| काश मानव धर्म को समझते ||

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ऋषि दयानंद जी ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के अंत में, स्वमत्वव्या मन्तव्य प्रकाश प्रकरण में धर्म और अधर्म को समझाते हुए लिखते है :- “धर्मा धर्म” जो पक्षपात रहित, न्यायाचरण, सत्यभाषादियुक्त ईश्वराज्ञा, वेदों से अविरुद्ध है, उसको ‘धर्म’ और जो पक्षपात सहित अन्यायाचरण, मिथ्याभाषणादि ईश्वराज्ञा भंग वेद विरुद्ध है, उसको ‘अधर्म’ मानता हूँ| धर्म क्या है अब उसे देंखे :सीमानो नाऽतिक्रमणम्यत्त धर्मम् |
अपनी सीमा, मर्यादा अर्थात कर्तव्य व अधिकारों का अतिक्रमण न करना ही धर्म का महत्वपूर्ण अंग व लक्षण है | अत: प्रत्येक धारण किया जाने वाला सदाचरण एवं सर्वकल्याणकारी व श्रेष्ठविधान (नियम/कानून) अथवा सामाजिक व्यवस्था (अनुशासन) को भी धर्म कहा जाता है | श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मन: | एतच्चतु विर्धिंप्राहु: साक्षत धर्मस्य लक्षणम् ||
वेद के द्वारा दिये गये आदेशों, निर्देशों, आज्ञाओं व पुरुषों के गुण, कर्म, स्वाभाव एवं उनके द्वारा रचित ग्रंथों और अपनी आत्मा अर्थात स्वयं को प्रिय लगने वाले सत्य भाषण आदि व्यव्हार को एक संगठन के रूप में ( एक साथ) जीवन में धारण करना (चरित्र में उतार लेना ) ही साक्षात धर्म व धार्मिक व्यक्ति के लक्षण है|
अस्तु जो पक्षपात रहित न्याय, सत्य का ग्रहण व् असत्य का सर्वथा परित्याग रूपाचार (आचरण) है, उसी का नाम धर्म है, और इसके विपरीत जो पक्षपात सहित अन्यायाचरण सत्य का त्याग व् असत्य का ग्रहण रूप कर्म का आचरण है उसी को “अधर्म” कहते है |
महर्षि व्यास जी भी कहते है :- श्रुतयां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चौवाव धार्यताम् | आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत||
अर्थात जो-जो गुण कर्म स्वाभाव आचरण व्यव्हार आपको अपने लिए अच्छा नही लगता है, जिसे आप अपने साथ कराने को तैयार नहीं है | वैसा प्रतिकूल आचरण व्यवहार आपको भी दूसरों के साथ कदापि नही करना चाहिये, यही धर्म है |
धर्म किसे कहते हैं भली प्रकार उसे जानना होगा, फिर उसपर आचरण करना संभव होगा बिना जाने आचरण कैसे संभव होगा भला ? यह मात्र धर्म के साथ ही नही हम मानव कहलाने वाले जब भी कोई काम करते हैं उसे भली प्रकार जानकारी रखते हुये ही करते हैं, बिना जानकारी के कोई काम न किया जाता और न तो कोई करता है | और अगर बिना जानकारी लिए अथवा रखे कोई काम करता है तो वह ज्यादा बिगड़ने की दशा में होती है और गलत होने की संभावना ज्यादा रहती है तथा लोकाचार में भी उपहास का पात्र बनना पड़ता है आदि |
जब मानव कहलाने वाले किसी भी काम को जानकर ही करता है, तो धर्म को बिना जाने उसपर आचरण करना उसे अमल में लाना, उसपर चलना, उसे जीवन में उतरना क्यों और किसलिए संभव हो सकता है भला ?
क्या धर्म किसी इनसान के बनाये होते हैं, अथवा किसी व्यक्ति विशेष के चलाये होते हैं ? इसे भली प्रकार समझना होगा मानव कहलाने वालों को, की सूर्य, चन्द्रमा, आकाश, धरती, हवा, पानी, आदि जितने भी हैं वह किसके बनाये हैं, और किनके लिए बनाये गये हैं ?
इन्ही बातों पर अगर मानव कहलाने वाले विचार करें तो अपने आप बात समझ में आ जाना स्वाभाविक है | देखें यह तो सभी लोग प्रायः जिनके नाम हिन्दू, मुसलिम, सिख, और ईसाई पड़ा, यह सभी लोग यही मानते हैं, यह सारा बनाया परमात्मा का है, अल्लाह तथा ईश्वर का बनाया हुवा हैं |
अब सवाल होगा कि यहाँ तक तो सभी लोगों का ख्याल और विचार एक ही है, किन्तु यह समझने के लिये तैयार कोई नही, कि जब यह सभी बनाने वाला वही है तो यह सभी सामान मानव मात्र के लिए बनाया अथवा, किसी एक के लिए ?
जब मानव मात्र को यह पता लगा की परमात्मा का बनाया अथवा ईश्वर निर्मित सामान अगर मानव मात्र के लिए है तो मानव मात्र का धर्म भी ईश्वर द्वारा क्यों नही ?
जैसा परमात्मा का बनाया, निर्माण किया वस्तु मनुष्य मात्र के लिए हैं तो ठीक उसी प्रकार धर्म भी मनुष्य मात्र के लिए उसी परमात्मा के बनाये हुए ही हैं ?
इन्ही बातों को अगर यह मानव कहलाने वाले समझ लेते, तो आज यह धर्म के नाम से जो धरती मानवों के खून से रंग रहे हैं वह बंद हो जाता | कारण धर्म का काम है मानव को मानव के साथ जोड़ना, फिर यह मानव दुसरे मानव को अपना शत्रु समझ रहा है वह भी धर्म की दोहाई देकर तो वह धर्म क्यों और किसलिए हो सकता है भला ?
आज सम्पूर्ण धरती पर यही धर्म के नाम से लोग लडे जा रहे हैं, कहीं हिन्दू मुसलिम की लड़ाई है, कहीं शिया सुन्नी की लड़ाई है, कहीं इस्लाम और ईसाई की लड़ाई है | आज सम्पूर्ण धरती यही मानवों के खून से रंगाने में लोग संकोच नही कर रहे हैं, हम मानव कहलाने वालों को आज यही उचित होगा की हम धर्म को जानें उसे समझें और उसपर अमल करें और मानव कहलाने का परिचय दें | सभी आत्माओं को अपनी आत्मा की तरह समझें, अन्यों के सुख दुःख को अपना सुख दुःख समझने पर ही हम मानव धर्म की रक्षा कर सकते हैं अन्य कोई रास्ता ही नही, यही मानव मात्र का धर्म एक है, आयें हम इसी मानव धर्म को अपने जीवन में उतारें और दुनिया वालों को आत्मीयता सिखाएं जिससे मानवता की रक्षा हो सके, इसी का ही नाम है मानव धर्म इसी को ही ईश्वर प्रदत्त धर्म कहते हैं |
महेन्द्र पाल आर्य – वैदिक प्रवक्ता -4/9/2024

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