लगाते हैं और मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं।

पंच नंदन तीर्थ

आप गोमती घाट के पास बने सुदामा सेतु को पार करके पंचनंदन तीर्थ आ जाइये। यह सुदामा सेतु ऋषिकेश के लक्ष्मण झूले जैसा दीखता है। यहाँ पांच पांडव के नाम पर पांच कुण्ड बने है। आप इन पांचों कुण्ड के जल का आचमन कर लीजिये, आपको आश्चर्य होगा कि चारों तरफ समुद्र का गहरा खारा पानी होने के बाद भी इन कुण्ड के जल का स्वाद मीठा और एक दूसरे से भिन्न है।

समुद्र नारायण मंदिर

यहाँ प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर है, जिसके आँगन में अद्भुद पेड़ है। ऐसा पेड़ आपने पहले नहीं देखा होगा, इस पेड़ के नीचे ऋषि दुर्वासा ने तपस्या की थी।

दुर्वासा और त्रिविक्रम मंदिर

दक्षिण की तरफ बराबर-बराबर दो मंदिर है। एक दुर्वासाजी का और दूसरा मन्दिर त्रिविक्रमजी को टीकमजी कहते है। इनका मन्दिर भी सजा-धजा है। मूर्ति बड़ी लुभावनी है। और कपड़े-गहने कीमती है। त्रिविक्रमजी के मन्दिर के बाद प्रधुम्नजी के दर्शन करते हुए यात्री इन कुशेश्वर भगवान के मन्दिर में जाते है। मन्दिर में एक बहुत बड़ा तहखाना है। इसी में शिव का लिंग है और पार्वती की मूर्ति है।

कुशेश्वर मंदिर

कुशेश्वर शिव के मन्दिर के बराबर-बराबर दक्षिण की ओर छ: मन्दिर और है। इनमें अम्बाजी और देवकी माता के मन्दिर खास हैं। रणछोड़जी के मन्दिर के पास ही राधा, रूक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बवती के छोटे-छोटे मन्दिर है। इनके दक्षिण में भगवान का भण्डारा है और भण्डारे के दक्षिण में शारदा-मठ है।

शारदा मठ

शारदा-मठ को आदि गुरू शंकराचार्य ने बनवाया था। उन्होने पूरे देश के चार कोनों में चार मठ बनायें थे। उनमें एक यह शारदा-मठ है। परंपरागत रूप से आज भी शंकराचार्य मठ के अधिपति है। भारत में सनातन धर्म के अनुयायी शंकराचार्य का सम्मान करते है।

द्वारका शहर की परिक्रमा

रणछोड़जी के मन्दिर से द्वारका शहर की परिक्रमा शुरू होती है। पहले सीधे गोमती के किनारे जाते है। गोमती के नौ घाटों पर बहुत से मन्दिर है- सांवलियाजी का मन्दिर, गोवर्धननाथजी का मन्दिर, महाप्रभुजी की बैठक।

हनुमान मंदिर

आगे वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मन्दिर है। आखिर में संगम घाट आता है। यहां गोमती समुद्र से मिलती है। इस संगम पर संगम-नारायणजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।

चक्र तीर्थ

संगम-घाट के उत्तर में समुद्र के ऊपर एक ओर घाट है। इसे चक्र तीर्थ कहते है। इसी के पास रत्नेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसके आगे सिद्धनाथ महादेवजी है, आगे एक बावली है, जिसे ‘ज्ञान-कुण्ड’ कहते है। इससे आगे जूनीराम बाड़ी है, जिससे, राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तिया है। इसके बाद एक और राम का मन्दिर है, जो नया बना है। इसके बाद एक बावली है, जिसे सौमित्री बावली यानी लक्ष्मणजी की बावजी कहते है। काली माता और आशापुरी माता की मूर्तिया इसके बाद आती है।

कैलाश कुण्ड

इनके आगे यात्री कैलासकुण्ड़ पर पहुंचते है। इस कुण्ड का पानी गुलाबी रंग का है। कैलासकुण्ड के आगे सूर्यनारायण का मन्दिर है।

शहर का पूरब का दरवाजा

इसके आगे द्वारका शहर का पूरब की तरफ का दरवाजा पड़ता है। इस दरवाजे के बाहर जय और विजय की मूर्तिया है। जय और विजय बैकुण्ठ में भगवान के महल के चौकीदार है। यहां भी ये द्वारका के दरवाजे पर खड़े उसकी देखभाल करते है। यहां से यात्री फिर निष्पाप कुण्ड पहुंचते है और इस रास्ते के मन्दिरों के दर्शन करते हुए रणछोड़जी के मन्दिर में पहुंच जाते है। यहीं परिश्रम खत्म हो जाती है। यही असली द्वारका है।

इस्कॉन मंदिर

अगर आप द्वारकादीश मंदिर जा रहे हैं, तो यहां के इस्कॉन मंदिर के दर्शन भी जरूर करें। भगवान कृष्ण और देवी राधा की आवास मूर्तियों को समृद्ध परिधानों में लिपटा हुआ और फूलों से अलंकृत किया गया, यह पूरी तरह से पत्थर से निर्मित मंदिर है। हालांकि इस्कॉन मंदिर दुनिया भर के अन्य इस्कॉन मंदिरों से ज्यादा अलग नहीं है, लेकिन इसकी और भव्यता देखते ही बनती है।

भदकेश्वर महादेव मंदिर

भगवान शिव को समर्पित यह छोटा और शांत मंदिर द्वारका के दर्शनीय स्थलों और शांत वातावरण के लिए अवश्य ही देखने योग्य स्थानों में से एक है। अरब सागर के दृश्य के साथ, मंदिर नीले पानी, सुनहरी रेत और दिन भर शांत हवा से घिरा रहता है। भदकेश्वर महादेव मंदिर, लगभग 5000 साल पुराना एक प्राचीन मंदिर है, जिसे अरब सागर में पाए गए एक स्वयंभू शिवलिंग के आसपास बनाया गया था। मंदिर हर साल मानसून के दौरान समुद्र में डूब जाता है, जिसे भक्त प्रकृति द्वारा अभिषेकम की धार्मिक प्रक्रिया को करने का तरीका मानते हैं। सुबह 6:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक मंदिर खुलता है।

द्वारका बीच

द्वारकाधीश मंदिर से करीब 1 किमी की दूरी और समुद्र नारायण मंदिर से कुछ क़दमों की दूरी पर द्वारका बीच है। यहाँ दूर दूर तक फैला सफ़ेद रेत का समुद्री तट द्वारका में आराम करने के लिए सबसे अच्छी जगह है। यहाँ आप ऊंट की सवारी का आनंद ले सकते है। यहाँ समुद्र की लहरे ऊँची आती है इसलिए समुद्र में उछलकूद करते समय ज्यादा आगे तक न जाएँ और बच्चों का ध्यान रखे। शाम को यहाँ शांत और खूबसूरत वातावरण निर्मित हो जाता है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। )

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