वैदिक सम्पत्ति , भाग- 343 : जाति,आयु और भोग

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(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की पुस्तक वैदिक सम्पत्ति नामक से अपने सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)
प्रस्तुति -देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन- ‘उगता भारत’

गतांक से आगे ….

मोन का स्वरूप, स्थान और साधन

मोक्ष का स्वरूप दो प्रकार का है। दुःखों से छूट जाना पहिला स्वरूप है और आनन्द प्राप्त करना दूसरा स्वरूप है। पहिले स्वरूप के पक्षपाती कहते हैं कि दुःखों के ही अत्यन्ताभाव में आनन्द भरा हुआ है। वे कहते हैं कि सुषुप्ति इसका नमूना है। इसीलिए सांख्यशास्त्र में कहा गया है कि ‘सुषुप्ति-समाधि-मुक्तिषु ब्रह्मरूपता’ अर्थात् समाधि और सुषुप्ति आदि की ही भाँति मोक्ष में ब्रह्मरूपता होती है। परन्तु आनन्दपक्षवाले कहते हैं कि सुषुप्ति में केवल दुःखों का ही तिरोभाव होता है, ग्रानन्द की प्राप्ति नहीं होती। जो लोग कहते हैं कि जागने पर मनुष्य का यह कहना कि अच्छी नींद आई वह आनन्द की ही सूचना है, वे बाललीला ही करते हैं। क्योंकि सुषुप्ति के समय न सुखों का ही भान होता है न दुःखों का ही। यदि सुखों और दुःखों का अत्यन्ताभाव ही आनन्द है, तो क्लोरोफार्म सूंघें हुए मनुष्य और मरे हुए मुर्दे सब को आनंद ही में समझना चाहिये और पत्थर, मिट्टी तथा दीवारों को मुक्त ही मानना चाहिये । किन्तु मुक्ति का अर्थ आनन्द प्राप्त करना है, इसलिए मोक्ष का यह स्वरूप गलत है। मोक्ष का दूसरा स्वरूप आनन्द है। पर विना दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति के आनन्द भी नहीं हो सकता, इसलिए मोक्ष का सच्चा स्वरूप दुःखों की निवृत्ति और आनन्द की प्राप्ति ही है, अतः हम यहाँ देखना चाहते हैं कि दुःखों की निवृत्ति और आनन्द का क्या रहस्य है ?

दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति का अर्थ प्रकृतिबन्धन अर्थात् मायावेष्टन से छूट जाना है। स्थूल और सूक्ष्म शरीरों से जब छुटकारा मिल जाता है तब दुःखों का अत्यन्ताभाव हो जाता है। क्योंकि न्यायशास्त्र में लिखा है कि दुःखों का कारण शरीर ही है। आाध्यामिक, आधिदैविक और आधिभौतिक आदि जितने दुःख होते हैं, सब शरीर ही के द्वारा होते हैं। इसलिए शरीर के अत्यन्ताभाव से ही दुःखों का अत्यन्ताभाव हो जाता है। परन्तु जैसा कि अभी हमने कहा है कि केवल दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति से ही आनन्द की प्राप्ति नहीं हो जाती, इसलिए देखना चाहिये कि आनन्द क्या है ?

आनन्द दो प्रकार का है। पहिला प्रकार यह है कि मुझे किसी प्रकार का दुःख न हो और मैं ज्ञानयुक्त होकर संसार का और अपने आपका रसास्वादन करू। दूसरा प्रकार यह है कि मुझे किसी प्रकार का दुःख न हो और मैं परमेश्वर को प्राप्त करके उसका रसास्वादन करू। इन दोनों प्रकारों में से पहिले प्रकार में संसार और अपने आपके रसास्वादन की लालसा है और दूसरे में परमात्मा के रसास्वादन की अभिलाषा है। इसलिए देखना चाहते हैं कि इन दोनों में से कौनसा प्रशस्त है ?

इनमें से संसार के रसास्वादन में आनन्द नहीं है। क्योंकि संसार का रसास्वादन बिना शरीर के हो नहीं सकता और शरीर ही दुःखों का घर है, इसलिए दुःखदायी शरीर के साथ जो थोड़ा बहुत संसार का सुख अनुभूत होता है, बह दुःखतमिश्रित होने से कष्टकर ही होता है, इसलिए संसार के रसास्वादन का नाम आनन्द नहीं हो सकता। रहा अपने झापका रसास्वादन, सो वह भी आनन्द नहीं कहला सकता। क्योंकि एक तो अपने आपसे कभी कोई अधिक समय तक तृप्त नहीं रह सकता, दूसरे अपने आपके अनुभव करने के लिए मस्तिष्क की आवश्यकता होती है, जिसके द्वारा अपने आपका अनुभव होता है। जब तक मस्तिष्क न हो तबतक विचार ही उत्पन्न नहीं हो सकते, इसलिए यह विचारानन्द भी शरीर के आश्रित होने से सदैव दुःखमिश्रित ही रहता है। तीसरी बात जो अपने आपमें आनन्द के बिगाड़नेवाली है, यह आत्मा की बनावट अर्थात् उसका स्वभाव है। उसके स्वभाव में इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और ज्ञान तथा प्रयत्न सदैव बने रहते हैं। इसलिए वह शांति से अपने आपका रसास्वादन कर ही नहीं सकता।
यही कारण है कि अपने आपका रसास्वादन भी आनन्द नहीं कहला सकता। अब रही दूसरे प्रकार के आनन्द की बात। यह आनन्द परमात्मा के सकाश में, उसके सम्मेलन में और तदाकार हो जाने में बतलाया जाता है, जो ठीक प्रतीत होता है। क्योंकि शुद्ध स्थायी आनन्द के लिए शुद्ध और स्थायी आनन्दवाले पदार्थ ही की आवश्यकता है। इसीलिए उपनिषद् में कहा गया है कि ‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा अनन्दरूपममृतं यद्विनाति’ अर्थात् जो आनन्द रूप अमृत है उसको विज्ञान से ही विद्वान् देखते हैं। इसका कारण यही है कि वह प्रकृतिबन्धन से रहित पूर्ण ज्ञानी और सर्वव्यापक है। अतः उसमें आनन्द के अतिरिक्त दुःखों की सम्भावना ही नहीं है।
क्रमशः

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