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आज का चिंतन

ओ३म् “ईश्वर की न्याय व्यवस्था सर्वज्ञता पर आधारित होने से निर्दोष है”

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संसार में अनेक देश हैं जिनमें अपनी अपनी न्याय व्यवस्था स्थापित वा कार्यरत है। सभी देशों की न्याय व्यवस्थायें एक समान न होकर अलग-अलग हैं। भारत की न्याय व्यवस्था अन्य देशों से भिन्न प्रकार की है जिसका एक कारण भारत का अपना संविधान है। हमारे देश में वादों के निर्णय होने में वर्षों लगते हैं जबकि यूरोप व अन्य देशों में शायद कम समय लगता है। विश्व की सभी न्याय व्यवस्थायें पूर्ण निर्दोष नहीं कही जा सकती। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि मनुष्य अल्पज्ञ वा अल्प ज्ञानी होता है। वह पूर्ण ज्ञानी नहीं होता न कभी हो सकता है। एकदेशी, ससीम, जन्म-मरणधर्मा, अल्पज्ञ जीव सर्वज्ञ एवं पूर्ण कभी हो भी नहीं सकता। अल्पज्ञानी जीवों वा मनुष्यों के कार्यों व रचनाओं में भी अपूर्णता होती है। इस कारण मनुष्यों का कोई भी कार्य पूर्ण निर्दोष कभी नहीं होता। हां, समय के साथ मनुष्य यदि अपने ज्ञान व अनुभव को बढ़ाये तो वह अपने कार्यों में सुधार कर सकता है। ज्ञान एवं अनुभव बढ़ने से मनुष्य के कार्यों में न्यूनता कम होती रहती है परन्तु पूर्णता कभी नहीं आ सकती। ऐसा होने पर भी मनुष्य ज्ञान वृद्धि एवं पुरुषार्थ से जीवन में उच्च स्थिति को प्राप्त कर सकता है। आज भौतिक उन्नति ने जो स्थान प्राप्त किया है वह इसी सिद्धान्त पर चलकर प्राप्त हुआ है। मनुष्य अधिकतम उन्नति को तभी प्राप्त होता है कि जब वह अपने शरीर की क्षमताओं का अधिकतम तथा अपनी बुद्धि का पूर्ण अर्थात् 100 प्रतिशत विकास कर ले जो कि सम्भव प्रतीत नहीं होता। अतः मनुष्य कोई भी व्यवस्था बनायेगा वह सदैव अपूर्ण होने से निर्दोष नहीं हो सकती।

प्रश्न यह है कि यदि मनुष्य अल्पज्ञ व अपूर्ण है तो फिर संसार में क्या कोई ऐसी सत्ता है जो अस्तित्ववान हो और पूर्व ज्ञानवान हो। ऐसी सत्ता जो अल्पज्ञ न होकर सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमानतथा अपूर्ण न होकर पूर्ण हो? इसका उत्तर है कि हां, संसार में एक सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर है जो सर्वज्ञ भी है और पूर्ण भी है। फिर प्रश्न होता है कि क्या उसकी कोई न्याय व्यवस्था है? इसका उत्तर भी यही मिलता है कि हां, उसकी अपनी न्याय व्यवस्था है और उसकी वह व्यवस्था पूर्ण निष्पक्षता पर आधारित एवं निर्दोष है। इसी विषय को इस लेख में प्रस्तुत किया जा रहा है। ईश्वर के सत्यस्वरूप व उसकी न्याय व्यवस्था को जानकर मनुष्य दुःखों से बचते हैं। दुःख के कारणों पर विचार करते हैं तो ज्ञात होता है कि मनुष्य के दुःखों का कारण उसके शुभाशुभ अथवा पाप-पुण्य रूपी कर्म हुआ करते हैं। ईश्वर न्यायकारी है। वह सर्वव्यापक, सर्वान्तयामी तथा सर्वशक्तिमान होने से सब जीवों के भीतर बाहर विद्यमान रहता है। वह संसार के भीतर व बाहर भी विद्यमान है। इस कारण सभी जीवों के सभी कर्मों को, जो रात्रि के अन्धकार व दिन के प्रकाश में किये जायें, उन सब कर्मों का ईश्वर साक्षी होता है। ईश्वर स्वयं साक्षी होता है अतः उसे मनुष्यों व अन्य किसी की साक्षी की आवश्यकता नहीं होती। ईश्वर को जीवों के कर्मों का न्याय करते हुए किसी की साक्षी की आवश्यकता नहीं होती। वह अपने प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर जीवों के पाप व पुण्यों का न्याय करता है और उन्हें उनके कर्मों के अनुरूप, न कम और न अधिक, फल देता है। जीवों के कर्मों के आधार पर ही उन्हें जन्म व योनि प्राप्त होती है। हमारा यह जन्म हमारे पूर्वजन्मों के पाप व पुण्य कर्मों के आधार पर मिला है। हमने पूर्वजन्मों में जो पाप पुण्य किये थे परन्तु जिनका फल हम पूर्वजन्मों में मृत्यु से पहले तक भोग नहीं सके थे, उन कर्मों के आधार पर ही हमें वर्तमान जन्म मिला है। उन्हीं अभुक्त व बचे हुए कर्मों का फल हम इस मनुष्य योनि सहित इतर सभी जीव वा प्राणी योनियों में भोगते हैं।

मनुष्य योनि उभय योनि है। अन्य सभी योनियां केवल भोग योनियां हैं। मनुष्य योनि इतर योनियों से भिन्न उभय योनि है जिसमें मनुष्य पूर्व किये हुए पाप-पुण्यों का सुख व दुःख रूपी फल भोगता है और नये कर्मों को भी करता है। जीवन की समाप्ति पर भोग से बचे हुए सभी पाप-पुण्य रूपी कर्मों के आधार पर ईश्वर द्वारा हमारा भावी जन्म निर्धारित होगा और हमें नया जन्म मिलता है। मनुष्य योनि में यदि हमारे पाप-पुण्य कर्मों में पुण्य कर्म आधे से अधिक होते हैं तभी हमें मनुष्य जन्म प्राप्त करने की अर्हता प्राप्त होती है। जिस मनुष्य के पाप कर्म पुण्य कर्मों से अधिक होते हैं वह नाना मनुष्येतर पशु व पक्षी आदि विभिन्न योनियों में जन्म पाते हैं। हमारा यह संसार व ईश्वर की न्याय व्यवस्था इसी प्रकार से कार्यरत है। हम जो भी पाप व पुण्य कर्म करते हैं उन्हीं का फल देने के लिये ईश्वर इस सृष्टि को बनाते, पालन करते व प्रलय करते हैं तथा जीवों को निरन्तर इस सृष्टि में जन्म व मृत्यु प्रदान करते रहते हैं। अनादि काल से ऐसा ही होता आ रहा है और अनन्त काल तक ऐसा ही होता रहेगा। सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय तीन अवस्थायें हैं। यह अवस्थायें ही अतीत में भी रहीं हैं व अनादि काल से आती जाती रहीं हैं तथा भविष्य में अनन्त काल तक इसी प्रकार सृष्टि की रचना, पालन तथा प्रलय का क्रम चलता रहेगा।

ईश्वर के स्वरूप तथा गुण, कर्म व स्वभाव को जानने व समझने के लिये मनुष्य को अपने हित व लाभ के लिये ऋषि दयानन्द प्रणीत ‘‘सत्यार्थप्रकाश” ग्रन्थ का अध्ययन करना चाहिये। ऋषि दयानन्द ने समस्त वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, ब्राह्मण ग्रन्थ, रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों का अध्ययन एवं विश्लेषण करने के बाद मनुष्य की जिज्ञासाओं एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर सत्यार्थप्रकाश की रचना की है। सत्यार्थप्रकाश जितना उपयोगी ग्रन्थ संसार में दूसरा कोई नहीं है। जिन विद्वानों ने इस ग्रन्थ को पढ़ा है उन सबने इस ग्रन्थ को विश्व के साहित्य में सर्वोपयोगी एव लाभप्रद बताया है। सत्यार्थप्रकाश में ईश्वर, जीवात्मा एवं प्रकृति वा सृष्टि के सत्यस्वरूप पर भी प्रकाश पड़ता है। सत्यार्थप्रकाश का एक लाभ यह भी है कि इससे अविद्या व विद्या का सत्यस्वरूप भी विदित होता है। मत-मतान्तरों की अविद्या का ज्ञान भी इस ग्रन्थ को पढ़कर पाठकों को होता है। वेदों का महत्व तथा ऋषियों के ग्रन्थों की विशेषतायें भी सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के अध्ययन से ज्ञात होती हैं। इसके साथ ही मनुष्यकृत ग्रन्थों में उनकी अल्पज्ञतावश कमियां व त्रुटियों का अवश्यम्भावी होना भी विदित होता है। अतः सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का सभी मनुष्यों को अध्ययन करना चाहिये।

ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के सत्य एवं यथार्थस्वरूप का उल्लेख कर आर्यसमाज के दूसरे नियम में लिखा है ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।’ ऋषि दयानन्द का यह ज्ञान अपने अध्ययन, योग, समाधि, चिन्तन, वेद एवं शास्त्राध्ययन पर आधारित होने सहित निर्दोष व परिपक्व विवेक बुद्धि पर आधारित है। वेद ईश्वरीय ज्ञान है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में अपने इन वचनों को अनेक प्रमाणों के आधार पर सिद्ध किया है। वेदों में ईश्वर को ‘अर्यमा’ अर्थात् न्यायकारी कहा गया है। प्रार्थना मन्त्रों में भी ऋषि दयानन्द ने वेदांगों के आधार पर ईश्वर को गुरु, आचार्य, राजा और न्यायाधीश बताया है। वस्तुतः ऋषि दयानन्द का यह कथन सर्वथा सत्य और प्रमाणिक है। वेद एवं योग मार्ग पर चलने से मनुष्य का आत्मा शुद्ध एवं पवित्र होता है तथा वह ज्ञानवान होकर सत्यासत्य के विवेक को प्राप्त होता है। ईश्वर के सान्निध्य से उसे उन विषयों का ज्ञान भी होता है जो साधारण बुद्धि वाले मनुष्यों को नहीं होता। वेदों में ऐसे रहस्य हैं जो वेद न पढ़ने वाले व इनसे दूर रहने वाले मनुष्यों की बुद्धि व मन में नहीं आते। वेद पढ़कर और ईश्वर, जीव व प्रकृति-सृष्टि विषय सहित सामाजिक व निज कर्तव्यों को जानकर ही मनुष्य सच्चा ज्ञानी होता है। अतः वेद एवं वेदानुकूल शास्त्रों का अध्ययन करना सभी मनुष्यों का कर्तव्य है।

वेद एवं शास्त्राध्ययन करने से ही हम जान पायेंगे कि हम जो भी कर्म करते हैं, उसका हमें ईश्वर की न्याय व्यवस्था से अवश्य ही फल भोगना पड़ता है। संसार में हम ऐसे बहुत से कर्म करते हैं जो देश के संविधान व कानून में अनुचित व दण्ड योग्य नहीं माने जाते। जो माने जाते हैं उन्हें भी हम छिपाने में सफल हो जाते हैं। परन्तु ईश्वर हमें हमारे सभी अन्याय व अनुचित कर्मों का उचित फल सुख व दुःख के रूप में प्रदान करता है। ईश्वर का न्याय सत्य सिद्धान्तों से युक्त तथा पूर्णता को प्राप्त होता है। मनुष्य पाप लोभ के कारण करता है। वेद में मनुष्यों को चेताया है कि लोभ मत करो, यह धन मनुष्य का नहीं अपितु सुखस्वरूप परमात्मा का है। हम जन्म के साथ धन लेकर नहीं आये और न संसार से लेकर जायेंगे। धन से मनुष्यों की तृप्ति कभी नहीं होती। इस शास्त्रीय वचन के प्रकाश में हमें परिग्रह की वृत्ति का त्याग करना चाहिये और वेदानुकूल शुभ, यज्ञमय एवं परोपकार आदि कर्मों को ही करना चाहिये जिससे हमारा भविष्य व परजन्म सुखी हों, हम उन्नति व मोक्ष को प्राप्त हों। हमें मनुस्मृति, न्यायदर्शन, रामायण तथा महाभारत आदि ग्रन्थों सहित नीति ग्रन्थों का भी अध्ययन करना चाहिये। इससे हमारा व देश का कल्याण होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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