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भारतीय क्रांति के अग्रदूत – स्वामी दयानंद (स्वतंत्रता दिवस के सुअवसर पर प्रकाशित)

#डॉविवेकआर्य

भारत के स्कूलों में पाठ्यकर्म में जो इतिहास पढ़ाया जाता हैं उससे सभी विद्यार्थियों को यह सिखाया जाता हैं की हमारे देश को आज़ादी केवल और केवल महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गये अहिंसा पूर्वक आन्दोलन से मिली थी। यह कहना न केवल उन ज्ञात और अज्ञात हजारों शहीदों का अपमान हैं जिन्होंने न केवल फाँसी का फन्दा चूमा था अपितु अपनी भरी जवानी ब्रिटिश सरकार की जेलों में काट डाली जिससे बुढ़ापा अत्यंत विषम परिस्तिथियो में बिता।
ऐसा ही अन्याय १८५७ के पश्चात सर्वप्रथम स्वदेशी राज और क्रांति का आवाहन करने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ हुआ हैं। जब महात्मा गाँधी ठीक से पैदल चलना भी नहीं सीखे थे उस काल में स्वामी दयानंद द्वारा अपने लेखन, भाषण, पत्र व्यवहार आदि के माध्यम से क्रांति का सन्देश दिया गया था इसी कारण से स्वामी दयानंद को भारतीय क्रांति के अग्रदूत कहा जाता हैं। स्वामी दयानंद वो क्रन्तिकारी सन्यासी थे जिन्होंने १८५७ के पश्चात उस काल में जब अंग्रेजों ने भारतवासियों की आत्मा को बर्बर तरीके से कुचला था जिससे वे अंग्रेजों के विरुद्ध दोबारा से संघर्ष करने का विचार स्वपन में भी न ले, उस काल में सर्वप्रथम स्वदेशी राज्य के लिए उद्घोष किया था। भारत के स्वाधीनता संग्राम में ८०% क्रांतिकारी आर्यसमाज की पृष्ठ भूमि से थे।यही कारण था की श्याम जी कृष्ण वर्मा, स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपत राय, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह और उनके पुरखे, वीर सुखदेव , ठाकुर रोशन सिंह जैसे हजारों क्रन्तिकारी हँसते हँसते अपने प्राणों की आहुति स्वतंत्रता संग्राम के महान यज्ञ को अर्पित कर गये थे।

कांग्रेस के इतिहास में पट्टाभि सितारामैया ने लिखा हैं

The Aryasamaj movement which owned its birth to the great inspiration of Swami Dayananda Saraswati was aggressive in its patriotic zeal and holding fast to the cult of the infallibility of the vedas and the superiority of the Vedic culture was at the same time not inimical to broad social reform. It thus developed a virile manhood in the nation, which was the synthesis of what was best in its heredity, with what is best in its environment. It fought some of the prevailing social evils and religious superstitions in Hinduism.
Indian National Congress (1885-1935) pp.20-21

स्वामी दयानंद के लेखन द्वारा जनजागरण

स्वामी दयानंद द्वारा राष्ट्र क्रांति के आवाहन के लिए अपने लेखन द्वारा जनजागरण किया गया था जिससे अपूर्ण हलचल उत्पन्न हुई और देश वासियों में चेतना उत्पन्न हुई जिससे भारत देश को स्वतंत्रता के सूर्य के दर्शन हुए थे।

अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश(द्वितीय संस्करण) के प्रमाण

१. स्वामी दयानंद द्वारा स्वदेशी राज्य को विदेशी राज्य से उत्तम बताना
कोई कितना ही करे, परन्तु जो स्वदेशी राज्य होता हैं, वह सर्वोपरि उत्तम होता हैं अथवा मत-मतान्तर के आग्रह रहित , अपने और पराये का पक्षपात शून्य , प्रजा पर माता-पिता के समान कृपा , न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायी नहीं हैं- ८ वां समुल्लास

२. स्वामी दयानंद द्वारा विदेशी राज होने के कारण बताना
विदेशियों के आर्यावर्त में राजा होने के कारण आपस की फूट , मतभेद, ब्रहमचर्य का सेवन न करना, विद्या न पढ़ना-पढ़ाना, बाल्यावस्था में अस्वयंवर विवाह, विषयासक्ति, मिथ्या भाषण आदि कुलक्षण, वेद विद्या का अप्रचार आदि कर्म हैं, जब आपस में भाई-भाई लड़ते हैं, तभी तीसरा विदेशी आकर पञ्च बन बैठता हैं- १० वां समुल्लास

३. स्वामी जी द्वारा बाघेर लोगों द्वारा अंग्रेजों से किये गये संघर्ष की प्रशंसा करना
जब सम्वत १९१४ के वर्ष में तोपों से मंदिर, मूर्तियाँ अंग्रेजों ने उड़ा दी थी तब मूर्ति कहाँ गई थी? प्रत्युत बाघेर लोगों ने जितनी वीरता दिखाई और लड़े, शत्रुओं को मारा परन्तु मूर्ति एक मक्खी की टांग भी न तोड़ सकी। जो श्री कृष्ण के सदृश कोई होता तो उनके धुर्रे उड़ा देता और ये भागते फिरते- ११ वां समुल्लास

४. स्वामी दयानंद द्वारा अंग्रेजों की मनोवृति का वर्णन
देखो अपने देश के बने हुए जूतों को आफिस और कचहरी जाने देते हैं , इस देशी जूते को नहीं। इतने में ही समझ लो की अपने देश के बने हुए जूतों का भी कितना मान-प्रतिष्ठा करते हैं। उतना भी अन्य देशस्थ मनुष्यों का नहीं करते।११ वां समुल्लास

५. स्वामी दयानंद द्वारा अंग्रेज भक्त ब्रहम समाजियों की कठोर भर्त्सना
इन लोगों में स्वदेश भक्ति बहुत न्यून हैं। ईसाईयों के आचरण बहुत से लिए हैं। अपने देश की प्रशंसा व पूर्वजों की बड़ाई करनी तो दूर रही, उसके बदले भरपेट निंदा करते हैं। व्याख्यानों में ईसाई और अंग्रेजों की प्रशंसा भरपेट करते हैं। ब्रह्मादि महर्षियों का नाम भी नहीं लेते। ब्रह्मा से लेकर अर्य वर्त में बहुत से विद्वान हो गये हैं, उनकी प्रशंसा न करके यूरोपियन की ही स्तुति में उतर पड़ना पक्षपात और खुशामद के बिना क्या कहा जाये। ११वां सम्मुलास

६. सत्यार्थ प्रकाश के ११ वें समुल्लास के अंत में आर्य राजाओं की वंशावली देकर स्वामी दयानंद ने प्राचीन भारत में गौरव, महिमा और समृद्धि का वर्णन कर भारतियों के मन में स्वतंत्रता, स्वाभिमान और गौरव प्राप्ति की दिशा में प्रखर चिंतन की और प्रेरित किया था।

७. हम प्रजापति अर्थात परमेश्वर की प्रजा और परमात्मा हमारा राजा हैं, हम उसके किंकर भृत्यवत हैं, वह कृपा करके अपनी दृष्टी में हमको राज्याधिकारी करे और हमारे हाथ से अपने सत्य न्याय की प्रवृति करावे। सत्यार्थ प्रकाश

सत्यार्थ प्रकाश-प्रथम संस्करण

१. एक तो यह बात की नोन (नमक) और पोन रोटी (भोजन) में जो कर लिया जाता हैं, मुझको अच्छा मालूम नहीं होता, क्यूंकि नोन बिना दरिद्र का भी निर्वाह नहीं, किन्तु सबको नोन आवश्यक होता हैं, और वे मेहनत-मजदूरी से जैसे-तैसे निर्वाह करते हैं उनके ऊपर भी यह नोन कर (कर) दण्डतुल्य रहता हैं, इससे दरिद्रों को क्लेश पहुँचता हैं। अत: कर (टैक्स) लवणादिकों के ऊपर न चाहिए, पौन रोटी से भी गरीबों को बहुत क्लेश होता हैं, क्यूंकि गरीब लोग कहीं से घास छेदन करके ले जायें व लकड़ी का भार (तो) उनके ऊपर कोड़ियों के लगने से उनको अवश्य क्लेश होता होगा, इससे पोन रोटी का जो कर स्थापन करना हैं, सो भी हमारी समझ से अच्छा नहीं- पृष्ठ ३८४-३८५
सरकार कागद (कागज) को बेचती हैं और बहुत सा कागजों पर धन बढ़ा दिया हैं, इससे गरीब लोगों को बहुत कलेश पहुँचता हैं, सो यह बात राजा को करनी उचित नहीं, क्यूंकि इसके होने से बहुत गरीब लोग दुःख पाकर बैठे रहते हैं, कचहरी में बिना धन के कुछ बात नहीं होती। इससे कागजों के ऊपर जो बहुत धन लगाया हैं, सो मुझको अच्छा मालूम नहीं देता। पृष्ठ ३८७

वेदों में स्वतंत्रता प्राप्ति का सन्देश

१. स्वामी दयानंद जी यजुर्वेद ३८/ १४ के भाष्य में लिखते हैं-

अखंड चक्रवर्ती राज्य के लिए, शौर्य , निति , विनय, पराक्रम और बलादि उत्तम गुण युक्त कृपा से हम लोगों को यथावत पुष्टकर, अन्य देशवासी राजा हमारें देश में कभी न हो तथा लोग कभीं न हों।

स्वामी दयानंद द्वारा रचित आर्याभिविनय पुस्तक के प्रमाण

१. हे न्यायकारिन! जो कोई हम धार्मिकों से शत्रुता करता हैं, उसको आप भस्मी-भुत करें और विद्या, शौर्य, धैर्य, बल, पराक्रम, चातुर्य, विधि धन, ऐश्वर्य, विनय, साम्राज्य, सम्मति, सम्प्रीति तथा स्वदेश सुख सम्पादन आदि गुणों से युक्त करके हमको सब देह धारियों में उत्तम बनायें और सबसे अधिक आनंद भागी करने, सब देशों में इच्छानुकूल विचरने और आरोग्य देह, शुद्ध मानस बल तथा विज्ञान आदि की प्राप्ति के लिए हमको सब विद्वानों के मध्य प्रतिष्ठा युक्त करें। १-१६

२. हे महा धनेश्वर! हमारे शत्रुओं के बल, पराकर्म को(आप) सर्वथा नष्ट करें। आपकी करुणा से हमारा राज्य और धन सदा वृद्धि को प्राप्त हो। १-४३

परोपकारिणी सभा के स्वीकार नामें में स्वामी दयानंद ने यह लिखा हैं की

जहाँ तक हो सके न्याय प्राप्ति के लिए सरकारी न्यायालय का द्वार न खट खटाया जाये।
स्वामी जी के ऐसे लिखने के पीछे सत्यार्थ प्रकाश में उन्हीं द्वारा लिखे गये इस वाक्य से सिद्ध होता हैं
अनुमान होता हैं की इसलिए ईसाई लोग ईसाईयों का बहुत पक्षपात कर किसी गोरे (अंग्रेज) ने काले (भारतीय )को मार दिया हो, तो भी बहुधा पक्ष पात से निरपराधी कर छोड़ देते हैं। १३वां समुल्लास

इस प्रकार से स्वामी दयानंद के लेखन से अनेक अन्य उदहारण दिए जा सकते हैं जो स्वामी दयानंद की अंग्रेजों से भारत को स्वतंत्र करने के लिए आवाहन करने का सशक्त प्रमाण हैं। इन्हीं से प्रेरणा पाकर लाखों भारतवासियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, हजारों ने अँगरेज़ सरकार की जेलों की यात्रा करी, हजारों ने फाँसी का फन्दा चूम कर अपने प्राणों को जन्म भूमि पर न्योछावर कर दिया।

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