न्याय से आशा की एक नई किरण का नाम है जस्टिस चंद्रचूड़

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-ललित गर्ग-
50वें प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) डी.वाई. चंद्रचूड़ की न्याय प्रणाली विसंगतियों एवं विषमताओं से जुड़ी इस स्वीकारोक्ति ने हर संवेदनशील भारतीय के मन को छुआ कि अदालतों में लंबे समय से लंबित मामलों से तंग आकर लोग बस समझौता करना चाहते हैं। ‘न्याय में देरी न्याय के सिद्धांत से विमुखता है’ वाली इस बात को सभी महसूस करते हैं लेकिन न्यायिक व्यवस्था के शीर्ष पर आसीन मुख्य न्यायाधीश की स्वीकारोक्ति के गहरे निहितार्थ हैं। ‘न्याय प्राप्त करना और इसे समय से प्राप्त करना किसी भी राज्य व्यवस्था के व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार होता है।’ लेकिन प्रधान न्यायाधीश के अनुसार लोग अदालतों में मुकदमों के लंबे खिंचने से इतने त्रस्त हो जाते हैं कि किसी तरह समझौता करके पिंड छुड़ाना चाहते हैं। प्रश्न यह है कि न्यायपालिका और विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट इसके लिए क्या करने जा रहा है, जिससे लोग न्याय प्रक्रिया से हताश-निराश होकर समझौता करने के लिए बाध्य न हों? दुर्भाग्य से यह प्रश्न दशकों से अनुत्तरित है। यह ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने त्रस्त करने वाली न्याय प्रक्रिया को लेकर यह भी कहा कि यह स्थिति हम न्यायाधीशों के लिए चिंता का विषय है, लेकिन यदि इस समस्या का निदान नहीं होता तो फिर एक कटु सच्चाई बताने का क्या लाभ? जस्टिस चंद्रचू़ड़ ने काफी सधा हुआ बयान दिया है तो न्याय प्रणाली की कमियों को दूर करने के रास्ते उद्घाटित होने ही चाहिए।
निश्चित ही डी.वाई. चंद्रचूड न्याय-प्रक्रिया की कमियों एवं मुद्दों पर चर्चा करते रहे हैं तो उनमें सुधार के लिये जागरूक दिखाई दिये हैं। निश्चित ही उनसे न्यायपालिका में छाये अंधेरे सायों में सुधार रूपी उम्मीद की किरणें दिखाई देती रही है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में जहां वे पहले ही कई महत्त्वपूर्ण फैसलों के कारण चर्चा में रहे हैं वहीं अपनी बेबाक एवं सुधारमूलक टिप्पणियों से आम जनता की सराहना के पात्र बनते रहे हैं। प्रधान न्यायाधीश के रूप में उन्होंने देश की न्यायपालिका के आमूल-चूल स्वरूप में परिवर्तन पर खुलकर जो विचार रखे हैं वे साहसिक एवं दूरगामी सोच से जुड़े होने के साथ आम लोगों की धारणा से मेल खाते हैं। नया भारत बनानेे एवं सशक्त भारत बनाने के लिये न्यायिक प्रक्रिया में सुधार सर्वोच्च प्राथमिकता होनी भी चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश ने स्वीकारा है कि कानून की इन स्थितियों में किसी तरह का समझौता समाज में पहले से व्याप्त असमानता को ही दर्शाता है। उन्होंने वादों के शीघ्र निपटान में लोक अदालतों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी स्वीकार किया। निस्संदेह, गाहे-बगाहे न्यायपालिका, कार्यपालिका व विधायिका द्वारा न्याय मिलने में होने वाली देरी को लेकर चिंता जरूर जतायी जाती है, लेकिन इस जटिल समस्या के समाधान की दिशा में बदलावकारी प्रयास होते नजर नहीं आते। जिसके चलते तारीख पर तारीख का सिलसिला चलता ही रहता है। न्याय के इंतजार में कई-कई पीढ़ियां अदालतों के चक्कर काटती रह जाती हैं। देश में शीर्ष अदालत, उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में मुकदमों का अंबार निश्चित रूप से न्यायिक व्यवस्था के लिये असहज एवं चुनौतीपूर्ण स्थिति है। बताया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या लगभग 80 हजार है। उच्च न्यायालयों में इनकी संख्या 62 लाख के करीब है और निचली अदालतों में करीब साढ़े चार करोड़। इसका अर्थ है कि लगभग पांच करोड़ लोग न्याय के लिए प्रतीक्षारत हैं। इनमें से अनेक मामले ऐसे हैं, जो दशकों से लंबित हैं। स्वयं सुप्रीम कोर्ट में दशकों पुराने कई मामले लंबित हैं। देश में तीनों स्तरों पर लंबित मामले न्यायिक व्यवस्था के लिये एक गंभीर चुनौती है। आजादी के अमृत महोत्सव की चौखट पार कर चुके देश की इस त्रासद न्याय व्यवस्था के बाबत देश के नीति-नियंताओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

निश्चित ही भारत दुनिया में सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। लेकिन इतनी बड़ी आबादी के अनुपात में पर्याप्त न्यायाधीशों व न्यायालयों की उपलब्धता नहीं है। निश्चित रूप से न्याय का मतलब न्याय मिलने जैसा होना चाहिए। न्याय समाज में महसूस भी होना चाहिए। न्याय त्वरित गति से होता हुआ भी दिखना चाहिए। देश में न्याय की प्रक्रिया सहज व सरल तथा आम आदमी की पहुंच वाली होनी चाहिए। न्याय-व्यवस्था जिसके द्वारा न्यायपालिकाएं अपने कार्य-संचालन करती है वह अत्यंत महंगी, अतिविलंबकारी और अप्रत्याशित निर्णय देने वाली है। निचली अदालतों से लेकर शीर्ष अदालत तक किसी भी मामले के निपटारे के लिए नियत अवधि और अधिकतम तारीखों की संख्या तय होनी ही चाहिए। जैसाकि अमेरिका में किसी भी मामले के लिये तीन वर्ष की अवधि निश्चित है। लेकिन भारत में मामले 20-30 साल चलना साधारण बात है। तकनीक का प्रयोग बढ़ाने और पुलिस द्वारा की जाने वाली विवेचना में भी सुधार जरूरी है। एक सक्षम न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन करके इन समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। उत्कृष्ट लोकतान्त्रिक देशों की तरह भारत की एक अत्यंत शक्तिशाली व स्वतंत्र न्यायपालिका है। न्यायपालिका केवल न्याय देने का ही काम नहीं करें, बल्कि सरकार की कमियों पर नजर रखना एवं उसे चेताना भी उसका दायित्व है।
न्याय व्यवस्था अभी तक औपनिवेशिक शिकंजे में जकड़ी हुई है। उच्चतर न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी है तो अधिकांश निचली अदालतों की कार्रवाई और पुलिस विवेचना की भाषा उर्दू है। वह आम आदमी के पल्ले नहीं पड़ती। समय आ गया है कि यह सब आम आदमी की भाषा में हों। राज्यों की क्षेत्रीय भाषाओं में न्यायिक प्रक्रिया की मांग लंबे समय से की जाती रही है। इस दिशा में कुछ प्रयास हुए भी हैं लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जिससे तारीख पर तारीख का सिलसिला थम सके। उम्मीद की जा रही है कि हाल ही में लागू हुए तीन नये आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद स्थिति में सुधार हो सकेगा। केंद्र सरकार भी कहती रही है कि नये कानूनों का मकसद लोगों को सजा देने के बजाय न्याय दिलाने पर केंद्रित है। विश्वास किया जाना चाहिए कि इन प्रयासों से मुकदमों के निस्तारण में गति आएगी। देश की जनता उम्मीद लगाए बैठी है कि दशकों से लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण हो। जिससे न्यायिक प्रक्रिया से हताश-निराश लोग समझौता करने को बाध्य न हों। विश्वास किया जाना चाहिए कि मुख्य न्यायाधीश की चिंता के बाद न्यायिक प्रक्रिया को सरल-सुगम बनाने के लिये अभिनव पहल हो सकेगी। जिससे आम लोगों की समय पर न्याय मिलने की आस पूरी हो सकेगी। इसके अलावा यह भी आवश्यक है कि सरकारें मुकदमेबाजी से बाज आएं, क्योंकि सबसे बड़ी मुकदमेबाज तो वे खुद हैं। नये तीन कानूनों के बाद मुकदमों की सुनवाई द्रुत गति से होगी, लेकिन देखना यह है कि ऐसा हो पाता है या नहीं? प्रश्न यह भी है कि आखिर करोड़ों लंबित मामलों का क्या होगा? ये वे प्रश्न हैं, जिनके उत्तर देश की जनता को चाहिए। जनता समस्याओं का उल्लेख नहीं, बल्कि उनका समाधान चाहती है।
इससे इनकार नहीं कि अपने देश में आबादी के अनुपात में न्यायालयों और न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या नहीं है और यह संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है, निचली अदालतों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक समस्त न्यायालयों को दो पालियों में चलाने का प्रावधान किया जाना चाहिए। नए न्यायालय भी स्थापित किए जाने चाहिए। न केवल न्यायाधीशों के रिक्त पदों को भरा जाना चाहिए, बल्कि जनसंख्या और लंबित मामलों का संज्ञान लेते हुए न्यायिक कर्मियों की नियुक्ति भी की जानी चाहिए। जस्टिस चंद्रचूड़ के ताजे वक्तव्यों में ऐसे ही सुधार को अपनाने के संकेत मिल रहे हैं, जो स्वागतयोग्य होने के साथ सराहनीय भी है। भारत को अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थिति और अपने गौरवपूर्ण इतिहास बोध के अनुसार एक वैकल्पिक न्याय तंत्र भी स्थापित करना चाहिए, किंतु जब तक यह नहीं होता वर्तमान व्यवस्था में ही कुछ आवश्यक सुधार करके हमें इसे समसामयिक, तीक्ष्ण, समयबद्ध और उपयोगी बनाए रखना चाहिए। न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिये बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिये। भारत की सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था का भारतीयकरण होना चाहिए।

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